मुहर्रम 2019: इस्लामिक कैलेंडर का दूसरा सबसे पवित्र महीना

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Updated: September 1, 2019, 11:15 AM IST
मुहर्रम 2019: इस्लामिक कैलेंडर का दूसरा सबसे पवित्र महीना
मुहर्रम शब्द हराम या हुरमत से बना है जिसका अर्थ होता है रोका हुआ या निषिद्ध किया गया. मुहर्रम के महीने में युद्ध से रुकने और बुराइयों से बचने की सलाह दी गई है

मुहर्रम शब्द 'हराम' या 'हुरमत' से बना है जिसका अर्थ होता है 'रोका हुआ' या 'निषिद्ध' किया गया. मुहर्रम के महीने में युद्ध से रुकने और बुराइयों से बचने की सलाह दी गई है

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हिंदू कैलेंडर की तरह ही इस्लाम का भी अपना कैलेंडर है. इसमें भी 12 महीने हैं. लेकिन इन महीनों के नाम और इनका महत्व अलग-अलग है. 31 अगस्त से इस्लामी नववर्ष की शुरुआत हो चुकी है. इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम का होता है. अर्थात् रमजान के महीने के बाद इस्लाम का दूसरा सबसे पाक महीना. मुहर्रम के महीने की दसवीं तारीख को यौम-ए-आशूरा मनाया जाता है. यौम-ए-आशूरा का अर्थ है (यौम यानी दिन और आशूरा यानी दसवां जो अशर या अशरा से बना है, जिसका अर्थ होता है दस) दसवां दिन. दरअसल इसी दिन कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन को उनके परिवार के साथ शहीद कर दिया गया था.

क्या है मुहर्रम का महत्व

मुहर्रम शब्द 'हराम' या 'हुरमत' से बना है जिसका अर्थ होता है 'रोका हुआ' या 'निषिद्ध' किया गया. मुहर्रम के महीने में युद्ध से रुकने और बुराइयों से बचने की सलाह दी गई है.

माना जाता है कि इसी महीने में पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब को अपना जन्मस्थान मक्का छोड़ कर मदीना जाना पड़ा जिसे हिजरत कहते हैं. उनके नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके परिवार वालों की शहादत इसी महीने में हुई और इसी महीने में मिस्र का जालिम शासक फिरऔन अपनी सेना समेत लाल सागर में समा गया. अल्लाह ने अपने पैगम्बर हज़रत मूसा और उनके अनुयायियों की रक्षा की.

मुहर्रम की मान्यताएं मुसलमानों के इतिहास से निकली हैं. जैसा कि सर्वविदित है कि पैगम्बर हज़रत मुहम्मद के निधन के कुछ वर्षो बाद मुसलमान दो गिरोह में बंट गए थे. एक गिरोह उनके परिवार के सदस्यों के साथ हो गया जिसको इतिहास ने शिया के नाम से जाना और दूसरा गिरोह पैगम्बर की सुन्नतों की पैरवी करने लगा और जो बाद में सुन्नी कहलाए. शिया मुसलमान जहां मुहर्रम के पहले 10 दिनों में मातम करते हैं वहीं सुन्नी मुसलमान 9वीं, 10वीं और 11वीं तारीख़ के रोज़े रखते हैं.

शिया मुसलमानों में ये रोज़े रखने की परंपरा नही बल्कि उनके यहां मुहर्रम की पहली तारीख से 10 तारीख़ तक मातम किया जाता है और यौमे आशूरा के दिन फाका(भूखा-प्यासा) किया जाता है. इस दौरान अपने शरीर को चाकुओं, छुरियों और भालों से घायल किया जाता है. सीने पर हाथ मार कर विलाप किया जाता है. फारसी में छाती पीटने को सीनाजनी और दुःख भरे गीत गाने को नोहाख्वानी कहते हैं.

दरअसल ऐसा कर के उस दुःख और उस गम को जानने, समझने और महसूस करने की कोशिश की जाती है जो नबी के नवासे हज़रत हुसैन और उनके परिवार के लोगों ने महसूस किया. इतिहास में ये सारी घटना कर्बला के वाकये के नाम से जानी जाती है. ये ऐतिहासिक घटना इस्लाम की सबसे दर्दनाक घटना के तौर पर याद की जाती है.

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First published: September 1, 2019, 11:15 AM IST
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