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होमोसेक्सुअल पुरानी बात, ये ‘डिजिसेक्सुअल’ का ज़माना

News18Hindi
Updated: December 1, 2017, 9:15 PM IST
होमोसेक्सुअल पुरानी बात, ये ‘डिजिसेक्सुअल’ का ज़माना
हम वर्जुअल सेक्स की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं
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Updated: December 1, 2017, 9:15 PM IST
रोमांटिक पार्टनर के न होने पर पश्चिमी देशों में रोबोट के साथ सेक्स कॉमन होता जा रहा है. यहां तक कि वास्तविक जिंदगी के साथी से भी ऊपर अब सेक्स रोबोट को तरजीह दी जा रही है.

हालांकि हालिया शोध कहता है कि कुछ वक्त बाद ऐसा भी हो सकता है कि ज्यादातर लोग 'डिजिसेक्सुअल' इंसानों में तब्दील हो जाएं, जिनकी शारीरिक और भावनात्मक जरूरतें वर्चुअल यानी आभासी दुनिया से ही पूरी हो जाएं.

कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ मेनिटोबा ने यह शोध किया, जो जर्नल ऑफ सेक्सुअल एंड रिलेशनशिप थैरेपी में छपी है.



शोधकर्ता नील कैकऑर्थर कहते हैं कि अब यह कहा जा सकता है कि हम वर्चुअल सेक्स की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं. जैसे-जैसे तकनीक और समृद्ध होती जाएगी, हममें से बहुत से लोगों को अहसास होगा कि हम डिजिसेक्सुअल हैं.



डिजिसेक्सुअल यानी वे लोग जो तकनीक के जरिए सेक्स को प्राथमिकता देते हैं.

शोध बताता है कि चूंकि लोग सेक्स रोबोट को अपनी जरूरतों और पसंद के अनुसार कस्टमाइज करवाते हैं तो वे इसके साथ ज्यादा सहज महसूस करते हैं और कई बार इसके साथ ऐसे प्रयोग भी कर सकते हैं जो किसी जीते-जागते इंसान के साथ करना मुश्किल हो सकता है.

मसलन ये रोबोट इस तरह से डिजाइन किए जाते हैं कि ये इंसानों की सेक्सुअल जरूरतों की पूर्ति कर सकें. पसंद के अनुसार कस्टमर इन सेक्स रोबोट को ऑर्डर भी कर सकते हैं.

कई कस्टमर रंग, आंखों के रंग, वजन, बाल जैसी चीजों में भी अपनी पसंद से बदलाव करवाते हैं.



इन हाईटेक सेक्स डॉल्स की त्वचा सिलिकॉन की बनी होती है जो छूने पर इंसानों की तरह ही गर्म महसूस होती है और ये प्रतिक्रिया भी करती हैं.

चूंकि ये रोबोट होते हैं, जो अपने साथ किसी भाव को लेकर नहीं आते, सोच-समझ नहीं सकते इसलिए उनके साथ सेक्स आसान हो जाता है. रोबोट्स के पास आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस होती है और ये छूने पर प्रतिक्रिया भी करते हैं, इसलिए बहुत से लोगों का मानना है कि ये इंसानों से बेहतर सेक्स पार्टनर साबित हो सकते हैं.



दूसरी ओर डिजिटल सेक्स के लिए लोगों का बढ़ता क्रेज और इसपर हो रहे शोध डराते हैं.

इससे इंसानी दूरियां बढ़ने का शुरुआती संकेत मिल रहा है. चूंकि लोगों के पास एक-दूसरे के साथ बिताने को वक्त नहीं, या साथ भी हैं तो कई चीजों में उलझे हुए हैं तो शारीरिक रिश्ते बनाने में भी दिक्कत लाजिमी है. बढ़ता ठंडापन कोई ऐसा दिन भी ला सकता है, जब इंसान अपनी हर जरूरत के लिए रोबोट तक सीमित रह जाए.
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