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कोरोना वायरस संक्रमण से संघर्ष की ये तीन कहानियां बेहद खौफनाक

News18Hindi
Updated: April 3, 2020, 5:18 PM IST
कोरोना वायरस संक्रमण से संघर्ष की ये तीन कहानियां बेहद खौफनाक
कोरोना वायरस से संक्रमित हर शख्स का एक अलग अनुभव है. कुछ में इसके बेहद सामान्य या फिर यूं कहें कि बेहद कम लक्षण नजर आए थे तो कुछ में यह काफी गंभीर था.

कोरोना वायरस के चलते हर रोज मौत के आंकड़े सैकड़ों की संख्या में बढ़ रहे हैं और हजारों की संख्या में संक्रमित भी सामने आ रहे हैं. पूरी दुनिया में इस वायरस के कारण डर का माहौल बना हुआ है.

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कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले रखा है. लॉकडाउन जारी है और लोग सोशल डिस्टेंसिंग के तहत घरों में बंद हैं. हर रोज मौत के आंकड़े सैकड़ों की संख्या में बढ़ रहे हैं और हजारों की संख्या में संक्रमित भी सामने आ रहे हैं. पूरी दुनिया में इस वायरस के कारण डर का माहौल बना हुआ है लेकिन इन सबके बीच पॉजीटिव बात यह है कि बहुत से मामलों में लोग ठीक भी हो रहे हैं. जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के आंकड़ों की मानें तो कोविड 19 से जहां अभी तक 48 हजार लोगों के मौत की पुष्टि हुई है वहीं करीब एक लाख 95 हजार से अधिक मामलों में लोग ठीक भी हुए हैं.

कोरोना वायरस से संक्रमित हर शख्स का एक अलग अनुभव है. कुछ में इसके बेहद सामान्य या फिर यूं कहें कि बेहद कम लक्षण नजर आए थे तो कुछ में यह काफी गंभीर था. और कुछ तो ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें लक्षण वो थे ही नहीं जिनके बारे में स्वास्थ्य विभाग सचेत करता रहा है. लेकिन एक बार ये पता चल जाए कि आप संक्रमित हैं तो अस्पताल जाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता.

बीबीसी ने तीन ऐसे लोगों से बात की जिन्हें संक्रमित पाया गया और उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा. ये तीनों मामले एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं लेकिन अस्पताल जाने की इनकी वजह एक ही थी और वो है कोविड19.



'मैं अपने और अपने बच्चे की जिंदगी के लिए लड़ रही थी'



दक्षिण पूर्व इंग्लैंड के केंट कस्बे के हेर्ने बे इलाके में रहने वाली कैरेन मैनरिंग छह महीने की गर्भवती हैं. होने वाला यह बच्चा उनकी चौथी संतान है. कैरेन को खांसी की शिकायत हुई. तब मार्च का दूसरा सप्ताह था. खांसी के साथ उन्हें तेज बुखार भी था और एक दिन सबकुछ बदल गया.

कैरेन बताती हैं, 'मैंने हेल्पलाइन पर फोन किया. मेरी सांस उखड़ रही थी. कुछ ही मिनटों में एक एंबुलेंस मेरे घर के दरवाजे पर खड़ी थी. मैं वाकई सांस नहीं ले पा रही थी इसलिए उन्होंने मुझे सीधे ऑक्सीजन देना शुरू कर दिया.'

जब वो अस्पताल पहुंची तो उन्हें कोरोना वायरस संक्रमित पाया गया. उन्हें निमोनिया की भी शिकायत थी और उसके बाद उन्हें अस्पताल के एक कमरे में अलग रख दिया गया. उन्होंने बताया कि किसी को भी मेरे कमरे में आने और मुझसे मिलने की इजाजत नहीं थी. वहां मुझे बहुत अकेला महसूस होता था. दो-तीन दिन तक तो मैं बिस्तर से उठी तक नहीं. यहां तक की टॉयलेट के लिए भी नहीं गई. जब उन्हें मेरी बेडशीट बदलनी होती थी तो मैं दूसरी करवट हो जाती थी. लेकिन मैं बिस्तर से नहीं उतरी.

उन्होंने आगे बताया कि मुझे सांस लेने में कई बार दिक्कत होती तो भी मुझे अटेंडेंट के पूरी तरह से तैयार होने का इंतजार करना पड़ता. मुझे उसी हालत में कुछ देर रहना पड़ता ताकि जो भी मुझे अटेंड करने आ रहा है वो खुद के सारे सुरक्षा आवरण पहन ले. मेरे परिवार वाले मेरे साथ लगातार फोन पर बात करते रहते थे ताकि मैं शांत बनी रहूं. मैं बहुत डरी हुई थी. मैं मरने जा रही थी और मेरा परिवार कहता था कि वो हर चीज के लिए तैयार हैं.

कैरेन कहती हैं, मैं हर सांस के लिए जूझ रही थी. यह लड़ाई मेरे और मेरे होने वाले बच्चे के लिए थी. उन्होंने आगे बताया कि वह उस दिन को कभी नहीं भूल सकतीं जब वो अस्पताल से बाहर निकली थीं. वो अपने चेहरे पर ताजी और ठंडी हवा को महसूस कर सकती थीं. वह बताती हैं, मैं और मेरे पति गाड़ी में बैठकर घर जा रहे थे. हम दोनों ने मास्क पहन रखा था. लेकिन गाड़ी की खिड़कियां खुली थीं और वो ताजी हवा को महसूस कर रही थीं.

कैरेन मानती हैं कि अस्पताल के उन कुछ अकेले गुजारे हफ्तों ने उनकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया. उन्हें यह समझ आया कि हर छोटी से छोटी चीज का अपना महत्व है. जैसे हफ्तों बाद चेहरे को छूने वाली ताजी-ठंडी हवा का.

कैरेन अब अस्पताल से घर लौट आई हैं लेकिन घर पर वो सेल्फ-आइसोलेशन में हैं. उन्हें घर में मौजूद दूसरे लोगों की आवाज आती है. घर के लोग उनके कमरे में नहीं आते पर बाहर खड़े होकर उनका हौसला जरूर बढ़ाते रहते हैं. वो मानती हैं कि इस संक्रमण ने उन्हें मजबूत बनाया है. उन्हें आशंका है कि कोरोना वायरस संक्रमण उन्हें उस सलून में हुआ जहां वो काम करती हैं, लेकिन इसके लिए वे पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हैं.

मैं सिर्फ इतना चाहती थी कि कोई मेरी मदद कर दे
ये जेसी क्लार्क की कहानी है. जेसी को पहले दिन से पता था कि अगर उन्हें कोरोना वायरस संक्रमण हुआ तो उनके लिए खतरा किसी भी दूसरे संक्रमित शख्स से कहीं अधिक होगा. उन्हें किडनी की एक खतरनाक बीमारी है और पांच साल पहले उनकी एक किडनी रिमूव की जा चुकी है. 26 साल की जेसी को पहले खांसी आना शुरू हुई और उसके बाद उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगी. ये दोनों लक्षण सामने आने के बाद उनकी चिंता बढ़ी. कुछ दिन बाद तो उनका चलना-फिरना भी बंद हो गया. उन्हें चलने में दिक्कत पेश आने लगी थी. वो बताती हैं, 'मेरी पसलियों, पीठ और पेट के पास बहुत दर्द था. मुझे ऐसा लगता था कि किसी ने मुझे बहुत मारा है.'

ब्रिटेन में लॉकडाउन की घोषणा हो चुकी थी. लेकिन जेसी की तकलीफ बढ़ती ही जा रही थी. उनके मंगेतर उन्हें अस्पताल लेकर गए. जहां उनके पहुंचते ही उन्हें अलग एक किनारे कर दिया गया. यह सुरक्षा कारणों और एहतियात बरतते हुए किया गया था. जेसी ने बताया, मुझे अकेले में बहुत डर लग रहा था लेकिन मैं एक ऐसी स्थिति में थी जहां मैं सिर्फ इतना चाहती थी कि कोई मेरी मदद कर दे मुझे हरे रंग का एक मास्क दिया गया. इसके बाद मुझे उस सेक्शन में ले जाया गया जहां कोविड 19 के दूसरे मरीजों को रखा गया था. लेकिन यहां हर एक बेड के बीच एक दीवार थी. जेसी आगे बताती हैं, मेरा कोविड 19 का टेस्ट नहीं किया गया. मेरे डॉक्टर ने मुझे बताया कि वो हर किसी का स्वैब टेस्ट नहीं कर सकते लेकिन यह मानना सुरक्षित रहेगा कि मुझे कोविड 19 है. मेरी छाती में तेज जलन हो रही थी.

जेसी को इससे पहले कभी भी सांस लेने में दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा था. वो कहती हैं अगर आपको सही से सांस नहीं आ रही हो तो आप अंदर से डर जाते हैं. जेसी को अस्पताल में गए छह घंटे हो चुके थे. उनके मंगेतर कार में ही बैठकर उनका इंतजार कर रहे थे. लेकिन उन्हें अंदर क्या कुछ चल रहा है इस बारे में कुछ पता नहीं था. बहुत से लोगों को लग रहा था कि जेसी को यह वायरस उन्हीं से मिला है क्योंकि वो एक कारीगर हैं. पांच दिन बाद जेसी को अस्पताल से छुट्टी मिली. लेकिन चलने में उन्हें अभी भी परेशानी हो रही थी. लौटने के बाद वो 18-18 घंटे सोती रहीं. कई बार उन्हें खांसी भी आई लेकिन अब वो सांस सही से ले पा रही हैं. वो कहती हैं, कुछ युवाओं को लगता था कि उन्हें इस वायरस का कोई असर नहीं होगा लेकिन अब वो इसे गंभीरता से ले रहे हैं. हमें इस बारे में बहुत कुछ बताया गया है. ये भी बताया गया है कि इससे युवाओं को ज्यादा डरने की जरूरत नहीं लेकिन डरने की जरूरत है.

मैं एक ऐसे बंद कमरे में था जहां सिर्फ काला-घुप्प अंधेरा था.
स्टीवर्ट 64 साल के हैं. उन्हें पूरा यकीन है कि उन्हें ये संक्रमण कॉयर मीटिंग के दौरान ही हुआ होगा. वो कहते हैं, हम सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा पालन कर रहे थे लेकिन उस रोज जब कॉयर मीटिंग हुई तो भीड़ कुछ ज्यादा थी. कुछ ऐसे लोग भी आए थे जिनमें फ्लू के लक्षण थे. कुछ सप्ताह पहले हुई इस मीटिंग के दस दिन बाद स्टीवर्ट की हालत खराब होने लगी. पहले इसका असर बहुत कम मालूम पड़ रहा था. लेकिन बाद में सीढ़ी चढ़ने में असमर्थ महसूस करने लगे. ऐसे सांस लेने लगे जैसे कोई बहुत बूढ़ा आदमी लेता है. कुछ दिन बाद मुझे मूवमेंट में तकलीफ होने लगी. वायरस ने मेरे फेफड़े पर हमला किया था. उनके परिवार ने फोन करके मदद मांगी जिसके बाद स्टीवर्ट को अस्पताल में भर्ती कराया गया. वो बताते है कि अस्पताल पहुंचने के बाद उनके कई टेस्ट किये गए और स्वैब टेस्ट भी किया गया. डॉक्टरों को लगा कि उन्हें कोरोना वायरस संक्रमण है जिसके बाद उन्हें ऑक्सीजन पर रखा गया. स्टीवर्ट बताते हैं कि उन्हें एक अकेले अंधेरे कमरे में रखा गया था. वो कहते हैं, मुझे लगा मेरा जीवन खत्म होने वाला है लेकिन मैं जीना चाहता था. मैं अपने भीतर चल रही लड़ाई को महसूस कर सकता था. कुछ दिन बाद स्टीवर्ट को अस्पताल से छुट्टी मिल गई लेकिन घर पहुंचकर भी वो सेल्फ आइसोलेशन में रह रहे हैं. अस्पताल से लौटने के बाद उनकी एक आदत बदल गई है. अब वो पहले की तुलना में बहुत अधिक पानी पीने लगे हैं ताकि उनके फेफड़े और गला पहले की तरह हो सके.

 

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First published: April 3, 2020, 4:01 PM IST
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