प्लास्टिक के लिए No मतलब No

News18Hindi
Updated: September 12, 2019, 12:27 PM IST
प्लास्टिक के लिए No मतलब No
जानिए सिंगल-यूज प्लास्टिक के बारे में

हर साल हम करीब 30 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन कर लेते है, इसमें से करीब आधा सिंगल यूज प्लास्टिक यानि एक बार के इस्तेमाल में आता है. हम हर साल 80 लाख टन प्लास्टिक समुद्र में डाल रहे हैं जो कभी किसी शार्क के पेट से मिल रही है तो कभी किसी डुगोंग की मौत का कारण बन जाती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 12, 2019, 12:27 PM IST
  • Share this:
(पकंज रामेंदु)

'गॉड्स मस्ट भी क्रेजी' वैसे तो मासूम आदिवासियों के ज़रिये दुनिया के विकास, तबाही और तमाम तरह के षड़यंत्रों पर किया गया व्यंग्य है. लेकिन - इस कहानी में एक चीज़ है जिसका किरदार नायक की तरह ही अहम है. आप एक मायने में इसे फिल्म का खलनायक मान सकते हैं. यह है एक कांच की कोल्ड ड्रिंक की बोतल जिसे विकास के हेलीकॉप्टर में उड़ रहे एक विकासवादी ने नीचे फेंक दिया और वो नीचे बैठे एक अविकसित, असभ्य समझे जाने वाले आदिवासी के सिर पर गिरती है और वो ढेर हो जाता है.

कहानी का नायक और गांव का मुखिया ये मानता है कि ये ऊपर से गिरी कोई आफत है जिसे जल्द से जल्द गांव से दूर कहीं दफ्नाना बेहद ज़रूरी है, नहीं तो गांव पर मुसीबत बढ़ती जाएगी. नायक उस बोतल को दफ्नाने के लिए निकल पड़ता है. तमाम कोशिशों के बाद भी वो बोटल टूटती नहीं है. फिल्म में दिखाई गई वो कांच की बोतल जिसमें कोला भरा था - भले ही फिल्म के नायक के लिए कोई शैतानी चीज रही हो - लेकिन सही मायने में हमें अब फिर इस शैतानी चीज़ की ओर लौटना ज़रूरी हो गया है.

दरअसल अगर 20-30 साल पहले नज़र डालें तो भारत में सॉफ्टड्रिंक कांच की बोतल में ही आती थी. एक अनकही सी परंपरा थी. बोतल लीजिए,पीजिए और बोतल वापस कर दीजिए. दुकान के आगे ही एक कैरेट रखी होती थी जिसमें खाली बोतल वापस रख दी जाती थी. अगर किसी के घर में पार्टी है या कोई घर में बोतल ले जाकर सुकून से पीना चाहता है तो उसे बोतल की कीमत जमा करवानी होती थी, जो उसे बोतल के वापस करते ही मिल जाया करती थी. दुकान से कंपनी वापस बोतल ले जाया करती थी और उसे रिफिल करके वापस बाज़ार में लाया जाता था.

जनश्रुतियों के देश भारत में कुछ ऐसी कहानी घूमती है कि फिर इसके बाद एक दूसरी सॉफ्टड्रिंक कंपनी का पदार्पण हुआ, उसे अपने कदम जमाने थे लेकिन सालों से टिकी हुई दूसरी कंपनी ने अंगद के पैर की तरह खुद को जमा रखा था. ऐसे में अपने उत्पाद की दम पर उसे हटाना मुश्किल था तो नई कंपनी ने एक चाल चली और पुरानी कंपनी की सारी ग्लास बोटल साज़िशन उठवा ली. बोतल की कमी पड़ी तो कंपनी का ध्यान बोतल निर्माण की तरफ लग गया. नई कंपनी ने इतने वक्त में अपने पैर जमा लिए और पुरानी कंपनी की सबसे बड़ी प्रतियोगी बन कर उभर गई. पता नहीं इस कहानी में कितनी सच्चाई है लेकिन कहा जाता है कि उसके बाद प्लास्टिक की बोतल को विकल्प के रूप में देखा गया और कम मात्रा को भी छोटी बोतल में लाया जाने लगा. यही नहीं जब कांच की बोतल में सॉफ्टड्रिंक बेचा जा रहा था उस दौरान बच्चों को लुभाने के लिए एक चीज़ और आई, इसे बर्फ के गोले की आधुनिक कड़ी कहा जा सकता है. इसका बाज़ार झुग्गी-बस्ती और कम आया वाला तबका था. जहां पर कभी एक टीन के डब्बे में नमक की परत के बीच लाली-पीली बर्फ की बनी हुई आइस्क्रीम (उस दौरान आइसक्रीम का मतलब किसी बर्फीली ठंडी चीज ही मानी जाती थी ये क्रीम जैसे शब्द तो बाद में जागरुकता के दौरान समझ में आए) बेची जाती थी. बेची क्या जाती थी दरअसल उन्हें लोहे या तांबे के सामान के एवज में बच्चों को दे दिया जाता था. इस तरह इस आइस्क्रीम को लेकर आने वाला कबाड़ से काफी कमाई कर लेता था. बाद में जब दूध प्लास्टिक की थैली में आने लगा तो ये बच्चे इस आइसक्रीम वाले को दूध की पन्नियां देने लगे और उसके बदले आइसक्रीम ली जाने लगी. फिर उसके बाद बर्फ के गोले और इस आइसक्रीम का विकल्प आया वो दरअसल प्लास्टिक की लंबी से थैली में लिपटा हुआ बर्फ का गोला था जो कोला और संतरे जैसे स्वादों के साथ पेप्सी के नाम से बिकता था. प्लास्टिक में लिपटी हुई बर्फ की इस रंगबिरंगी छड़ी का दाम 50 पैसे और 1 रू आकार के हिसाब से होता था जिसे एक कोने से कुतर कर बच्चे चूस कर ठंडक के मजे लिया करते थे. प्लास्टिक में होने की वजह से ये देर से पिघलता था और पिघलने के बाद भी जो पानी बनता था वो गिरता नहीं था इस तरह से बच्चे एक एक बूंद का मजा लेते थे. यहीं से प्लास्टिक ने बच्चों को भी घेर लिया.

70-80 के दशक में आप देखें तो आपको फिल्मों में दूध भी बोतल से आता हुआ दिखेगा. या फिर खुला दूधमिलता था जिसे लोग अपने घर से लाए डब्बों में ले जाया करते थे. बड़े शहरों में आज भी ये व्यवस्था है लेकिन प्लास्टिक के पैकेट उससे ज्यादा मात्रा में आ रहे हैं.

पानी के बाज़ार के बारे में तो किसी से कुछ छुपा नहीं है. प्लास्टिक की बोतल में बंद पानी का बाज़ार हज़ारों करोड़ रुपये तक पहुंच गया है और लगातार बढ़ रहा है. आज भी आपको भारत की रेल में जनरल डब्बे में सफर करने वाले लोग मिल जाएंगे जो उन बोतलों को मरोड़ कर फेंकते नहीं है बल्कि संभाल कर रख लेते हैं. धीरे-धीरे पानी बेचने वाली कंपनियों ने इन बोतलों के प्लास्टिक को इतना पतला कर दिया है कि कई बार तो ढक्कन खुलते-खुलते ही बोतल का पानी छलक कर गिर जाता है यानि कुल मिलाकर आप चाहकर भी उसे दूसरी बार इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. अभी हाल ही में केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने पेप्सी, कोका कोला समेत कई दर्जन कंपनियों से तीन दिन में पैकेजिंग की वैकल्पिक सामग्री का सुझाव देने का निर्देश दिया है.
Loading...

भारत में 2 अक्टूबर 2019 से सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा. ये भारत सरकार का एक उल्लेखनीय प्रयास होगा. दरअसल प्लास्टिक की आदत उस सिगरेट पीने वाले जैसी है जो कम नहीं कर सकता. या तो मर सकता है या बंद कर सकता है. विकल्प हमें ही चुनना होगा. और ऐसे में सरकार का सख्त रवैया अपनाना बेहद ज़रूरी है.

रामविलास पासवान ने पीने के पानी की प्लास्टिक बोतलों पर रोक लगाने के उपायों पर विचार करने हेतु संबंधित मंत्रालयों के अफसरों व निर्माता कंपनियों की एक बैठक बुलाई थी. इस बैठक में सभी निर्माताओं से कहा गया है कि वे अपने-अपने सुझाव लिखित तौर पर 11 सितंबर 2019 तक मंत्रालय के सचिव को सौंपें, जिसे कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली एक समिति और प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा जाएगा.

इसके पहले स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों और सरकारी एजेंसियों से देश को प्लास्टिक मुक्त बनाने की अपील की थी. उन्होंनें साल 2022 तक देश को पूरी तरह से प्लास्टिक मुक्त बनाने की योजना रखी है. इसकी शुरुआत 2 अक्टूबर 2019 से होगी. इस बैन से प्लास्टिक बैग, कप, प्लेट्स, छोटे बोतल और प्लास्टिक से बने दूसरे सामान का इस्तेमाल बंद हो जाएगा. इसमें सबसे ज्यादा सिंगल यूज प्लास्टिक यानि ऐसा प्लास्टिक जिसे एक बार इस्तेमाल करके फेंक दिया जाता है उसकी रोक पर ध्यान दिया जा रहा है.

सिंगल-यूज प्लास्टिक क्या है?

सिंगल-यूज प्लास्टिक वो प्लास्टिक है जिसका उपयोग हम केवल एक बार करते हैं. एक इस्तेमाल करके फेंक दी जाने वाली प्लास्टिक ही सिंगल-यूज प्लास्टिक कहलाता है. हम इसे डिस्पोजेबल प्‍लास्टिक भी कहते हैं. हालांकि, इसकी रीसाइक्लिंग (recycling) की जा सकती है लेकिन सिंगल यूज प्‍लास्टिक करीब 7.5 प्रतिशत की ही रीसाइक्लिंग हो पाती है. बाकी प्लास्टिक मिट्टी में मिल जाता है, जो पानी के जरिए समुद्र में पहुंचता है और
वहां के जीवों को काफी नुकसान पहुंचाता है. अधिकांश प्लास्टिक कुछ समय में टूटकर जहरीले रसायन भी छोड़ते हैं. ये रसायन पानी और खाद्य सामग्रियों के द्वारा हमारे शरीर में पहुंचते हैं और काफी नुकसान पहुंचाते हैं. इसका उपयोग हम अपने रोजमर्रा के काम में करते हैं.

इसके अलावा, बोतल के ढक्कन, किसी प्लास्टिक के पैकेट में आयी सामग्री को निकालने के लिए काटा गया उसका कोना, शेविंग में इस्तेमाल होने वाली यूज एंड थ्रो ब्लेड, स्ट्रॉ, प्लास्टिक की चम्मच और चाय के कप जिसे हम गुमटी में चाय पीकर फेंक देते हैं, जैसी एक लंबी सूची है जो धरती का सिर्फ नुकसान कर रही है.

और कितना प्लास्टिक चाहिए

हर साल हम करीब 30 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन कर लेते है, इसमें से करीब आधा सिंगल यूज प्लास्टिक यानि एक बार के इस्तेमाल में आता है. हम हर साल 80 लाख टन प्लास्टिक समुद्र में डाल रहे हैं जो कभी किसी शार्क के पेट से मिल रही है तो कभी किसी डुगोंग की मौत का कारण बन जाती है. यही नहीं, एक शोध के मुताबिक 90 फीसद समुद्री पक्षियों के पेट में प्लास्टिक के टुकड़े पाए जाते हैं. जिंदगी जीने का तरीका हो, रिश्ते हों या हमारी संवेदनशीलता सब कुछ डिस्पोजेबल होता जा रहे हैं, हमने धीरे धीरे यूज़ एंड थ्रो यानि इस्तेमाल करों फेंक दो के दर्शन को अपने जीवन को ढाल लिया है.

कहां इस्तेमाल होता है ज्यादा प्लास्टिक

पैकेजिंग वो चीज़ है जहां सबसे ज्यादा प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है और जो आगे चलकर किसी काम का नहीं रहता है. कुल प्लास्टिक उत्पादन का 40 फीसद सिर्फ पैकेजिंग में उपयोग आ जाता है. हर साल करीब 50 हजार करोड़ प्लास्टिक की थैलियां दुनियाभर में इस्तेमाल होती हैं. हर मिनिट करीब दस लाख प्लास्टिक के बैग उपयोग में लाए जा रहे हैं. और एक प्लास्टिक के बैग की औसत जिंदगी 15 मिनिट से ज्यादा नहीं होती है. एक प्लास्टिक बोटल बनने में जितना पानी लगता है वो बोटल के अंदर बंद पानी का 6 गुना होता है.

हालांकि सरकार की इस पहल के बाद पानी और सॉफ्टड्रिंक के व्यापारियों के बीच हलचल मच गई है. विरोध के सुर फूटना भी शुरू हो गये हैं लेकिन किसी भी सुधार के लिए सख्ती का होना बेहद ज़रूरी है. याद कीजिए वो पल जब दिल्ली में ब्लू लाईन बस चलती थी. उनसे निकलने वाले धुएं ना दिल्ली की कैसी बुरी हालत कर दी थी. जब सरकार ने सीएनजी लाने की बात की तो विरोध इतना मुखर हुआ कि देश भर की मीडिया की सुर्खियां बन गया. यहां तक कि तात्कालीन सरकार भी इस फैसले से कदम खींचने का मन बनाने लग गई थी लेकिन माननीय अदालत ने सख्ती के साथ जब फैसला सुनाया तो उसका नतीजा है कि आज दिल्ली में सीएनजी की गाड़ियां चल रही है. सोचिए अगर उन गाड़ियों का बंद नहीं किया गया होता तो गैस चैंबर बनी हुई दिल्ली की हालत क्या होती. हालांकि अभी भी बहुत अच्छी स्थिति नहीं है. अब वक्त आ गया है कि हम ‘गॉड्स मस्ट बी क्रेजी’ की कांच की बोतल को शैतान ना मानकर वरदान मानकर वापस उस पर लौटे. और ये बात सही है कि सरकार अगर जागरूक होने की अपील करती रहेगी तो लोग जब तक जागेंगे तब तक अंधेरा हो चुका होगा इसलिए बेहतर है कि बगैर विकल्प छोड़े लोगों को झकझोर कर उठाया जाए और कहा जाए - प्लास्टिक के लिए ‘नो’ मतलब ‘नो’.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए ट्रेंड्स से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: September 12, 2019, 12:27 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...