आग का वादा, फिर मिलेंगे, नदी के किनारे: कुंवर नारायण

News18Hindi
Updated: November 15, 2017, 2:05 PM IST
आग का वादा, फिर मिलेंगे, नदी के किनारे: कुंवर नारायण
कुंवर नारायण
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Updated: November 15, 2017, 2:05 PM IST
पंकज चतुर्वेदी

(यह लेख कुछ वर्ष पूर्व लिखा गया था.)

कुंवर नारायण पिछले लगभग छह दशकों से रचनारत हैं. आज जब त्रिलोचन और रघुवीर सहाय हमारे बीच नहीं हैं, तो बेशक वह हिन्दी के सबसे बडे़ कवि हैं. मुक्तिबोध ने 1964 में ही उनके महत्त्व को पहचानते हुए लिखा था कि वह 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' के कवि हैं. मगर 1964 से 1994, यानी तीस वर्षों का लम्बा वक्फा ऐसा भी रहा है; जिसमें सतत रचनाशीलता के बावजूद कुंवर नारायण को हिन्दी आलोचना में वह सम्मान और शोहरत नहीं मिली, जिसके दरअसल वह हक़दार थे. उलटे, उनकी कविता की सायास उपेक्षा, अवमूल्यन और अन्यथाकरण का प्रकट न सही, पर गुपचुप एक प्रायोजित सिलसिला इस बीच ज़रूर चलता रहा. इसे अंजाम देनेवाले लोग हिन्दी की विश्वविद्यालयी दुनिया, प्रकाशन-तंत्र और पुरस्कार-तंत्र पर क़ाबिज़ थे. इन्हें कौन नहीं जानता? इन्होंने यह साबित करना और करवाना चाहा कि कुँवर नारायण तो एक ख़ास स्कूल के कवि हैं. मगर 1993 में 'कोई दूसरा नहीं' सरीखे एक सौ कविताओं के अनूठे संग्रह के प्रकाशन और 1995 में इसके लिए उन्हें 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार' सहित अनेक सम्मान मिल जाने पर ऐसी कोशिशें अंतिम तौर पर नाकाम हो गईं.

साहित्य-संसार में सक्रिय विभिन्न विचारधारात्मक शिविरों के आर-पार कुंवर नारायण को एक क़िस्म की सर्वानुमति या व्यापक प्रतिष्ठा हासिल हुई. ज़ाहिर है कि इस मक़ाम पर किसी 'साहित्यिक राजनीति' के ज़रिए नहीं पहुँचा जा सकता; बल्कि शब्द और कर्म, संवेदना और विचार तथा कविता और जीवन की वह दुर्लभ एकता ज़रूरी है, जो उनके यहाँ मिलती है. दूसरे शब्दों में, प्रगतिशील दिखना नहीं, होना अनिवार्य है. मसलन यह सभी जानते हैं कि कुंवर नारायण ने किसी ख़ास विचारधारा से ख़ुद को प्रतिबद्ध नहीं किया; पर यह ख़बर बहुत कम लोगों तक पहुँची कि उन्होंने कविता की एक फ़ेलोशिप के तहत आयोवा जाने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें यह लिखकर देने को कहा गया था कि ''मैं वामपंथी नहीं हूँ.'' इसी तरह उन्होंने पहली बार एक उद्योगपति के नाम पर रखे गए हिन्दी साहित्य के बदनाम पुरस्कार 'दयावती मोदी कविशेखर सम्मान' को भी नामंजू़र कर दिया, जिसे कथित प्रगतिशीलों और कलावादियों ने प्रसन्न और आत्ममुग्ध भाव से स्वीकार किया.



हिन्दी कवियों में कोई संघर्ष न करते हुए उसका दिखावा करने का चलन आम हो गया है; जबकि कुंवर नारायण जो कुछ करते हैं, उसका सार्वजनिक ज़िक्र करने में संकोच करते हैं. एक तरफ़ वे साहित्यकार हैं, जो नैतिक और अनैतिक का फ़र्क़ भूल चुके हैं; दूसरी तरफ़ कवि है, जिसे इस द्वन्द्व को मिटाने की सज़ा मालूम है--''नर और कुन्जर के फ़र्क़ को मिटाते ही/मिट गया जो/वह एक शोकातुर पिता था. ...सज़ा सिर्फ़ इतनी थी/कि इस अन्तर को समझती हुई दृष्टि से/नरक देखना पड़ा था धर्मराज को.'' कुंवर नारायण की कविता जिस बौद्धिक सान्द्रता और क्लासिकी संयम के लिए मशहूर है; उससे कम महत्त्वपूर्ण उनके स्वभाव की सादगी और विनयशीलता नहीं है, जिनके होने को हिन्दी के ज़्यादातर नामचीन साहित्यकार अपने बड़प्पन में बाधक समझते हैं. ऐसों को अशोक वाजपेयी की ये काव्य-पंक्तियाँ याद रखनी चाहिए कि ''जीवन में आभिजात्य तो आ जाता है/गरिमा आती है बड़ी मुश्किल से.''

कुंवर नारायण की कविता और व्यक्तित्व, दोनों में ही जिस उदात्तता, गरिमा और संवेदनशीलता का विरल संश्लेष है; उससे रश्क करने से ज़्यादा अहम यह जानना है कि इसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है, सब-कुछ पा लेने की ग़रज़ या चालाकी से यह मुमकिन नहीं. इसके लिए सिर्फ़ 'दुनियादारी' से नहीं, 'साहित्य की राजनीति' से भी अलहदा और निर्लिप्त रहना ज़रूरी है. दूसरे, हमारी रौशनी और ऊर्जा के स्रोत महज़ बाहरी ज्ञान-विज्ञान में नहीं; बल्कि भारत की अपनी दार्शनिक, सांस्कृतिक, नैतिक और मिथकीय विरासत में भी हैं, जिसके आशयों को नये सन्दर्भों में अन्वेषित किये बिना हम अपनी समूची आत्मवत्ता को अर्जित नहीं कर सकते. बगै़र इस बुनियाद के मुक्ति की उम्मीद करना बेमानी है. कुंवर नारायण के शब्दों में 'पराक्रम की धुरी पर ही प्रगति-बिन्दु' का स्वप्न देखा जा सकता है. उनकी कविता में भारत की श्रेष्ठ सर्जनात्मक मनीषा का सारभूत रूप मिलता है.



इसका मिलना कुछ दूसरे कवियों में भी इन दिनों बताया जा रहा है, पर बतानेवाले भी जानते हैं कि दूसरों के बारे में यह बयान जितना झूठ है, कुंवर नारायण के सम्बन्ध में उतना ही सच. तीसरे, कुंवर नारायण की कविता हमें सिखाती है कि शाश्वत मूल्यों के इसरार का मतलब समकालीनता की अन्तर्वस्तु से इनकार हरगिज़ नहीं है, जिसकी कोशिश हिन्दी आलोचना के एक तबके़ द्वारा बराबर की जाती है. इसके विपरीत, कुंवर नारायण की कविता के सफ़र में आठवें दशक में इमर्जेन्सी, 1992 में अयोध्या-केन्द्रित उग्र हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकता और 2002 में एकध्रुवीय हो चुकी दुनिया में अमेरिका के नव-उदार आर्थिक-सांस्कृतिक और सैनिक साम्राज्यवाद--यानी मौजूदा भारत और विश्व की कितनी ही विसंगतियों और विडम्बनाओं का गहरा और सशक्त प्रतिकार देखने को मिलता है.

कुंवर नारायण भारत के पहले और एकमात्र कवि हैं, जिन्हें रोम का अन्तरराष्ट्रीय 'प्रीमिओ फे़रोनिआ सम्मान' हाल में दिया गया है. ऐसे में 'भारतीय ज्ञानपीठ' के लिए यह आत्म-व्यंग्य ही होता, अगर वह अपना शीर्ष पुरस्कार उन्हें प्रदान न करती. मेरे जैसे उनके अनगिनत प्रशंसकों के लिए यह दोहरी खु़शी का मौक़ा है, जिसे मुहैया कराने के लिए वे इस संस्था के शुक्रगुज़ार हैं. दरअसल, सबसे बड़ी बात यह है कि कुंवर नारायण भारत के आम आदमी को, उसकी ज़िन्दगी के रोज़मर्रा के प्रसंगों में बार-बार याद आने और उसका साथ देनेवाले मूल्यवान कवि हैं.

कैसा सुखद इत्तिफ़ाक़ है कि इसी महीने की दस तारीख़ को बनारस के दशाश्वमेध घाट पर प्रतिदिन शाम को होनेवाली भव्य गंगा-आरती को देखने के लिए मैं एक नाव में मशहूर कवि असद जै़दी, उनकी जीवन-संगिनी नलिनी तनेजा और प्रसिद्ध कवि-मित्र व्योमेश शुक्ल के साथ था. मैंने कहा कि 'नाव से यह दृश्य देखना बहुत अच्छा लगता है.' असद जी ने पूछा-'अच्छा क्यों लगता है ?' मैं अपनी आत्मा की हक़ीक़त जानता था कि मुझे वह सब-कुछ किसी रूढ़ धार्मिक-पौराणिक मानी में अच्छा नहीं लग सकता. फिर क्या बात थी ? क्या सिर्फ़ उसका सौन्दर्य खींचता था ? नहीं. मैंने उनसे कहा, ''मुझे कुंवर नारायण की एक कविता याद आती है --''आग का वादा''--फिर मिलेंगे/...नदी के किनारे !''

(यह लेख हिंदी ब्‍लॉग सबद से साभार.)
First published: November 15, 2017
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