RIP महेन्द्र मेवाती: अभिनय के शहंशाह का जाना...

विदा, अभिनय के शहंशाह! आने वाली पीढ़ियां आपके अभिनय को याद रखेंगी. तुमने जो हासिल किया है वह लाखों-लाख लोगों को आजीवन हासिल नहीं हो पाता है. नमन.

News18Hindi
Updated: January 9, 2019, 9:14 PM IST
RIP महेन्द्र मेवाती: अभिनय के शहंशाह का जाना...
महेन्द्र मेवाती
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Updated: January 9, 2019, 9:14 PM IST
महेन्द्र भाई को पहली बार इन्द्रसभा में देखा था, फिर दिल्ली चलो, बन्द गली का आखिरी मकान, रास्ते, ताजमहल का टेन्डर से लेकर ऑथेलो, औरंगजेब, कथा एक कंस की, यहां तक कि उनका हर नाटक देखा. हिन्दी रंगमंच में उनके कद का अभिनेता मिलना असम्भव है. हर किरदार जो उन्होंने निभाया, लोगों के जेहन में उतर गया.

कितने ही नाटक उनके नाम और काम से पहचाने गए. कितनी ही बार लोग केवल महेन्द्र मेवाती का अभिनय देखने जाते थे. दिल्ली रंगमंच के कितने ही अभिनेताओं ने उनका नाटक देख कर ही अभिनय सीखा. आज वो अभिनेता असमय हमारे बीच से चला गया. उनका जाना, मंच से अभिनेता का जाना है.

यह कहना गलत ना होगा कि भारतीय रंगमंच में अभिनेता के लिए कोई जगह है ही नहीं. महेन्द्र मेवाती इसका जीता जाता उदाहरण हैं. रंगमण्डल छोड़ने के बाद उनके लिए अभिनय के अवसर लगातार कम होते चले गए. गिने चुने तीन या चार नाटकों में ही उनका काम दिखाई दिया. कुछ समय 'किगडम ऑफ ड्रीम्स' में भी रहे. मुम्बई भी आते-जाते रहे, पर कहीं कुछ ऐसा नहीं रहा जिससे उनको संतुष्टि मिलती. लौटकर दिल्ली आए और नए लोगों को सिखाने का काम शुरू किया. जिस जगह को अधिकतर प्रशिक्षित अभिनेता अछूत मानते हैं, उसी गोल चक्कर में, वाहनों के शोर में अभिनेताओं को सिखाते रहे.



एकदम नए लोगों और निर्देशकों के साथ काम किया. अगर किसी ने सहारा देने की कोशिश की तो झटक दिया. शहंशाह ऐसे ही जीते हैं. उनकी वक्त-बेवक्त नशे में रहने की आदत के बारे में मैंने कई बार सोचा, लगा कि ये केवल इतनी सीधी बात नहीं है. ऐसे कैसे हो सकता है कि एक अभिनेता स्वयं से इतना नाराज रहे, इतना बेसहारा हो जाए कि उसे शराब के सिवा कुछ नजर न आए. बात केवल इतनी ही नहीं है, बात इससे बड़ी और गहरी है.

जहां इतने साधारण लोग सारी सुविधाएं भोग रहे हैं, वहीं इतना बड़ा अभिनेता ऐसी ज़िन्दगी क्यों जीता रहा? मुझे नाटक औरंगजेब का वो आख़िरी दृश्य याद आता है, जहां बूढ़ा कमजोर शहंशाह पूरी अकड़ के साथ बैठा दिखाई देता है. महेन्द्र मेवाती की ज़िंदगी भी ऐसी ही थी.

विदा, अभिनय के शहंशाह! आने वाली पीढ़ियां आपके अभिनय को याद रखेंगी. तुमने जो हासिल किया है वह लाखों-लाख लोगों को आजीवन हासिल नहीं हो पाता है. नमन.

महेंद्र मेवाती का जन्म 1970 में मध्य प्रदेश के सागर जिले में हुआ था. पेशे से ऐक्टर महेंद्र मेवाती ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग सीखी थी. ऐक्टिंग के अलावा वे डायरेक्शन भी करते थे. अपने अक्खड़पन के लिए मशहूर महेंद्र मेवाती ने कई सारी बॉलीवुड फिल्मों में भी काम किया है. भाग मिल्खा भाग में दिव्या दत्ता के पति का किरदार लोगों ने खूब सराहा था. इसके अलावा वे 'तेवर' और 'चिंटू जी' फिल्म में भी काम कर चुके थे.
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यह लेख रंगमंच निर्देशक ईश्वर शून्य ने लिखा है.  

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