करियर और पैसा बहुत जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है सुकून के कुछ पल

सुबह से रात के कई सेशन लिए, लेकिन थकान का नाम नहीं था, क्योंकि दफ्तर का वर्कलोड, बॉस की डांट, घरवालों के ताने आप से कोसों दूर थे. मेडिटेशन के सेशन्स के नाम पर आप पागलों की तरह नाचते हैं, चीखते-चिल्लाते हैं, सोते हैं और सबसे खास बात कि इन सबके बीच खुद के और नजदीक जाते हैं.

Prity Nagpal | News18Hindi
Updated: June 19, 2018, 7:30 AM IST
Prity Nagpal | News18Hindi
Updated: June 19, 2018, 7:30 AM IST
रोज सुबह घड़ी की सुईयां दफ्तर जाने में देरी की शिकायत करतीं, फिर दफ्तर की घड़ी घर जाने की रट लगाती. इन सब के बीच कुछ मिनट मिलते हैं खाना खाने और वॉशरूम जाने के लिए. घर आकर भी जिंदगी कुछ खास नहीं लगती. फ्लैटमेट के साथ कुछ देर बतियाने और इंस्टाग्राम पर पोस्ट देखते-देखते सोने का टाइम हो जाता. ये वो जिंदगी नहीं है जो कोई भी जीना चाहेगा... जिसे मैं जीना चाहूंगी...

इसीलिए मैंने घड़ी की सुईयों में कैद जिंदगी से बाहर निकलने की सोची और शुरू हुआ एक सफरनामा...

देर रात की बस ली और निकल पड़ी. सुबह मैं ऋषिकेश थी. दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए ये किसी स्वर्ग से कम नहीं, जहां आप बिना अपने फेफड़ों को कार्बन दिए सांस ले सकते हैं. बस से उतरते ही ठंडी हवाएं गालों को छूकर दिल में उतर गईं. यहां आप किसी कैब का इंतजार नहीं करते, टुकटुक रिक्शा आपको किसी भी मंजिल तक पहुंचाने के लिए तैयार हो जाता है. मैं भी निकल पड़ी अपनी मंजिल के लिए. सुबह के 5.30 बजे थे, आधा शहर सो रहा था, लेकिन मेरे ख्वाब, अरमान और पेट में उड़ती तितलियां मेरा साथ देने के लिए काफी थे.

टुकटुक रिक्शा


छोटे शहर की कमियां तो सब जानते हैं लेकिन मैंने खूबियों पर गौर करना बेहतर समझा. कम भीड़ (ट्यूरिस्ट को छोड़ दें), खुली हवा, भोले-भाले लोग, कम शहरीकरण और सबसे खास आप अपने आप को प्रकृति के बेहद करीब पाते हैं. हर बार की तरह इस छोटे शहर में आकर भी ख्याल आया कि यहां बस जाऊं. जानती हूं, मुमकिन नहीं, फिर भी मन को कैसे समझाएं!

जहां मेरा रुकना तय था, वहां बात बनी नहीं. नदी के नाम पर एक पतली सी धार बहती थी और न ही नजारा इतना अच्छा था कि ठहर सकूं. फिर भी पहली रात इतनी बुरी नहीं थी. बोन-फायर ने बात बना दी. अगली सुबह मेरा ठिकाना था ओशो गंगाधाम. हालांकि कोई रिजर्वेशन नहीं था मेरी, लेकिन वो लोग इतने नेकदिल थे कि बिना किसी जैक-जुगाड़ के मुझे ठहराने को तैयार हो गए. कहने को आश्रम है, लेकिन ये ऋशिकेश की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है. यहां आकर काफी असमंजस में थी कि इतनी खूबसूरत लोकेशन पर ठिकाना, वो भी बिना किसी खास रोक-टोक के. आप महिला मित्र के साथ आएं या पुरुष मित्र के साथ, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, बशर्तें, आप यहां सभ्य व्यवहार करें.

बैग रखते ही एक स्वामी जी (वहां के कार्यकर्ता) ने खाने की ओर इशारा किया. मैंने सुना था यहां का खाना इतना खास नहीं है, बेमन से बैठ गई, लेकिन खाना इतना लाजवाब था कि मां के हाथ का स्वाद याद आ गया. इस खाने की खास बात ये थी कि सब्जियां केमिकल वाले नाले के पानी में नहीं उगी थीं, न ही खाने में मिर्च का खजाना था. ऐसा नहीं कि खाना फीका था, बिल्कुल नहीं. खाने का स्वाद नपा-तुला और वैसा था जैसा खाने को होना चाहिए.  यहां आकर पहले मेरे फेफड़ों ने मुझे दुआ दी और अब जीभ भी दे रही थी.
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ओशो गंगाधाम आने तक मैं ऋषिकेश की सारी पॉपुलर जगह घूम चुकी थी, जी हां रिवर राफ्टिंग भी. तो अब मेरे पास करने के लिए कुछ नहीं था सिवाय आराम के. कपड़े बदलकर गंगा बैंक के किनारे पानी में पैर डालकर बैठ गई. कुछ देर तर तो लग रहा था कि किसी फिल्म का सीन देख रही हूं. यकीन ही नहीं हो रहा था. तमाम गंदगी के बावजूद भी कुछ जगह गंगा इतनी साफ-सुथरी है.  इस आश्रम की खास बात है यहां आप कुछ भी कीजिए... आपका मन है तो खाइए, मेडिटेशन सेशन्स में जाइए और कुछ नहीं तो घंटों गंगा किनारे बैठे रहिए. सुबह से रात के कई सेशन लिए, लेकिन थकान का नाम नहीं था, क्योंकि दफ्तर का वर्कलोड, बॉस की डांट, घरवालों  के ताने आप से कोसों दूर थे. मेडिटेशन के सेशन्स के नाम पर आप पागलों की तरह नाचते हैं, चीखते-चिल्लाते हैं, सोते हैं और सबसे खास बात कि इन सबके बीच खुद के और नजदीक जाते हैं.

सुकून के पल


कहने को घर पर भी मेडिटेशन करती हूं लेकिन एक अजीब किस्म का शोर दिमाग में हो-हुल्लड़ मचाए रखता है. शांति के नाम पर एक अजीब सी सांय-सांय रहती है पर यहां की शांति के मायने अलग थे. पंछियों के बोल, पेड़ के पत्तों की फड़फड़ाहट, हवा का बहाव साफ सुनाई पड़ता था. ये वो माहौल था जिसे असल में सुकून कहा जाता है. गंगा किनारे पहले तस्वीरें लेने बैठी और फिर फोन से दूर खुद को किसी और ही दुनिया में बैठी हुई पाया. शाम तक सुकून से भर गई तो थोड़ा रो भी ली. ज्यादा दर्द और सुकून दोनों आपकी आंखें नम कर देते हैं. कहीं घूमते समय आप जगह को एक्सप्लोर करते हैं, लेकिन ऐसी जगह जहां आप जाकर रहते हैं, उसे जीते हैं, कहीं जाने की फिक्र नहीं होती तो आप खुद को ढूंढने लगते हैं. मैं नहीं कहूंगी कि वहां जाकर मैंने कोई बड़ा ज्ञान हासिल किया या मेरी जिंदगी बदल गई, लेकिन अपने जीवन से कुछ दिन अपने लिए ले लिए (ये बड़ी बात है. सोच के देखिए, कौन सा दिन आपने अपने लिए जिया है). फिर एक बार ये अहसास जागा कि भागती-दौड़ती जिंदगी में अनजाने ही कितना कुछ पीछे छूटता जा रहा था. फिर लगा कि किसी ऐसी जगह की तलाश थी जहां सबकुछ भूलकर खुद को पा सकूं.

ऐसी जगह को लोग अक्सर धर्म से जोड़ते हैं, लेकिन मैं मंदिर तक नहीं जाती तो आप समझ पा रहे होंगे कि वहां का माहौल मुझे क्यों पसंद आया. इस ट्रिप की एक और खास बात ये थी कि मुझे अपनी बेस्वाद जिंदगी को छोड़कर कुछ पहर सुकून के बिताने के लिए नया ठिकाना मिल गया. आखिर में आपसे  ये कहूंगी कि करियर और पैसा बहुत जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी हैं सुकून के कुछ पल. सोचिए कि पैसा कमाकर क्या करेंगे ? आराम ही ना... तो जब अभी ये मौका मिल रहा है, कुछ देर के लिए ही सही, तो इसे क्यों गवाएं. आप किसी के साथ जाए या अकेले कोई फर्क नहीं पड़ता, फर्क पड़ता है जब आप उन सब बहानों से दूर होते हैं जो आपको खुदके पास आने से रोकते हैं.
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