भारत की पहली महिला जासूस, पढ़िए रजनी पंडित की आत्मकथा

Pooja Prasad | News18Hindi
Updated: August 28, 2019, 11:58 AM IST
भारत की पहली महिला जासूस, पढ़िए रजनी पंडित की आत्मकथा
रजनी पंडित, महिला जासूस

रजनी (Rajani Pandit) को पहला अवॉर्ड 1990 में मिला और आज 30 साल से कम समय में ही 67 अवॉर्ड मिल चुके हैं. लोग कहते थे कि जो औरत लोगों का घर तोड़ रही है उसे क्यों अवॉर्ड दिया गया.

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क्या वजह हो सकती है कि कोई व्यक्ति जासूस (detective) बनने की सोचे? जासूस बनने में रोमांच तो है लेकिन जोखिम भी बहुत है, और अगर प्रफेशनली अपना लिया जाए तो खांडे की धार पर चलने जैसा है.  जासूसी के तरीकों के वैध-अवैध होने का खतरा और आशंकाएं तो हैं ही, जान पर भी तो बन आती होगी! दरअसल, जासूसी के खतरों को हम भांप तो सकते हैं मगर आंक नहीं सकते. आखिर फिर क्यों इस लेडी डिटेक्टिव ने रजनी इंवेस्टर्स (Rajani Investors) के नाम से अपनी डिटेक्टिव एजेंसी शुरू की. कारोबार ही करना था तो यही क्यों... पैरों पर खड़ा होना था तो कोई सुरक्षित नौकरी क्यों नहीं की... सवाल मेरे मन में कई थे. लेकिन जवाब मुझे गूगल से नहीं चाहिए थे, खुद इस कंपनी की 'मालकिन' और आजाद भारत की पहली महिला जासूस कही जाने वाली रजनी पंडित (Rajani Pandit) से चाहिए थे...

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महाराष्ट्र में जन्मीं और पली-बढ़ीं रजनी पंडित तो कहती हैं, 'कभी सोचा ही नहीं था कि डिटेक्टिव बनूंगी. आम लोगों की तरह नौकरी करके ठीक- ठाक कमाऊं. घर चलाऊं. जैसे सभी करते हैं.. बस यही चाहती थी. पढ़ाई में भी कोई खास नहीं थी... ऐवरेज स्टूडेंट थी..' तो ये जो जासूसी का आइडिया था, किसी फंतासी की उपज नहीं था.

यह पहला वाकया था... कॉलेज में की थी पहली जासूसी

22 साल की उम्र में अपना पहला केस सुलझाने वाली रजनी बताती हैं कि तब वह कॉलेज में थी. उनकी क्लासमेट जो कि 'अच्छे घर की लड़की थी, एक बार फोन पर किसी को बता रही थी कि कैसे वह अपनी फैमिली को बेवकूफ बना रही है. मुझे अजीब लगा. सोचा कि कुछ इंक्वॉयरी करनी चाहिए.. फिर उसके परिवार से बात करूंगी.. तब मैंने उसका पीछा किया तो पाया कि वह गलत लोगों से मिलती जुलती है. फिर मैंने उसके परिवार को बताया तो वे लोग मुझ ही से नाराज हो गए. भला बुरा कहा. बाद में जो जानकारी और सूचनाएं मैंने दीं...उससे उसके परिवार को यकीन हुआ और वे लोग सतर्क हुए. उन्होंने धन्यवाद देते हुए कहा कि अरे आप तो स्पाई (Spy) हो!' संभवत: यह पहला वाकया था जिसने मन में एक बीज सा बोया होगा. इसके बाद ऐसे ही कुछ और वाकयात हुए... और रजनी को लगा कि बस यही राह चलनी है...

पिता नहीं चाहते थे कि जासूसी करें...
जासूसी को लेकर लोगों को मन में रोमांच का फील होता है. सही बात है.. मगर रोमांच फिल्मों और नॉवेल्स तक सीमित होता है. रजनी से बात करके यह यकीन और मजबूत हुआ कि इस 'लाइन' में रिस्क बहुतेरे! दूसरे, महिला होने के नाते रास्ते में बाधाओं की गिनती कुछ बढ़ गई थी...
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दरअसल, पिता CID में थे और बिल्कुल नहीं चाहते थे कि रजनी 'यह सब' करें. वह कहते थे कि ज़रा सी गलती होती है तो लोग उंगली उठाते हैं और शिकायतें करते हैं. रजनी बताती हैं कि मैंने उन्हें कन्विंस किया कि डर के मारे कुछ नहीं करेंगे तो जीवन भर कुछ नहीं कर पाएंगे और कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे. वह हंसते हुए कहती हैं कि 'उस वक्त पता नहीं था कि मैं ही वह पहली महिला हूं जो डिटेक्टिव होने वाली है.. मतलब.. पहली लेडी डिटेक्टिव हूं.'

रजनी पंडित (Rajani Pandit)
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रिश्तेदार भी मारते थे ताने-
रास्ते की खास बात यह है कि वह केवल नुकीले पत्थरों से ही नहीं बना होता, समय-समय पर कोमल फूलों के अहसास भी सफर के दौरान मिलते हैं. रजनी की मां ने हर बार यही कहा, 'वह जो करना चाहती है, कर जाएगी. हिम्मती है... मुझे भरोसा है उस पर.' रजनी के लिए यह भला संबल से कम क्या होता! वहीं, परिवार के अन्य सदस्य और रिश्तेदार टीका-टिप्पणी करने से बाज नहीं आते. साथ ही, 'जिन लोगों को मेरे इस काम से मदद मिली उनके आशीर्वाद से मैं सफल हूं.. पहले के समय में पुलिस मदद करती थी. और गाइड भी कर देते कि किसी गैरकानूनी पचड़े में न फंस जाऊं. जिन लोगों के प्रोजेक्ट लेती हूं, उनसे कागजात पर साइन लेती हूं.. कि आपने हमें हमारी सेवाओं के लिए हमें हायर किया है.'

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अखबार में इंटरव्यू छपने से हईं मशहूर-
'एक वक्त ऐसा था जब अखबार वाले मेरा विज्ञापन तक नहीं स्वीकार करते थे!', उस वक्त को याद करते हुए कहती हैं रजनी. कहते थे कि 'एक लड़की है, जासूसी का काम कैसे कर पाएगी.' फिर जब नौकरी छोड़कर फुल फ्लेज्ड तौर पर यह काम शुरू करने का मन बनाया तब होम डिपार्टमेंट गईं. वहां यह जानकारी हासिल करने की कोशिश की कि प्रफेशनली जासूसी के काम के लिए क्या कोई लाइसेंस चाहिए होता है तो उन्हें बताया गया कि 'ऐसा कोई लाइसेंस नहीं मिलता. 3 साल तक काम किया और जब इसी बीच इंटरव्यू छपा तो लोगों में पहचान बननी शुरू हुई. फिर ऐड देने की जरूरत नहीं पड़ी. 1988 में रजनी इन्वेस्टिगेशन्स नामक कंपनी बनाई जिसमें 3 लोग थे. आज 20 लोग बतौर जासूस जुड़े हैं जो स्वतंत्र रूप से भी जासूसी के प्रोजेक्ट लेते हैं. हाल ही में 'ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे' ने भी उन्हें फीचर किया, जहां उन्होंने बताया कि अब तक उन्होंने 80 हजार से ज्यादा केस सुलझाए हैं.

राष्ट्रपति से मिल चुका है अवॉर्ड-
रजनी को पहला अवॉर्ड 1990 में मिला और आज 30 साल से कम समय में ही 67 अवॉर्ड मिल चुके हैं. पहले तो लोग कहते थे कि जो औरत लोगों का घर तोड़ रही है उसे क्यों अवॉर्ड दिया गया. मगर कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने कहा कि बीमारी पहले पता चल जाए तो अलर्ट हो जाते हैं...' उनकी इंवेस्टिगेशन को कई लोगों ने इसलिए पसंद किया क्योंकि उन्हें लगता था कि समस्या के विकराल होने से पहले प्रॉपर इंवेस्टिगेशन के चलते वे अलर्ट हो लेते हैं. खुश होते हुए रजनी बताती हैं कि पिछले ही साल राष्ट्रपति कोविंद ने उन्हें 'फर्स्ट लेडी डिटेक्टिव' का अवॉर्ड दिया है. यह अवॉर्ड उन्हें महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से दिया गया.

वे लड़कियां जो डिटेक्टिव बनना चाहती हों, उनके लिए क्या कहना चाहेंगी..
सवाल सुनकर उत्साह से भर गईं रजनी. 'पुलिस और डिटेक्टिव का काम एक जैसा होता है', कहते हुए बोलीं, 'डिटेक्टिव बनने के लिए तेज दिमाग चाहिए. हिम्मत की कहीं कमी न पड़े. निर्णय लेने की क्षमता सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर्स में से एक है. क्योंकि, कई बार आप ऐसी सिचुएशन में फंस सकती हैं जब आपको तुरंत सोचना होगा कि इससे बाहर कैसे निकलें.'

इस सीरीज में हम आपको जल्द ही मिलवाएंगे ऐसी ही एक और महिला से, एक बार फिर लॉगइन करें आप News18 Hindi Online, और पढ़िए उनका रोचक सफर...

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First published: August 28, 2019, 10:33 AM IST
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