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मेरी जिंदगी में सबसे गहरा रंग 'कैफी' का रंग है

News18Hindi
Updated: November 23, 2019, 6:18 PM IST
मेरी जिंदगी में सबसे गहरा रंग 'कैफी' का रंग है
शौकत कैफी की गिनती फिल्म 'जगत' और 'रंगमंच' की मंजी हुई अभिनेत्री के तौर पर होती है.

शौकत आजमी ने अपनी इस किताब मे लिखा है- मैं जब भी मुड़के देखती हूं तो अपनी जिंदगी के उतार-चढ़ाव याद करके कुछ हैरत भी होती है, कुछ खुशी भी.

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(नाज़ खान)

मशहूर शायर कैफी आजमी की पत्नी शौकत आजमी का 93 साल की उम्र में निधन हो गया. शौकत कैफी की गिनती फिल्म 'जगत' और 'रंगमंच' की मंजी हुई अभिनेत्री के तौर पर होती है. 'उमराव जान', 'बाजार' और 'सलाम बॉम्बे' में उनके अभिनय को सराहा गया. उनकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा अभिनय से जुड़ा हुआ था. यही वजह है कि अपनी जिंदगी के यादगार पलों को साझा करते हुए उन्होंने ‘याद की रहगुजर’ में इप्टा और पृथ्वी थियेटर से जुड़े हुए अपने अनुभवों, यादों को भी सामने रखा है.

एक सीधी-सी लेकिन हाजिर जवाब और बेबाक लड़की
अपनी इस किताब में उन्होंने लिखा है, 'मैं जब भी मुड़के देखती हूं तो अपनी जिंदगी के उतार-चढ़ाव याद करके कुछ हैरत भी होती है, कुछ खुशी भी. सोचती थी कि बीते दिनों के बारे में लिखूं. बहुत दिनों तक सिर्फ सोचती रही. आखिर एक दिन हिम्मत करके लिखना शुरू किया.'  इसी में आगे अपनी निजी जिंदगी को वह इस तरह याद करती हैं, 'मेरा बचपन हैदराबाद में गुजरा है. वहां रंगों के नाम भी अंग्रेजी में नहीं उर्दू में होते हैं और बहुत खूबसूरत होते हैं लेकिन मेरी जिंदगी में जो रंग सबसे गहरा है वह कैफी का रंग है और वह इस किताब में भी जगह-जगह बिखरा हुआ है.' एक सीधी-सी लेकिन हाजिर जवाब और बेबाक लड़की रही शौकत ने अपनी शादी का फैसला भी खुद ही किया था.

जिंदगी भी बिना किसी शिकवा-शिकायत के गुजारी
इस बारे में वह लिखती हैं, 'एक बार मैंने कैफी के सामने एक पेपर पर लिख दिया था कि अगर जिंदगी के इस लंबे सफर में तुम मेरे हमसफर हो जाओ तो यह जिंदगी इस तरह गुजर जाए जैसे फूलों पर से सुबह की हवा का लतीफ झोंका गुजरता है.' जिस तरह कैफी से शादी का फैसला उनका अपना था, उन्होंने उनके साथ अपनी जिंदगी भी बिना किसी शिकवा-शिकायत के गुजारी. उन्होंने इस बारे में लिखा भी है, 'जिंदगी के बेहद उतार-चढ़ाव के बावजूद, एक कमरे की जिंदगी के बावजूद, कभी खाना है और कभी नहीं के बावजूद मैंने कभी अपने मां-बाप को शिकायत का एक लफ्ज भी नहीं लिखा. न ही मैंने कभी अपने आप को दुखी ही महसूस किया. मैंने हमेशा अपने आप को बहुत खुशकिस्मत औरत समझा और आज भी समझती हूं.'

सहमत न रहने के बावजूद बात मान लेना
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कैफी से उनकी लाइफ कैमिस्ट्री काफी मेल खाती थी और कई बार उनसे सहमत न रहने के बावजूद वह उनकी बात को मान लिया करती थीं. एक बार घर में हुई चोरी का जिक्र करते हुए शौकत ने लिखा है कि 'हमारे घर से एक चोर चादरें, कंबल चुरा कर ले गया और जब मैंने कैफी से चोरी की रिपोर्ट लिखाने को कहा तो कैफी ने इतना कह कर मुझे टाल दिया कि 'देखो शौकत बारिश होने वाली है और उस गरीब को भी तो चादरों, कंबल की जरूरत होगी. उसके बच्चे कहां सोएंगे? तुम फिर चादरें खरीद सकती हो वह नहीं.' यह सुन कर मैंने अपना सर पीट लिया. अब क्या जवाब देती.'

अपनी निजी जिंदगी में झांकने का मौका दिया 
अपनी मां की बेबाकी का जिक्र करते हुए मशहूर फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी ने भी एक कार्यक्रम में कहा था कि 'पहली बार जब उन्होंने कैफी साहब को नज्म 'औरत' पढ़ते हुए सुना तो उन्होंने खुद ही दिल में तय कर लिया था कि यही वह आदमी है जिससे मैं शादी करूंगी.' ‘याद की रहगुजर’ में शौकत कैफी ने अपनी निजी जिंदगी में झांकने का मौका दिया है और अपनी निजी जिंदगी से जुड़े हर पहलू पर चर्चा की है. उन्होंने इस किताब में अपने बच्चों शबाना आजमी, बाबा आजमी से जुड़े दिलचस्प किस्सों को दर्ज किया है. साथ ही उस समय के प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े शायरों की भी बात की है.

कैफी की शक्ल बहुत अच्छी लगी थी
उनकी जिंदगी कैफी थे और जब वह नहीं रहे तो उनकी यादों, उनके किस्सों को उन्होंने अपनी जिंदगी बना लिया था. यही वजह है कि उनसे गुफ्तगू होती तो कैफी की बात जरूर होती. एक साक्षात्कार में उन्होंने हंसते हुए कहा था कि 'मैं हैदराबाद की एक सीधी-सादी सी लड़की थी और पहली बार जब मैंने उन्हें देखा तो कैफी की शक्ल मुझे बहुत अच्छी लगी थी, उनकी शायरी और उनकी आवाज की वजह से मैंने उनको पसंद किया था.'

वह महज 45 रुपए कमाते थे
एक अन्य जगह वह लिखती हैं, 'जब मैंने कैफी से शादी की ख्वाहिश जाहिर की तो मुझसे कहा गया कि तुमको तो कपड़े पहनने का इतना शौक है और वह महज 45 रुपए कमाते हैं तो जाहिर है आपका खर्च नहीं चल सकता. मैंने कहा नहीं, वह आदमी मुझे बहुत अच्छे लगते हैं और उनके साथ मुझे चाहे मजदूरी भी करनी पड़े, सर के ऊपर मिट्टी भी उठानी पड़ी तो भी मैं करूंगी. एक बार मैं कैफी से नाराज हो गई और उनको अनाप-शनाप कुछ लिख दिया तो इसके बाद खून से लिखा उनका खत आया तो मैंने उसे अब्बा को दिखाया. अब्बा से मेरी दोस्ती थी.

शौकत ने घर को संभालने में कैफी को सहारा दिया
अब्बा हंस पड़े.' वह कहती थीं, 'शायद यकीन न हो मगर हमारे पास खाने के पैसे नहीं होते थे तो कैफी साहब सुबह उठ कर एक मजाहिया नज्म डेली अखबार के लिए लिखा करते थे.' ऐसे हालात में शौकत ने भी घर को संभालने में कैफी को सहारा दिया. उन्होंने एक गीत के कोरस में भी गाया और जिसके 30 रुपए उनको मिले थे. वह लिखती हैं, फिर मैंने पृथ्वी थियेटर में भी काम किया, डबिंग करती थी. कैफी साहब के साथ एक लंबी जिंदगी गुजारने के बाद मेरा ख्याल है कि शौहर के तौर पर मेरा कैफी को चुनना सही फैसला था.'

स्मृति : रंगमंच और फिल्म जगत की जानी-पहचानी शख्सियत शौकत आजमी

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First published: November 23, 2019, 6:18 PM IST
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