Dear Men ! लड़कियां लड़कों की तरह खड़े होकर सू-सू नहीं करतीं

मर्द अपने घर में, दूसरे के घर में, हवाई जहाज में और दुनिया में कहीं भी ‘जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट’ का इस्तेमाल कैसे करें, इसके लिए एक छोटी यूजर गाइड बनाने की जरूरत है- “मर्दों के लिए पांच जरूरी नियम.”

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 21, 2019, 3:06 PM IST
Dear Men ! लड़कियां लड़कों की तरह खड़े होकर सू-सू नहीं करतीं
जेंडर न्‍यूट्रल टॉयलेट का इस्‍तेमाल कैसे करें?
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 21, 2019, 3:06 PM IST
दिल्ली से कोच्चि की तीन घंटे की फ्लाइट थी. मैं दौड़ती-भागती, हांफती-कांपती किसी तरह फ्लाइट का दरवाजा बंद होने से ठीक पहले पहुंची. सीट पर बैठते ही बेल्ट बांधने से पहले एक पूरी बोतल पानी की गटक गई. अब जाकर कुछ सांस में सांस आई. फिर मैंने एक नजर भरकर उस बांके नौजवान को देखा, जो जहाज के एक कोने से दूसरे कोने तक लोगों की सीट बेल्ट चेक करता घूम रहा था. वो मुझे देखकर मुस्कुराया. मैं उसे देखकर मुस्कुराई. कुछ ही देर में हम जमीन से 40 हजार फीट की ऊंचाई पर आसमान में थे.

मैं खुश थी, लेकिन सिर्फ उस क्षण तक, जब तक कि एक नई मर्दानी सूरत से मेरा साबका नहीं हुआ. खुशी की मियाद सिर्फ दो घंटे रही क्योंकि कुछ दो घंटे बाद हलक में उतारा गया वो एक बोतल पानी अंतड़ियों की गलियों में अपना सफर तय कर किडनी के रास्ते यूरीनरी ब्लैडर तक जा पहुंचा था और बाहर आने को बेताब था. मैंने सीट बेल्ट खोली और गिरती-पड़ती बाथरूम तक जा पहुंची. कुछ डेढ़ मिनट दरवाजे के सामने खड़ी रही. डेढ़ मिनट बाद सिग्‍नल  ग्रीन हुआ और मैं अंदर.

क्या ‘स्टेट ऑफ आर्ट’ होते हैं ये हवाई जहाजों के टॉयलेट भी. एरोप्लेन का लू जैसे हांगकांग के घर. एक हाथ फैलाने भर की जगह में जरूरत का हर साजो-सामान समेट देते हैं. मैं ये सोचते हुए भीतर घुसी ही थी कि अंदर जाते ही मानो करंट मार गया. उफ, ये हिंदुस्तान के मर्द. इनको टॉयलेट यूज करने की तमीज कब आएगी. खड़े-खड़े दुनिया का नजारा करते हुए नेचर कॉल निपटाने वाले मर्दों को कभी ये ख्याल नहीं आता कि औरतें ऐसे खड़ी होकर फुहारें नहीं उड़ाया करतीं. उन्हें टॉयलेट सीट पर बैठना होता है. वही टॉयलेट सीट, जो इस वक्त मेरे सामने जमीन से 40 हजार फीट की ऊंचाई पर उनकी फुहारों की बूंदों से नहाई हुई थी. उन फुहारों का हर कोने में ऐसे प्रसार किया गया था, मानो वो गंगाजल हो. हर कोने में छिड़कना जरूरी है.



गुस्से में चढ़ रहे पारे और पेट में बढ़ रहे दबाव से मेरा दिमाग गर्म हुआ जा रहा था. मैं दो मिनट ऐसे ही खड़ी सोचती रही कि अब क्या करूं. फिर मैंने वो नर्म कागज वाला टॉयलेट रोल उठाया और उसे गोल-गोल टॉयलेट सीट पर बिछाना शुरू किया. एक परत, दूसरी परत, तीसरी परत, चौथी परत, पांचवी परत. गुस्सा तो इतना आ रहा था कि पूरा रोल खत्म कर डालूं. लेकिन छठवें राउंड में रुक गई. फिर आंखें गड़ाकर देखा कि कहीं गंगाजल की कोई एक बूंद भी ढंके जाने से बची न रह गई हो. पूरी तरह निश्चिंत होने के बाद ही मैं अपने ब्लैडर पर मेहरबान हुई. उसके खाली होते ही राहत की एक लंबी सांस आई.
अब सवाल उस कागज को वहां से हटाने का था. मैं उस कागज को हाथ से छूकर राजी नहीं थी. अब क्या करूं? मैंने बालों से रबरबैंड निकाले, टॉयलेट रोल की मोटी परत हाथों पर लपेटकर दस्ताने बनाए, उस पर रबरबैंड लगाया और फिर कहीं जाकर कागज की उस परत को हाथ से छुआ. साबुन से हाथ धोकर जब मैं बाहर निकली तो जेट एयरवेज का वही बांका नौजवान सामने टकरा गया. इस बार उसे देखकर मैं सिर से लेकर पांव तक फुंक उठी. उस वक्त फ्लाइट में जितने मर्दाने सिर दिख रहे थे, जी तो कर रहा था सबको फोड़ दूं. ढेले भर की तमीज नहीं इन लोगों को कि जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट कैसे इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे बरतते हैं, जैसे शैंपेन की बोतल से फुहारें उड़ा रहे हों.

तो जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट इस्तेमाल करने का मेरा पहला अनुभव ऐसा था. पब्लिक प्लेस पर आमतौर पर जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट होते नहीं तो पहले कभी ऐसी मुसीबत से सामना हुआ भी नहीं. जहां तक घर के टॉयलेट का सवाल है कि जिस पर महिला और पुरुष का बोर्ड नहीं लगा है तो उस पर हमेशा ही मेरा एकछत्र राज रहा है. न मर्द, न मर्दों की पाली मुसीबतें. लेकिन हां, घर पर कभी किसी पार्टी या महफिल की सूरत हो जाए तो यकीन मानिए, दुनिया की कोई लड़की ऐसी नहीं जो इस्तेमाल करने से पहले दो मिनट घूरकर टॉयलेट सीट का मुआयना न करे. और हर बार ऐसा होता है कि लड़की के ठीक पहले टॉयलेट इस्तेमाल किए मर्द की एक छोटी सी निशानी पीछे रह ही जाती है. अब तो ये आलम है कि मैं लेंस लेकर उनकी निशानियां चेक ही नहीं करती. घर में कोई आदमी हुआ तो बाथरूम में घुसते ही चार मग पानी से टॉयलेट सीट को नहला देती हूं. मैं जितनी बार जाऊंगी, उतनी बार उसका स्नान होगा.
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मर्द अपने घर में, दूसरे के घर में, हवाई जहाज में और दुनिया में कहीं भी ‘जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट’ का इस्तेमाल कैसे करें, इसके लिए एक छोटी यूजर गाइड बनाने की जरूरत है- “मर्दों के लिए पांच जरूरी नियम.”

1. कृपया टॉयलेट का इस्तेमाल करने से पहले सीट अवश्य उठा दें.

2. गुड. सीट आपने उठा दी. लेकिन सीट उठाने का मतलब ये नहीं कि अब खुला खेल का मैदान है. शैंपेन की बोतल खुली और पार्टी शुरू. नो. अब भी लक्ष्य साधें, निशाने पर ध्यान दें.

3. यकीन मानिए, आपकी फुहारों की निशानियों में किसी की रुचि नहीं है. मुमकिन है, आपके बाद टॉयलेट इस्तेमाल करने वाली लड़की आपको देखकर मुस्कुरा दे, लेकिन मन-ही-मन वो आपको सौ गालियां दे रही होती है. क्या आप गाली खाना चाहते हैं?

4. अब हम सब बड़े हो गए हैं. अब वो बचपन वाली बात नहीं रही, जब आपकी छोटी बहन रो-रोकर जिद करती थी कि भईया की तरह खड़े होकर सू-सू करना है. अब उसके या दुनिया के किसी भी भाई की बहन के दिल में ऐसा कोई अरमान नहीं है. अब वो बैठकर ही खुश हैं. लेकिन आपके कर्म ऐसे हैं कि वो निश्चिंत होकर बैठ भी नहीं पा रही. टॉयलेट को दस बार नहला रही हैं. उन्हें नहलाने से निजात दिलाएं और पानी भी बचाएं. साथ में अच्छे मर्द तो कहलाएं ही.

5. बस इतना ही. इतना समझ में आ गया तो हम समझ लेंगे कि आपको समझना आता है. आप समझदार होने की दिशा में पहला कदम बढ़ा चुके हैं.
मुबारक हो. आप अच्छे मर्द बन रहे हैं.

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First published: August 20, 2019, 11:32 AM IST
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