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किताबें तो बहुत पढ़ीं, पर याद नहीं कुछ? तो ये है वजह...

Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: February 3, 2018, 11:04 AM IST
किताबें तो बहुत पढ़ीं, पर याद नहीं कुछ? तो ये है वजह...
यह सीन किस फिल्म का है इसे याद दिलाने की जरूरत कई बार नहीं पड़ती है

अक्सर होता है कि आप कोई किताब या फिल्म देखते हैं, आपको बेहद पसंद आती है लेकिन छह सात महीने बाद आप उसकी एक हल्की सी तस्वीर के अलावा कुछ याद नहीं रख पाते. वैसे ऐसा होना बहुत ही आम सी बात है, सबके साथ होता है लेकिन सवाल यह है कि ऐसा होता क्यों है..पढ़िए और जानिए.

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  • Last Updated: February 3, 2018, 11:04 AM IST
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‘याद रखना ही मोहब्बत में नहीं है सब कुछ
भूल जाना भी बड़ी बात हुआ करती है..’

जमाल एहसानी का यह शेर उन लोगों के काम का है, जिन्हें याद रखने में दिक्कतें पेश आती हैं. आपके आसपास भी ऐसे दोस्त होंगे जो सही वक्त पर सही शेर पढ़के वाहवाही लूट लेते हैं. और आप मुंह ताकते रह जाते हैं. सोचते रह जाते हैं कि ये शेर तो मैंने भी पढ़ा था, लेकिन मुझे क्यों याद नहीं रहा. होता है, सबके साथ ऐसा ही होता है. हम फिल्में देखते हैं, किताबें पढ़ते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद उस किताब या फिल्म की एक हल्की सी तस्वीर के अलावा कुछ और दिमाग में नहीं बचता.

हर दिमाग में होता है भूलने वाला कर्व

इंसानी दिमाग की याददाश्त की कुछ सीमाएं होती हैं. जानकारों की मानें तो हमारे दिमाग में एक भूलने वाला वक्र यानि कर्व होता है. ये कर्व उन शुरुआती 24 घंटों में सबसे चढ़ाई में होता है, जब आप कुछ देखते या पढ़ते हैं. लेकिन अगर आप उसे दोबारा देखते या रिव्यू नहीं करते तो समझ लीजिए कि सब पढ़ा-लिखा गया पानी में. आपको किताब के कवर या फिल्म के कुछ सीन के अलावा ज्यादा कुछ याद नहीं रह जाता. हालांकि इस मामले में कुछ अपवाद हमेशा रहते हैं. कुछ लोगों की याददाश्त इस भूलने वाले वक्र को झुठलाते हुए सब कुछ दिमाग में समेट कर रख लेती है.

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भूलना हमारी याद रखने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है


क्यों नहीं रही अब याददाश्त वैसीअंग्रेजी वेबसाइट द अटलांटिक में छपे एक लेख के मुताबिक, इंसानी याददाश्त हमेशा से ऐसी नहीं थी. मेलबर्न यूनिवर्सिटी के रिसर्चर जैरेड होर्वाथ का मानना है कि सूचना और मनोरंजन को ग्रहण करने के हमारे तरीके ने हमारे याद रखने के तरीके पर काफी गहरा असर छोड़ा है. अब हमारी याददाश्त वैसी नहीं रही कि हम छह महीने पहले देखी किसी फिल्म के प्लॉट को याद रख सकें. इसके पीछे की वजह है – इंटरनेट.

इंटरनेट के दौर में रिकॉल मेमरी (यानि दिमाग में तुरंत किसी बात को याद करना) कम जरूरी हो गई है. किसी चीज़ को पूरी तरह याद रखने से ज्यादा जरूरी हो गया यह याद रखना कि वो सूचना या जानकारी कहां और कैसे मिलेगी.

जब तक आपको पता है कि अमुक जानकारी का ठिकाना कहां है, आपको उसे पूरी तरह याद रखने की जरूरत नहीं है.
जैरेड होवार्थ, रिसर्चर, मेलबर्न यूनिवर्सिटी


गूगल बाबा ने किया है कबाड़ा
रिकॉल मेमरी के रोल को कम करने में गूगल जैसे इंटरनेट टूल का बहुत बड़ा रोल रहा है. कितनी बार ऐसा होता है कि आप दोस्तों के साथ बैठकर किसी फिल्म की चर्चा करते हैं और उसका कोई किरदार आपको याद नहीं आता. तुरंत गूगल की मदद ली जाती है और एक क्या सारे किरदार आपके सामने आकर खड़े हो जाते हैं. ऐसे में आप ही बताइए रिकॉल मेमरी यानि सब कुछ याद रखने की जरूरत कहां पड़ती है.

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गूगल ने सब कुछ याद रखने से हमें राहत दी है


अलग अलग तरह के शोध की मानें तो इंटरनेट एक तरह से बाहरी मेमरी का काम करता है. जब लोगों को पता है कि जरूरत पड़ने पर वह इस जगह से जानकारी जुटा सकते हैं तो ऐसे में वो सब कुछ दिमाग में स्टोर करने की जरूरत नहीं समझते. पहले ऐसी सुविधा नहीं थी तब हमें दोस्तों, रिश्तेदारों के फोन नंबर तक रटे होते थे लेकिन अब खुद का नंबर भी याद रखना मुश्किल हो जाता है.

सुकरात सबकुछ याद रखने पर जोर देते थे
हालांकि ऐसा नहीं है कि इंटरनेट से पहले हमारा दिमाग सुपर कम्प्यूटर था और हम सब कुछ दिमाग में स्टोर कर लेते थे. लिखित शब्दों का चलन भी एक तरह से बाहरी मेमरी का ही काम करता आया है. दार्शनिक प्लेटो या अफ्लातून को दर्शन शास्त्र में लिखित संवादों का जनक माना जाता है. उनके गुरु सुकरात थे.

सुकरात को लिखना बिल्कुल पसंद नहीं था क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे याद करने की काबलियत मर जाएगी. वह कहीं न कहीं सही थे. लिखने ने मेमरी को मार डाला है. लेकिन यह भी सोचिए कि कितनी कमाल की बातें भी हमें इसलिए हासिल हुई हैं क्योंकि वो लिखी हुईं थी. मैं किसी जरूरी बात को याद रखने से ज्यादा बेहतर उसे लिख लेना पसंद करूंगा.
जैरेड होवार्थ, रिसर्चर, मेलबर्न यूनिवर्सिटी


इंटरनेट भी हमें ऐसी ही सुविधा देता है. सब कुछ याद रखने से बेहतर है उसके ठिकाने को याद रखना और जब जरूरत हो उस तक पहुंच जाना. वैसे भी हम यहां जिस स्तर के भूलने की बात कर रहे हैं वह कोई बीमारी नहीं है. कुछ देखकर या पढ़कर उसे भूल जाना आम बात है. जानकार तो यह भी कहते हैं कि भूल जाना भी याद रखने की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है.

BOOKS, MOVIES, MEMORY
अपनी मनपसंद किताब को अगर अगर बार बार पढ़ेंगे तो उसके लिए दिमाग में जगह बन सकती है


तो क्या है तरीका
तो सवाल यह है कि इंटरनेट का सहारा होने के बावजूद याद रखने का कोई और तरीका है. इसे लेकर दो मत हैं. कुछ शोध कहती हैं कि कुछ याद रखना है तो उसे बार बार देखो. एक फिल्म को देखो मत, बार बार देखो. आमिर खान की फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ हम सबने कितनी बार देखी होगी. और बार बार देखने के बाद ही शायद यह हाल है कि उसका एक एक डायलॉग हम अपने दोस्तों के बीच अक्सर बोल देते हैं.

क्या है रोज पढ़ने वाले शब्दों की सीमा
दूसरे तरह के शोध कहते हैं कि हम कुछ ज्यादा ही पढ़ और देख रहे हैं जो कि जरूरी नहीं है. 2009 में हुए एक शोध के मुताबिक एक औसत अमेरिकी दिन में एक लाख से ज्यादा शब्दों का सामना करता है. सोशल मीडिया पर जिस तरह अलग अलग लेख की बाढ़ आई होती है, ऐसे में बहुत कुछ पढ़ तो लिया जाता है लेकिन सवाल है कि उसमें हम कितना याद रख पाते हैं. हम बहुत कुछ ‘देख और सुन’ रहे हैं लेकिन सब पर ‘ध्यान और कान’ नहीं लगा पा रहे हैं. जैसे यह लेख जिसे अभी आप पढ़ रहे हैं. महीनों बाद ही आपको पता चल पाएगा कि इसे आपने सिर्फ पढ़ा था या फिर समझा भी था. और हां जहां तक दोस्तों के सामने शेर और कविता कहने की बात है तो चिंता मत कीजिए...इंटरनेट हैं ना!

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First published: February 3, 2018, 10:38 AM IST
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