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ज़रा-से प्यार में डूबा रहा और जीवन बीत गया : कुंवर नारायण

News18Hindi
Updated: November 15, 2017, 1:44 PM IST
ज़रा-से प्यार में डूबा रहा और जीवन बीत गया : कुंवर नारायण
कुंवर नारायण
News18Hindi
Updated: November 15, 2017, 1:44 PM IST
कुंवर नारायण कौन थे? जिन्‍होंने कठोपनिषद की कथा पर आत्‍मजयी  जैसा अद्भुत खंडकाव्‍य लिखा था. जो हिंदी के सबसे ज्‍यादा पढ़े जाने वाले, लेकिन सबसे कम विवादित चर्चाओं में रहने वाले कवि और लेखक थे. जो अपने लेखकीय जीवन के आखिरी दिनों तक 52 साल पुराने उसी टाइपराइटर पर लिखते रहे, जिस पर टाइप करके पहली कृति चक्रव्‍यूह लिखी थी.

जो 90 की उम्र में भी किसी नए प्रेमी जैसे उत्‍साही और बच्‍चों जैसे सरल थे. जिनके परिवार में उनकी पत्‍नी और बेटा भी कम साहित्यिक अभिरुचियों वाले नहीं है. कुंवर नारायण के बेटे अपूर्व नारायण ने उनकी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया है.

कुंवर जी अब हमारे बीच नहीं हैं. बुधवार, 15 नवंबर को 90 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. उनकी स्‍मृति में उनकी कुछ कविताएं-

इतना कुछ था

इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को
पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा
और जीवन बीत गया
अच्छा लगा
पार्क में बैठा रहा कुछ देर तक
अच्छा लगा,
पेड़ की छाया का सुख
अच्छा लगा,
डाल से पत्ता गिरा- पत्ते का मन,
''अब चलूँ'' सोचा,
तो यह अच्छा लगा...



प्यार के बदले
कई दर्द थे जीवन में :
एक दर्द और सही, मैंने सोचा-
इतना भी बे-दर्द होकर क्या जीना !
अपना लिया उसे भी
अपना ही समझ कर
जो दर्द अपनों ने दिया
प्यार के बदले...



रोते हँसते
जैसे बेबात हँसी आ जाती है
हँसते चेहरों को देख कर
जैसे अनायास आंसू आ जाते हैं
रोते चेहरों को देख कर
हँसी और रोने के बीच
काश, कुछ ऐसा होता रिश्ता
कि रोते-रोते हँसी आ जाती
जैसे हँसते-हँसते आंसू !



ये पंक्तियाँ मेरे निकट
ये पंक्तियाँ मेरे निकट आईं नहीं
मैं ही गया उनके निकट
उनको मनाने,
ढीठ, उच्छृंखल अबाध्य इकाइयों को
पास लाने :
कुछ दूर उड़ते बादलों की बेसंवारी रेख,
या खोते, निकलते, डूबते, तिरते
गगन में पक्षियों की पांत लहराती :
अमा से छलछलाती रूप-मदिरा देख
सरिता की सतह पर नाचती लहरें,
बिखरे फूल अल्हड़ वनश्री गाती...
... कभी भी पास मेरे नहीं आए :
मैं गया उनके निकट उनको बुलाने,
गैर को अपना बनाने :
क्योंकि मुझमें पिण्डवासी
है कहीं कोई अकेली-सी उदासी
जो कि ऐहिक सिलसिलों से
कुछ संबंध रखती उन परायी पंक्तियों से !
और जिस की गांठ भर मैं बांधता हूं
किसी विधि से
विविध छंदों के कलावों से।



‘अयोध्या 1992’
हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य
तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर – लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है.
इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य
अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं
चुनाव का डंका है
हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान – किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक…
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक

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First published: November 15, 2017
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