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कैंसर ने छीना मां और भाई को, अब मरीजों को निःशुल्क अस्पताल पहुंचा रहा ये ऑटो ड्राइवर

हर्षवर्धन इस अनोखे तरीके से कर रहे कैंसर पीड़ितों की मदद

हर्षवर्धन इस अनोखे तरीके से कर रहे कैंसर पीड़ितों की मदद

कैंसर की वजह से मुझसे मेरे सबसे करीबी रिश्ते चले गए. अब जब मैं मरीजों को ऑटो में बिठाकर अस्पताल पहुंचाता हूं और वे आशीर्वाद देते हैं तो मुझे लगता है मानो भगवान असीस रहे हैं.

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    त्रिपुरा के अगरतला की सड़कों पर कोई ऑटो तेजी से लेकिन संभलते हुए चलता दिखे तो उसपर ध्यान दें. ये हर्षवर्धन दास बैद्य का ऑटो हो सकता है जो कैंसर के मरीजों को हिफाजत से अस्पताल पहुंचाने की कोशिश में हो. ये ड्राइवर कैंसर के मरीजों को बगैर पैसे लिए ऑटो में बिठाता और अस्पताल पहुंचाता है.

    हममें से कितने ही लोग हैं जो जिंदगी में आई किसी त्रासदी के बाद एकदम टूट जाते हैं, खुद को अंधेरों में डुबो देते हैं लेकिन कई चेहरे ऐसे भी हैं जो तकलीफ को रौशनी का जरिया बना लेते हैं. त्रिपुरा के अगरतला के हर्षवर्धन से मिलना उन्हीं में से एक चेहरे से मुलाकात है. 44 साल के हर्षवर्धन महीने में 10 से 12 हजार रुपए ही कमा पाते हैं लेकिन इसके बावजूद कैंसर के मरीजों को फ्री राइड देते हैं. उनसे बतियाते हैं, छोटे से सफर में जितना हो सके, उनके आंसू पोंछने की कोशिश करते हैं.



    इसकी शुरुआत हुई साल 2005 से. उनकी नई-नई शादी हुई थी. मां लिवर कैंसर की मरीज थी लेकिन बीमारी के बाद भी उनके दिल में भी बेटे की नई गृहस्थी के लिए ढेरों सपने थे. खुद को संभालकर घर-बार की बातें बेटे और नई बहू को सिखा रही थी कि तभी सख्त बीमार हुई और चल बसी. हर्षवर्धन और उनकी पत्नी को इससे भारी धक्का लगा.

    नई जिंदगी की शुरुआत में जिसके आशीर्वाद की जरूरत थी, वही नहीं रही. हम जैसे-तैसे संभले ही थे कि तभी पता चला कि भाई को भी लिवर कैंसर है. उसकी तकलीफें देखकर रातों को नींद नहीं आती थी. सोचना शुरू किया तो लगा कि जब तक कैंसर के मरीजों के लिए कुछ नहीं करूंगा, ऐसे ही तकलीफ में रहूंगा.

    तब मैं कारपेंटर हुआ करता था. सरकारी लोन लेकर ऑटो खरीदा, उसपर कैंसर के खिलाफ जागरुकता संदेश लिखवाया और शहर की सड़कों पर उसे लेकर चलने लगा. सवारियां देखतीं, इसपर बात करतीं तो लगता कि मैं सही जा रहा हूं. हालांकि अब भी कुछ खलता था. फिर मैंने सप्ताह के एक दिन कैंसर के मरीजों और उनके घरवालों को ऑटो में बिना पैसे लिए बिठाना शुरू किया.

    सुनने में ये कुछ भी नहीं लेकिन मरीजों और परिवार के लिए इतना भरोसा ही काफी है कि लोग उनकी तकलीफ समझते हैं. उस छोटे से सफर के दौरान मैं मरीजों से बात करता हूं, जरूरत हो तो अपनी कहानी भी उन्हें सुनाता हूं ताकि बीड़ी-तंबाखू जैसी आदतों से वे दूर रहें.



    एक वक्त पर दिन की शुरुआत तंबाखू के करने वाले हर्षवर्धन अब अपनी तरह से कैंसर पर जागरुकता फैला रहे हैं. इसके लिए उन्होंने अपनी आय के एकमात्र स्त्रोत यानी अपनी ऑटो पर संदेश लिखवाया है. मरीजों को ऑटो में बिठाकर अस्पताल ले जाते हुए वे उनसे बातें करते हैं, उनके हाल-चाल लेते हैं और सहज आत्मीयता से उन्हें सलाह भी देते हैं. कई मरीजों से इतनी जान-पहचान हो गई है कि वे उनके साथ अस्पताल के चक्कर भी काट लेते हैं.

    मां की मौत के बाद से मैं हर बुधवार को कैंसर के मरीजों को ऑटो में बिठाकर मुफ्त में अस्पताल पहुंचाता लेकिन भाई की मौत के बाद से मैंने इसमें एक और दिन जोड़ दिया. हालांकि लोगों को मुफ्त में लाने-छोड़ने के कारण परिवार चलाने में दिक्कत तो आती है लेकिन हमने मिल-जुलकर इसे संभाल लिया. पत्नी सिलाई का काम करने लगी और मैं थोड़ी ज्यादा मेहनत. दिन के कुछ घंटे ज्यादा थकने से अगर मैं कैंसर जैसी बीमारी के शिकार लोगों को थोड़ी भी राहत दे सकता हूं तो मैं ये खुशी-खुशी करूंगा.

    हर्षवर्धन ने अपने बेटे को भी कैंसर जागरुकता अभियान से जोड़ रखा है. हाल ही में उसने अपने सीने पर धूम पान कोरबे ना यानी धूम्रपान मत करें, लिखवाया और एक अभियान में बच्चों की टोली में सबसे आगे चला. पिता अपने बेटे की इस मासूम कोशिश को गर्व से बांटते हैं.

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