मरीज का इलाज करने से लेकर, जूतों के इलाज तक का शाज़िया कैसर का सफर

Pooja Prasad
Updated: August 26, 2019, 11:59 AM IST
मरीज का इलाज करने से लेकर, जूतों के इलाज तक का शाज़िया कैसर का सफर
आम औरतें, जिनके सपने थे खास.. हौसलें थे बुलंद...

शाज़िया से हमने जब पूछा कि यहां कौन जूते ठीक करवाने के लिए स्पेशल सर्विस लेता है? यह तो भारत में चलन ही नहीं है. तब वह बोलीं - फोन और टीवी को लेकर तो सर्विस सेंटर होता है लेकिन मंहगे से मंहगे जूतों के लिए कोई सर्विस सेंटर नहीं है.

  • Last Updated: August 26, 2019, 11:59 AM IST
  • Share this:
'पापा को लगा कि जब यही सब करना था तो इतनी पढ़ाई-लिखाई क्यों की. शोरूम खोल लो... कोई और डीसेंट काम कर लो... ये जूते चप्पल का काम क्यों करोगी?' मायके वालों को लग रहा था कि नाम खराब हो जाएगा. उन्हें लग रहा था, सफेद कोट में एसी में काम करने वाले लोग जब 'जूते-चप्पल ठीक' करेंगे तब कितना बुरा लगेगा. ये सब काम वैसे भी मर्दों को शोभा देते हैं. फुटवियर सेक्शन वैसे भी पुरुषप्रधान सेक्टर है.

शाजिया कैसर (Shazia Qaiser). फिजियोथेरेपी में ग्रेजुएशन. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) से लेकर यूनिसेफ (UNICEF) तक के लिए काम. प्राइवेट प्रैक्टिस और फिर गवर्नमेंट जॉब का अनुभव भी. फैमिली बैकग्राउंड- सिविल सर्विस वाला. दूर-दूर तक परिवार में न किसी ने बिजनेस किया और न ही शॉप चलाई. अब ऐसे में जब ठीक-ठाक काम धंधे को छोड़कर कोई ऐसा काम करने निकले जिसका न नाम सुना हो और न ही मार्केट, तो अपनों को एकबारगी अजीब लगना ही था. फिर महिलाओं को बिजनस के लिए आमतौर पर हतोत्साहित ही किया जाता है, नौकरी भी 21वीं सदी में कहीं जाकर कुछ वर्गों में सामान्य ली जाने लगी है. शाजिया कैसर को तो धुन सवार हो गई थी.

कभी मैगजीन में पढ़ा था, शू क्लीनिंग सर्विस के बारे में. तब फिजियोथेरेपी की पढ़ाई कर रही थी लेकिन दिमाग में आइडिया अटक गया. हालांकि नौकरी और शादी की जद्दोजहद में यह सपना कहीं दफन-सा हो गया था. फिर घर-गृहस्थी और बाल-बच्चे के लालन-पालन में कब समय निकल जाता, पता ही नहीं चलता था. जब बच्चा बड़ा होने लगा तो उसे खुद को अकेलापन लगने लगा. सोचा, कोई बिजनस कर लूं. मन तो था ही और बार-बार जेहन में वह आइडिया भी गूंज रहा था जिसे करने की सालों साल पहले तमन्ना जगी थी.
जूतों की देखभाल या यूं कहें जूतों का हॉस्पिटल जैसा कुछ काम ज्यादातर लोगों को एकबारगी तो समझ ही नहीं आता था. जिन्हें समझ आ जाता, वे कहते यह बेकार का आइडिया है. जिन्हें आइडिया ठीक लगता उन्हें शहर का माहौल औऱ मिजाज ऐसा नहीं लगता था कि ऐसा काम किया जाए. लोग कहते - पटना में इसके लिए एक ग्राहक नहीं मिलेगा. किसी को लगता - फिजियोथेरेपिस्ट जैसा सम्मानजनक काम करके, अब ऐसा काम करोगी... अजीब है. जब अपने मुंह सिकोड़ते हैं न, तो अजीब लगता है, लेकिन संभवत: यहीं हमें हमारा पैशन सहारा देता है.

पैरेंटल फैमिली ने सपोर्ट नहीं किया था. मगर, फिर उन्हें यह कहकर भरोसा दिलाया कि सफल नहीं हुई तो सब छोड़कर वापस नौकरी पर आ जाऊंगी लेकिन एक मौका तो तो लेने दो. ससुराल पक्ष के लोगों ने कहा कि पति अगर राजी है तो हमें दिक्कत नहीं. पति कहते थे कि बिजनेस तुम नहीं कर पाओगी लेकिन पत्नी की इच्छा का मान रखा और 'एक कोशिश' के लिए उन्होंने हामी भर दी.

शाज़िया कैसर, शू लॉन्ड्री


2014 की उस दोपहर 'रिवाइवल शू लॉन्ड्री प्राइवेट लिमिटेड' (Revival shoe laundry pvt ltd) नाम से कंपनी शुरू की. 1 लाख रुपये से शुरू किया और आज लगभग 25 लाख सालाना की अर्निंग है. जब शुरू किया था तो बस तीन लोग थे- रिसेप्शनिस्ट, मोची और वह खुद. अब 15 लोग हैं.
Loading...

रास्ते में जो रोड़े आए...
36 साल की शाज़िया से हमने जब पूछा कि यहां कौन जूते ठीक करवाने के लिए स्पेशल सर्विस लेता है? यह तो भारत में चलन ही नहीं है. तब वह बोलीं - फोन और टीवी को लेकर तो सर्विस सेंटर होता है लेकिन मंहगे से मंहगे जूतों के लिए कोई सर्विस सेंटर नहीं है. रीटेलरों से संपर्क किया और कहा कि कस्टमर्स और अपने खुद के प्रॉडक्ट से जुड़ी समस्या के लिए हमें काम दें. शाज़िया बताती हैं, 'शुरू में ऐसे जूते देते थे जो पूरी तरह से टूटे फूटे हों और सड़क पर फेंक दिए गए हों... हालांकि हमने वह भी ठीक करके दिया. ऐसी कुछ घटनाओं के बाद उनका हम पर विश्वास बना... हमें काम देने लगे और हम मेहनत करके उन्हें अच्छे से लौटाते.' कहती हैं शाज़िया. 'अब सोसायटीज़ में जाकर अपने बिजनस का प्रचार करते हैं ताकि लोगों को पता चले कि इस तरह का आपका काम भी होता है. पिक एंड ड्रॉप फैसिलिटी हम देते हैं.'

शाज़िया कहती हैं, 'मुझे कुछ भी पता नहीं होगा.. ऐसा वे सोचते थे... बाद में उन्हें मेरी बातों और मेरे काम से यकीन हुआ. कस्मटर से उन्हें फीडबैक जब मिला तब उन्हें मुझ पर भरोसा बना. लोगों को भी सर्विस लेने के बाद 'अडिक्शन' हो गया... आखिर क्लीन शूज पहनने की आदत हो गई.' अब काम मिलता है और अच्छे से मिलता है. यह सही है कि उनकी ग्रोथ दिन दूनी, रात चौगुनी नहीं है. अन्य कुछ बिजनेसेस के मुकाबले उनकी ग्रोथ स्लो है लेकिन ग्राफ का ऊपर की ओर जाना जारी है और यह काफी संतोषजनक है. आखिर मन का करना और ठीक-ठाक कर पाना... यह संतोषजनक तो है ही.

शू लॉन्ड्री की नींव शाज़िया कैसर ने 2014 में रखी..


शाज़िया कहती हैं कि बहुत उतार-चढ़ाव आए लेकिन कभी ऐसी निराशा नहीं हुई कि वापस अपनी फिजियोथेरेपी वाली फील्ड में जाऊं. अब एक ठीक-ठाक मॉडल डेवलप हो गया है और टीम भी बन रही है. ऐसे में कोई मतलब ही नहीं कि वासप मुडूं... फुल फ्लेज्ड इस पर काम करूं, और करती रहूं... बस यही कोशिश है.

अपना खुद का कारोबार शुरू करने वाली औरतों के लिए आपका कोई मेसेज या टिप्स?
शाज़िया कहती हैं - आप जिस भी आइडिया पर काम करना चाहती हों जो भी बिजनेस करना चाहती हों तो पहले मार्केट सर्वे कर लें. पूरी प्लानिंग कर लें. यानी, 'फंडामेंटल ऑफ दैट बिजनेस' आप समझ लेती हैं तो आपको अपनी राह चलना और सफलता प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है. इसलिए जो भी काम करना है, उसे लेकर होमवर्क कर लें. ताकि जिस बिजनस को आप करना चाहती हैं उसे लेकर कम से कम दिक्कतें आएं.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए लाइफ़ से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: August 23, 2019, 12:22 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...