हम एक उतावले समय में जी रहे हैं : कुंवर नारायण

News18Hindi
Updated: November 15, 2017, 1:41 PM IST
हम एक उतावले समय में जी रहे हैं : कुंवर नारायण
कुंवर नारायण
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Updated: November 15, 2017, 1:41 PM IST
साहित्य अकादमी द्वारा दी जानेवाली ''महत्तर सदस्यता'' उत्कृष्ट साहित्य-लेखन को सम्मानित करती है. मेरे लिए इस मान्यता का सबसे मूल्यवान अंश ''उत्कृष्टता'' में विश्वास है, जिससे मुझे अपने लेखन और जीवन में भी, बराबर प्रेरणा मिलती रही है. अकादमी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए मैं इस सम्मान को सादर स्वीकार करता हूँ.

वह बीसवीं सदी का चौथा दशक था जब मैंने साहित्यिक होश संभाला. वही दूसरे महायुद्ध के शुरुआत और अंत का दशक था. ''भारत छोडो'' आन्दोलन और भारत की आज़ादी का दशक था. और आज़ादी के साथ ही भारत-विभाजन की भयानक सांप्रदायिक हिंसा और गाँधी की हत्या का दशक था...इन घटनाओं का मैं मूक साक्षी मात्र नहीं था : एक ऐसे संयुक्त परिवार का सदस्य था जो आज़ादी की लड़ाई से परोक्ष किंतु घनिष्ठ रूप से जुड़ा था. यही मेरे हिंदी साहित्य में प्रवेश का भी समय था -- लगभग १९५० के आसपास. उस समय को सोचते हुए कुछ शब्द स्मृति में तेज़ी से गूंजने लगते हैं --''आधुनिक'', ''प्रगतिशील'', ''प्रयोगवाद'', ''नया'', ''पुराना'', ''परंपरा'', ''युद्ध'', ''संघर्ष'', ''क्रांति'', ''आन्दोलन'' वगैरह जिनसे उस समय के मिजाज़ का अंदाज़ लगाया जा सकता है, और जिनसे तब का ''आधुनिकता-बोध'' अपने को परिभाषित कर रहा था. समाजवादी चेतना पर मार्क्स और गाँधी का मिलाजुला असर वातावरण में घुला था.



जिन पारिभाषिक शब्दों द्वारा हम अपने युग को दूसरे युगों से अलग करना चाहते हैं, अक्सर वे ही हमारी सोच की सीमा बन जाते हैं. उनसे बाहर निकलते ही विचारों का एक ज़्यादा बड़ा और खुला परिप्रेक्ष्य दिखाई देने लगता है. ''आधुनिक'' और ''नए'' जिन पर हमने इतना भरोसा किया, नाकाफ़ी लगने लगते हैं, और उनको लेकर हम अपने असंतोष को लगभग नकारात्मक ढंग से व्यक्त करते हैं, जैसे ''उत्तर-आधुनिकतावाद'', ''उत्तर-संरचनावाद'', ''उत्तर-मार्क्सवाद'' वगैरह...एक तरह से यह स्थापित परिभाषाओं के परिसीमन को आमूल रद्द करने की कोशिश है.

आज हम एक उतावले समय में जी रहे हैं. इस ज़ल्दबाज़ी में असंयम और बौखलाहट है. जो हम चाहते हैं, उसे तुरत झपट लेने की आपाधापी. यह हड़बड़ी भी एक तरह की हिंसा है -- लड़भिड़ कर किसी तरह से आगे निकल जाने की होड़. यह बेसब्री हमारे अन्दर कुंठा और अधीरज को भड़काती है -- उस अनुशासन को नहीं जिसका लक्ष्य महान-कुछ को प्राप्त करना होता है. मेरी एक कोशिश जहां अपने समय को ठीक-ठीक समझ सकने की रही है वहीं उसे स्वस्थ और स्थाई जीवनमूल्यों से जोड़ने की भी.

सदियों में जिस मानसिकता और जीवन-पद्धति का निर्माण हुआ है, उसमें काफी कुछ ऐसा भी है जिसमें हमारे सामाजिक दायित्व-बोध और नैतिक वृत्तियों की गहरी मनोवैज्ञानिक जड़ें हैं. उनमें सुधार और परिवर्तन धीरे-धीरे ही लाया जा सकता है, उतनी तेज़ी से नहीं जितनी तेज़ी से आज हमारा ''आधुनिकता-बोध'' बदल रहा है. पीढ़ी का मतलब किसी एक समय में कोई एक ही पीढ़ी नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों का अनिवार्य सह-अस्तित्व है.

यह समय मुझे मुख्यतः सही समझौतों का वक़्त लगता है, टकरावों का नहीं. समझौता लड़ाई की भाषा का शब्द नहीं है, विचार और विकास की भाषा का शब्द है. चाहे अनचाहे विकास का औद्योगिक मॉडल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर स्वीकृत हो चुका है. अब उन फैसलों के नतीजों पर गंभीरता से सोचने-विचारने का वक़्त है. असली विकास वही है जो हमारी आज़ादी के प्रत्येक हिस्से तक पूरी तरह पंहुचे, न कि कुछ ही लोगों और जगहों तक सिमट कर रह जाए. ''संकटकालीन'' या ''संक्रमणकालीन'' जैसे मुहावरे -- जिनसे हम विभिन्न युगों को सोचने के आदी हैं -- शायद इस समय पर बहुत दूर तक लागू नहीं होते. हमें उनकी हदबंदी से बाहर निकाल कर सोचना होगा. हमारे सामने अब तमाम विकल्प हैं. ''बाजारवाद'' और ''उपभोक्तावाद'' आज का कटु यथार्थ है जो हमारे रहन-सहन, रीति-रिवाजों, आपसी संबंधों और सांस्कृतिक चेतना को कई स्तरों पर तेज़ी से बदल रहा है. हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस समय तमाम विकल्पों में से सही रास्ते चुन सकने की है. शायद इसीलिए इस समय को ''द्विविधाओं'' और ''संदेहों'' का समय कहना ज़्यादा ठीक लगता है.



जर्मन समीक्षा से निकले दो 'पद' मुझे अक्सर याद आते हैं --''जीवनदृष्टि '' और ''विश्वदृष्टि''. आज ऐसा नहीं लगता कि उच्च-कोटि की जीवनदृष्टि से हमारी विश्वदृष्टि बन रही है : उलटे संदेह होता है कि एक बिलकुल स्थूल और व्यावसायिक विश्वदृष्टि हमारी जीवनदृष्टि को बना रही है. हमारे लिए जो सही है उसे चुनना है. क्या सच है, क्या महज विज्ञापन यह दुविधा केवल चीज़ों तक सीमित नहीं, साहित्य, कलाओं और विचारों को लेकर भी है. बाज़ार-संस्कृति की जिस अंतरराष्ट्रीय चकाचौंध में हम खड़े हैं क्या उसके पार भी हम कुछ देख पा रहे हैं ? ऐसा लगता है कि ज़्यादा दवाब ''बेस्ट-सेलर'' ( सर्वाधिक बिकाऊ माल ) के उत्पादन पर है, न कि ''बेस्ट'' ( सर्वश्रेष्ठ ) की खोज पर. मीडिया में भी लाखों में बिकनेवाली किताबों का जिस जोरशोर से प्रचार और प्रसार होता है वैसा गंभीर और विचारशील साहित्य का नहीं. ऐसा नहीं कि इस समय बड़ा साहित्य भी नहीं लिखा जा रहा है, पर यह सवाल फिर भी अपनी जगह बना रहता है कि आज के जीवन में उत्‍कृष्‍ट की खोज इतनी उपेक्षित और निर्वासित-सी क्यों है?

कविता का जीवन जीते हुए मैंने इस तथ्य को बार-बार जाना है कि वह एक एकांत साधना और समर्पित किस्म की चेष्टा है - आर्थिक लाभ के खातों से अलग. परन्तु हमारे निजी और सामजिक जीवनबोध का वह सबसे संवेदनशील हिस्सा है जिसके ''लाभ'' को बौद्धिक और भावनात्मक स्तरों पर ही ग्रहण किया जा सकता है.

जीवन में साहित्य की जगह को मैंने अपने लिए कुछ इस तरह भी समझा है. वह एक बहुत बड़ी भाषाई ताक़त का स्रोत है. जिस तरह हर शब्द की एक स्वतंत्र सत्ता होती है उसी तरह भाषा में गठित उसकी एक समवेत शक्ति भी. रचना-कर्म का एक खास मतलब इस निहित शक्ति-स्रोत का निरंतर उत्खनन और अविष्कार है. रचनात्मकता इस ऊर्जा को दहका कर एक रचना में अर्जित करती है. जीवनेच्छा और साहित्य-रचना के बीच निकट सादृश्यता है. साहित्य शब्दों के बहुआयामी प्रयोगों द्वारा ज़िन्दगी के दवाबों से मुक्त करके एक समानांतर इच्छालोक रचता है.'मुक्ति' और 'रचना' का यह दुहरा एहसास यथार्थ से पलायन नहीं है, उसी अदम्य जीवनशक्ति का परिचायक है जो साहित्य और कलाओं की रचनाशीलता में प्रकट होती है.

(20 दिसंबर, 2010 को साहित्य अकादमी द्वारा महत्तर-सदस्यता प्रदान किये जाने के अवसर पर दिया गया स्वीकृति वक्‍तव्य.)
First published: November 15, 2017
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