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तिनका-तिनका जेल: एक रानी की कथा जो जेल से लिखी गई

News18Hindi
Updated: October 25, 2019, 1:32 PM IST
तिनका-तिनका जेल: एक रानी की कथा जो जेल से लिखी गई
हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान.

आज इतवार है। आज मेट्रन छुट्टी पर है। कोई विशेष घटना नहीं हुई। दिन भर बच्चों का ख्याल आता रहा। वे सब आज घर पर ही होंगे। ममता दिन को कहने लगी - ' अम्मा , हमारी जीजी हमको बुला रही है.

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  • Last Updated: October 25, 2019, 1:32 PM IST
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जेल से लिखतीं सुभद्रा कुमारी चौहान
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।( झाँसी की रानी)

आजादी की मुहिम में अपने जीवन की आहुति देने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता झाँसी की रानी भारतीय इतिहास में हमेशा याद की जाने वाली कविता है। इस कविता को सुभद्रा कुमारी की कीर्ति का आधार स्‍तम्‍भ माना जाता है। उनका पर्याय बनी ये पंक्तियां ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ अपने ओज और प्रभाव के कारण आज भी लोकप्रिय है। उनकी इस कविता का असर यह था कि झांसी की रानी लक्ष्‍मीबाई की वीरता का सामान्‍य नारियों तक प्रसार का श्रेय आज भी उन्हें ही जाता है। उनका इस्तेमाल किया गया 'मर्दानी' शब्‍द कालजयी बन गया। इस शब्द ने वीर महिला को एक नई पहचान दे दी। लेकिन बहुत कम लोगों को इस बात का इल्म होगा कि सुभद्रा कुमारी चौहान ने इस कविता को जेल में रहते हुए लिखा था। असल में राष्ट्रीयता से भरपूर कविताएं लिखने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान देश की प्रख्यात कवयित्री होने के साथ ही हिंदुस्‍तान की पहली महिला सत्‍याग्रही थीं।

नवजागरण में स्‍त्री शिक्षा की लहर में वे सक्रिय लेखन से जुड़ीं। 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली वे प्रथम महिला थीं। 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने की वजह से वे पांच अवसरों पर करीब एक साल तक जेल में रहीं। 1923 के नागपुर झंडा सत्याग्रह में जबलपुर जत्थे का नेतृत्व करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर पूरे देश में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई थी। लेकिन जेल के अपने समय को भी सुभद्रा कुमारी चौहान ने कभी बेकार नहीं जाने दिया। वे जेल के अंदर भी नियमित सृजन करती रहीं। जेल में ही उन्‍हें अपनी कहानियों के विभिन्‍न पात्र मिले। जबलपुर जेल-प्रवास के दौरान उन्‍होंने कई कहानियां लिखी। उन्होंने जेल मे रह रहीं महिलाओं की स्थिति में आवश्यक सुधार की पहल की। जबलपुर जेल यात्रा में उन्‍हें अपनी बेटी की हत्‍या के आरोप में पकडकर लाई गई 'रूपा' मिली। मां अपनी बेटी को लेकर कुएं में कूद पड़ी, बेटी मर गई मां बच गई। मां को हत्‍या के आरोप में आजीवन कारावास मिला। सुभद्रा ने ऐसी कई महिलाओं की व्यथा को अपनी कलम के जरिए कहा।

सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, उनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। इसे हंस प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया था। यह किताब उनके जेल-जीवन पर सटीक रौशनी डालती है।

जेल में सुभद्रा की सबसे छोटी बेटी ममता उनके साथ थी लेकिन शेष चारों बच्चे सुधा, अजय, विजय, अशोक जो जेल के बाहर छूट गए थे, उनके लिए सुभद्रा का मन बेहद विचलित रहता था। 31 जनवरी 1943 को डायरी में वे दर्ज करती हैं -

आज इतवार है। आज मेट्रन छुट्टी पर है। कोई विशेष घटना नहीं हुई। दिन भर बच्चों का ख्याल आता रहा। वे सब आज घर पर ही होंगे। ममता दिन को कहने लगी - ' अम्मा , हमारी जीजी हमको बुला रही है - ममता... ममता... वह सुनो। ' मैंने कहा - ' हाँ बेटी बुला तो रही है। भइया लोग भी तुम्हें बुला रहे हैं। ' इस पर ममता बोली - ' अम्मा घर चलो , फिर हमारे भैया लोग हमें प्यार करेंगे। हमारी जीजी हमें गोद में लेंगी। ' आज ममता के लिए कोई फल नहीं है। फल कल आते पर अब तो नहीं आ सकेंगे।

ईश्वर महान है। अपनी संतानों की रक्षा करता है। वही अपने उन छोटे-छोटे की जिसके माता-पिता दोनों जेल में हैं - रक्षा करेगा। ईश्वर! तू दुनिया में सबका भला करने के बाद एक बार मेरे उन चारों बच्चों की ओर भी देख लेना। इतना ही उनके लिए बहुत है। मैंने तो दुनिया में कोई ऐसा सुकर्म नहीं किया कि तुझसे कृपा की याचना कर सकूं , परंतु उन बच्चों के पिता! वे तो देवता हैं - उन्हीं के ख्याल से तू उन बच्चों को देखना , परमात्मा।

इस बात की पुष्टि में सुधा चौहान ने लिखा है - 'जिन बच्चों के लिए उनका जी इतना तड़पता था, उनको चिट्ठी लिखने और उनकी चिट्ठी पाने की सुविधा को समझ-बूझकर भी अन्याय के विरोध में तिलांजलि दे देना, उनके साहस को और किन्हीं महत्व जीवन मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा को रेखांकित करता है।' (मिला तेज से तेज, पृ. 218-19)

जेल में ममता भले ही अपनी माँ सुभद्रा के साथ थी, लेकिन वहाँ मिलने वाले सीमित साधनों एवं मेट्रन के क्रूर शासन में ही गुजर-बसर होती थी। सुभद्रा अपनी डायरी में लिखती हैं -

'ममता के खाने के लिए कुछ नहीं है। मेट्रन से आटा बेसन माँगा था। बड़े जेलर ने देने के लिए कह भी दिया था पर कई दिन तक भीख की तरह माँगने पर वह देगी , ईश्वर उसे समझेगा! ' (वही, पृ.214)

वे मध्य प्रदेश विधानसभा की विधायक भी रहीं। इसलिए देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को करीब से देखते हुए उन्होंने जो लिखा, वह ऐतिहासिक है।  1930 में प्रकाशित अपनी किताब – मुकुल – की प्रस्तावना में सुभद्रा कुमारी चौहान लिखती हैं –

“यह सभी कविताएं मेरे जीवन के ऊषाकाल में लिखी गईं थीं। आज तो उन दिनों को याद करना भी अपराध है। आज वे दिन अतीत के अंधकार में सो गए हैं- जैसे सपना हो गए हों। मैं किसी से क्या कहूं कि वे दिन कैसे थे?”

(खास बात यह भी है कि इस किताब की प्रस्तावना के अंत में जबलपुर का ही पता लिखा है जहां की जेल में वे बंद थीं। प्रस्तावना में अंकित तारीख 13 नवंबर, 1930 है।)

इसके अलावा 2010 में प्रो. रूपा गुप्ता ने सुभद्रा कुमारी चौहान की चुनिंदा कहानियां स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित की। सुभद्रा कुमारी ने ‘झांसी की रानी’ के अलावा ‘झांसी की रानी की समाधि पर’, जलिया वाला बाग में बसंत, ‘ठुकरा दो या प्‍यार करो’, ‘वीरों का कैसा हो बसंत’, ‘मुरझाया फूल’, ‘मेरे पथिक’, ‘अनोखा दान’ ‘बालिका का परिचय’ और ‘कदम्‍ब का पेड़’ जैसी और भी कई कविताओं को रचा। उनकी पंक्तियां- यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।  मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे, आज भी गुनगुनाई जाती हैं।

जेल की कोठरी में बैठकर सतत सृजन करने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपने लेखन से राष्ट्रभक्ति की अलख तो जगाई ही, जेलों के एक विशेष दस्तावेज की भी रचना कर दी।

(वर्तिका नन्दा जेल सुधारक और तिनका तिनका की संस्थापक हैं। जेलों के अपने काम को लेकर दो बार लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में शामिल। तिनका तिनका तिहाड़, डासना और तिनका तिनका तिनका मध्य प्रदेश चर्चित परियोजनाएं रहीं हैं।)

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First published: October 25, 2019, 1:29 PM IST
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