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    असम के इस शख्स ने कोरोना से मरे 400 से ज्यादा लोगों का किया अंतिम संस्कार, जानें कहानी

    कोरोना से हुई मौत के बात अंतिम संस्कार का कार्य.
    कोरोना से हुई मौत के बात अंतिम संस्कार का कार्य.

    रामानन्द सरकार (Ramananda Sarkar) दो साल पहले गुवाहाटी के श्मशान घाट पर गए और लोगों का अंतिम संस्कार करने का काम शुरू कर दिया था. उन्होंने महामारी के इस दौर में 400 से अधिक लोगों का अंतिम संस्कार किया है और इन सभी की मौत कोरोना वायरस (Coronavirus) के कारण हुई थी.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 6, 2020, 12:15 PM IST
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    कोरोना वायरस (Coronavirus) महामारी और उसके बाद के लॉकडाउन (Lockdown) का दुनियाभर के लोगों के जीवन पर एक बड़ा प्रभाव पड़ा है. अर्थव्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया गया है और सैकड़ों हजारों लोगों को या तो नौकरी (Job) से हाथ धोना पड़ा या वेतन भुगतान में कमी आई है. ऐसी ही कहानी रामानन्द सरकार (Ramananda Sarkar) की है, जो आजीविका के लिए हर दिन अपना जीवन जोखिम में डाल रहे हैं. यह 43 वर्षीय व्यक्ति उत्तर-पूर्वी असम के अपने सुदूर गांव से उस समय भाग गए थे जब वह लोन (Loan) चुकाने में असमर्थ हो गए थे. गन्ने का रस बेचने का काम शुरू करने के लिए उन्होंने कर्ज लिया था. असम की राजधानी दिसपुर आने के बाद भी उन्हें पर्याप्त काम खोजने में परेशानी का सामना करना पड़ा.

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    हिन्दू मान्यता के अनुसार अंतिम संस्कार का अधिकार पवित्र है और यह मृत आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त करता है. जो लोग यह काम करते हैं, उन्हें नीचा देखा जाता रहा है. रामानन्द सरकार दो साल पहले गुवाहाटी के श्मशान घाट पर गए और लोगों का अंतिम संस्कार करने का काम शुरू कर दिया था. रामानन्द सरकार ने महामारी के इस दौर में 400 से अधिक लोगों का अंतिम संस्कार किया है और इन सभी की मौत कोरोना वायरस के कारण हुई थी.



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    रामानन्द सरकार का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि लोग उनसे नफरत क्यों करते हैं. वह मृत शरीर को जलाता हैं इसलिए? अगर वह नहीं करेंगे तो कौन करेगा? आपको बता दें कि कोरोना वायरस महामारी के समय लोगों ने घरों से बाहर नहीं निकलने में ही अपनी भलाई समझी. ऐसे में रामानंद सरकार की कहानी प्रेरणा देती है. अपनी जान की परवाह किए बिना इस व्यक्ति ने नेक काम करने का बीड़ा उठाया और अब उनकी तारीफ भी हो रही है. शुरू में उनके लिए यह सफर काफी मुश्किल भरा रहा लेकिन बाद में उन्होंने इसे ही अपना कर्तव्य समझा.
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