लाइव टीवी

ये जो आप गुस्से में हैं, जानते हैं क्यों है?

News18Hindi
Updated: November 6, 2019, 1:58 PM IST
ये जो आप गुस्से में हैं, जानते हैं क्यों है?
एक अध्ययन के मुताबिक प्रदूषण के सूक्ष्म कणों की अधिकता और ओजोन इंसानी व्यवहार पर असर डालती है.

हमें लगता जरूर है कि हम अपने जीवन को संचालित कर रहे हैं लेकिन हमारे शरीर को कहीं न कहीं प्रकृति ही संचालित कर रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 6, 2019, 1:58 PM IST
  • Share this:
(पंकज रामेन्दु)

'एन अमेरिकन वेरवुल्फ इन लंदन' से प्रेरित 1992 में आई फिल्म ‘जुनून’ में नायक को एक श्राप मिलता है और वह पूर्णिमा के दिन शेर बन जाता है. शेर इसलिए क्योंकि नायक पूर्णिमा के दिन जंगल में एक शेर के शिकार पर जाता है और वहीं उसके साथ ऐसी घटना पहली बार घटती है. फिल्म की कहानी में दो अहम पहलू हैं, पहला नायक के अंदर का शेर हर बार पूरे चांद की रात में ही जागता है. दूसरा वो हिंसक है. मानव शरीर जिन पांच तत्वों से मिलकर बना हुआ माना जाता है उसमें पानी का स्थान सबसे ऊपर रखा गया है. हमारे शरीर में 70 फीसदी पानी होता है. पूरे चांद की रात के दौरान समुद्र में ज्वार-भाटा आता है क्योंकि चंद्रमा पानी को अपनी ओर आकर्षित करता है और उसमें उथल-पुथल मच जाती है.

इसे भी पढ़ेंः प्रदूषण से बचने के लिए लगाया जाने वाला मास्क भी हो सकता है खतरनाक- साइंटिस्ट

हम प्रकृति से अपने नाते को नकार नहीं सकते

यही उथल-पुथल हमारे शरीर में भी होती है और पूरे चांद की रात के दौरान सभी जीवित प्राणियों में एक बैचेनी से होती है. इंसानों में एक हिंसक प्रवृत्ति बढ़ जाती है. बताया जाता है कि ऐसी रात कुछ लोग या तो आत्महत्या करने की सोचते हैं या किसी को मारने की. यही वजह है कि मस्तिष्क से जुड़ी किसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को उस दिन ज्यादा सावधानी रखने के लिए कहा जाता है. दरअसल हम कितनी कोशिश कर लें लेकिन हम प्रकृति से अपने नाते को नकार नहीं सकते हैं. यही नहीं हमें लगता जरूर है कि हम अपने जीवन को संचालित कर रहे हैं लेकिन हमारे शरीर को कहीं न कहीं प्रकृति ही संचालित कर रही है. बीते दिनों जिस तरह से लोगों में बेवजह की हिंसा, उन्माद देखने को मिल रहा है, इसके पीछे की वजह प्रकृति में लगातार होता असंतुलन हो सकता है.

प्रदूषण और हिंसक अपराधों के बीच संबंध

अमेरिकन शोधकर्ताओं का दावा है कि प्रदूषण और हिंसक अपराधों के बीच संबंध है. एक अध्ययन के मुताबिक प्रदूषण के सूक्ष्म कणों की अधिकता और ओजोन इंसानी व्यवहार पर असर डालती है. अभी तक तो प्रदूषण को केवल शारीरिक परेशानियों के साथ जोड़ कर देखा जा रहा था लेकिन अब शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे दिमाग पर भी असर पड़ता है. शोधकर्ताओं ने अमेरिका के कस्बों से 2006 से 2013 तक के कुछ आंकड़े जुटाए और उनका अध्ययन करने पर वो इस नतीजे पर पहुंचे. कोरारोडो यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के शोधकर्ताओं की रिपोर्ट के हिसाब से, पीएम 2.5, ओजोन के स्तर में बदलाव का हिंसक अपराध में सीधा असर देखा गया है.
Loading...

 प्रदूषक तत्व दिमाग का बर्ताव बदलते हैं

खासतौर पर ऐसे मामलों में जहां किसी एक शख्स ने गुस्से में आकर किसी पर हमला किया हो, वहां प्रदूषण को एक अहम कारण के रूप में देखा गया है. पीएम 2.5 के स्तर में 10 फीसदी इजाफे से इस तरह के हमलों में 0.14 फीसदी तक इजाफा देखने को मिला है. इसी तरह ओजोन के स्तर पर 10 प्रतिशत की वृद्धि होने पर हिंसक मामलो में 0.3 प्रतिशत बढ़ोतरी की वजह बनना देखने को मिलती है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसी कई बातें है जो ये साबित करती हैं. दरअसल प्रदूषक तत्व आपके शरीर में जाकर खून में मिलते हैं और आपके दिमाग का बर्ताव बदल जाता है.

इसे भी पढ़ेंः बच्चों को प्रदूषण से इस तरह बचाएं: WHO

ग्लोबल वार्मिंग इंसानों में हिंसा की प्रवृत्ति को बढ़ा रहा है

यही नहीं कई अलग-अलग शोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती पर बढ़ता तापमान इंसानों में हिंसा की प्रवृत्ति को बढ़ा रहा है. एन्युअल रिव्यू ऑफ पब्लिक हेल्थ की ग्लोबल वार्मिग एंड कलेक्टिव वायलेंस नाम की स्टडी के मुताबिक 2004 से 2013 तक अफ्रीका में हिंसा के सबसे ज्यादा मामले देखने को मिले. यही नहीं पूरी दुनिया भर में दो करोड़ से अधिक शरणार्थियों में से 41 फीसदी अकेले उन तीन युद्धरत देश सीरिया, अफगानिस्तान और सोमालिया से हैं. खास बात ये है कि बीते दिनों ग्लोबल वार्मिंग का असर इन्हीं देशों में सबसे ज्यादा देखा भी गया है.

मौसम में बदलाव का आतंकवाद से सीधा नाता है

वहीं अगर हम ठंडे प्रदेशों पर नजर डालें तो हमें अपेक्षाकृत कम हिंसा के मामले नजर आते हैं. वहीं एक रिपोर्ट के मुताबिक लगातार होती बारिश में कमी, जंगलों के कटाव की वजह से बढ़ती गर्मी और प्रदूषण ने भी आंतरिक झगड़ों में इजाफा किया है. अमेरिका के प्रेसिडेंट चुनाव के दौरान होने वाली बहस में बर्नी सेंडर्स से पेरिस अटैक पर सवाल पूछा गया था कि क्या वो अब भी क्लाइमेट चेंज को सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा मानते हैं. इस सवाल के जवाब में बर्नी सेंडर्स का कहना था कि मौसम में बदलाव का आतंकवाद में हो रही बढ़ोतरी से सीधा नाता है और अगर हम लोग अभी भी एक जुट नहीं हुए और वैज्ञानिकों की बात पर ध्यान नहीं दिया तो मान कर चलिए कि आने वाले समय में पानी, जमीन, फसल की घटती सीमाओं को लेकर अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर अलगाव देखने को मिलेगा.

प्रदूषण में पराली एक अहम वजह

हालांकि उनके इस जवाब का सोशल मीडिया पर काफी मजाक बनाया गया था. एक ट्वीट में तो यहां तक लिखा गया था कि सैंडर्स का कहना है कि मौसम में हो रहा बदलाव आंतकवाद से भी बड़ा खतरा है. सर आइसबर्ग फटता नहीं है. आखिरकार मौसम को लेकर हम कितने चिंतित हैं इस बात का जवाब अमेरिका ने ट्रंप का चुनाव करके दे दिया था. भले ही लोगों ने सैंडर्स का मजाक बनाया हो लेकिन अगर हम इसके मूल में जाकर देखें तो हमें उनकी बात वैसे ही सच लगेगी जिस तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री का कुछ दिनों पहले ये कह कर मजाक बनाया गया था कि उन्हें सिर्फ पराली की रट लगाना आता है. कई संस्थाओं ने भी कहा की पराली का प्रदूषण में योगदान महज 10 फीसदी है, बाद में सभी को ये मानना पड़ा कि पराली एक अहम वजह है.

सीरिया में लगभग 1.5 करोड़ लोग अपनी जगह से विस्थापित हुए

एक बार सेंटर फॉर क्लाइमेट एंड सिक्योरिटी के प्रेसिडेंट और को-फाउंडर फ्रांसेस्को फेमिया ने एक साक्षात्कार में बताया था कि 2006 से 2011 के वक्त पर गौर करें तो सीरिया के विद्रोह की शुरुआत दारा से हुई. इस दौरान सीरीया ने आधुनिक इतिहास के सबसे भयानक सूखे को झेला जब यहां की लगभग 60 फीसदी ज़मीन पानी के लिए तरस रही था. इस सूखे के साथ तत्कालीन प्रेसिडेंट के प्राकृतिक संसाधनों की बदइंतज़ामी और बुरी कृषि तकनीकों की बदौलत एक भयानक हालत पैदा हो गई थी. इस वजह से सीरिया में लगभग डेढ़ करोड़ लोग अपनी जगह से विस्थापित होने को मजबूर हो गए थे.

धरती पर मुफ्त में कुछ मौजूद है तो वो है कार्बन

फेमिया का कहना था कि हम पूरा दोष क्लाइमेट चेंज पर नहीं मढ़ सकते हैं लेकिन हम इसको एक वजह मानने से इनकार भी नहीं कर सकते हैं. उसी तरह हम ये तो नहीं कह सकते है कि प्रदूषण की ही वजह से हिंसक प्रवृत्ति बढ़ रही है लेकिन हम इसके वजह होने से इनकार भी नहीं कर सकते हैं. कुछ वक्त पहले आई शॉर्ट फिल्म ‘कार्बन’ 2067 की स्थिति बताती है कि किस तरह पूरी धरती पर ऑक्सीजन एक इंडस्ट्री प्रोडक्ट बन कर रह गया है. अगर धरती पर मुफ्त में कुछ मौजूद है तो वो है कार्बन. यहां पर या तो सरकारी राशन से ऑक्सीजन मिलती है जिसकी क्वालिटी पूरी तरह से गई गुजरी है या फिर ब्रांडेड ऑक्सीजन जिसकी कीमत बहुत ज्यादा है. इसके अलावा हिमालयन ऑक्सीजन भी है जिसकी तस्करी होती है.

इसे भी पढ़ेंः वायु प्रदूषणः Delhi-NCR में धुआं-धुआं, ये 5 पौधे फिल्टर करेंगे घर की हवा

माहौल तो तब ही खराब हो गया था जब पहली फैक्ट्री लगी थी

मार्स से पैसे वाले लोग इसे ड्रग्स की तरह लेने आते हैं. मार्स से आए नवाजउद्दीन जो धरती पर हिमालय की शुद्ध ऑक्सीजन का सेवन करने आए हैं जब वो जैकी भगनानी को पानी का ऑफर देते हैं तो जैकी बोलते हैं कि पहली मुलाकात में पानी दे रहे हो पक्का मार्स से आए हो. नवाज उन्हें बोलते हैं तुम लोगों के लड़ने की फितरत तो कमाल की है लेकिन तुम लोग इतने उलझे हुए थे कि प्रकृति की चेतावनी को समझ नहीं पाए. माहौल तो तब ही खराब हो गया था जब पहली फैक्ट्री लगी थी और जब दिल्ली की नदियों से झाग निकलने लगा वो ताबूत में आखरी कील था.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए लाइफ़ से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 6, 2019, 1:58 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...