फेसबुक से हमारे दोस्त बढ़े हैं.. फिर हम इतने अकेले क्यों हैं?

इतने प्‍यार से “व्‍हॉट इज इन योर माइंड” पूछने और दोस्‍तों के दोस्‍तों तक का बर्थडे याद दिलाने वाला सोशल नेटवर्क आखिर हमारा अकेलापन दूर क्‍यों नहीं कर पा रहा है?

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: February 6, 2019, 2:39 PM IST
फेसबुक से हमारे दोस्त बढ़े हैं.. फिर हम इतने अकेले क्यों हैं?
फेसबुक के दौर में क्‍यों बढ़ रहा है अकेलापन
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: February 6, 2019, 2:39 PM IST
सोशल मीडिया में सक्रिय 63 फीसदी लोगों के दिन की शुरुआत अपना फेसबुक एकाउंट चेक करने से होती है. अपने वयस्‍क जीवन से सोशल मीडिया से जुड़ा व्‍यक्ति अपने जीवन के कुल पांच वर्ष सोशल मीडिया पर बिताता है, रोज तकरीबन एक घंटा, 45 मिनट.

कुछ याद है फेसबुक के पहले की जिंदगी, रिश्ते, रस्में कैसी थीं? कितने अधूरे, कितने पूरे? फेसबुक ने तय पाया कि हमारे दोस्तों की संख्या 5000 तक हो सकती है. उसने एक नया वर्चुअल मुहल्ला हमारे लिये बना के दे दिया. सैकड़ों लोगों के बर्थडे, शादी, हनीमून से लेकर उनके कुत्‍ते के बर्थडे और हनीमून तक से हम अपडेट रहने लगे. कौन कहां छुट्टियां मना रहा है, किस रेस्‍टोरेंट में खा रहा है, क्‍या खा रहा है, कहां जा रहा है, किसने कहां नई नौकरी ज्‍वॉइन की, किसका रिलेशनशिप स्टटेस सिंगल से डबल होते हुए कॉम्प्लिकेटेड हो गया है, हम सूचित होते रहते हैं. कौन किसके पोस्‍ट लाइक कर रहा है, किस पर कमेंट कर रहा है, किसने किसके पोस्‍ट पर कमेंट और लाइक करना बंद कर दिया है और किस नई वॉल पर शुरू कर दिया है. कितने म्‍यूचुअल फ्रेंड हैं. कौन कहां क्‍या नेटवर्किंग कर रहा है, कौन सा लड़का किस लड़की की वॉल पर जेंडर सेंसिटिव कमेंट कर उसे इंप्रेस करने की कोशिश कर रहा है. कौन अमरीका जा रहा है और कौन झुमरी तलैया.

क्या फेसबुक और सोशल मीडिया हमें इस भयावह भीड़ में और भी अकेला कर रहा है? क्या अकेलापन पूरी दुनिया में एक महामारी की तरह फैल रहा है? क्‍या उसकी वजह वे सारे झूठ हैं, जो फेसबुक पर तैर रहे हैं?



मोबाइल खोलते ही एक भीड़ का बांध टूटता है और हमें बहा ले जाता है. रोज. रोज दो बार. या फिर और ज्यादा. जिनके 5000 दोस्त हैं, क्या वे नॉरमल लोग हैं या दोस्ती के मायने भी बदल गये हैं? क्‍या ये वर्चुअल दोस्‍त सचमुच दोस्‍त हैं? हकीकत की जमीन पर यह वर्चुअल दोस्‍ती कितनी देर तक टिक पाती है? ये कितनी सच्‍ची है? एंथ्रोपोलॉजिस्‍ट रॉबिन डनबर के दिमाग में ऐसे ही कुछ सवाल थे, जब 2016 में उन्‍होंने फेसबुक पर एक अध्‍ययन किया. अध्‍ययन में कुछ ऐसे सवाल पूछे गए थे.

- आप फेसबुक पर हैं?
- फेसबुक पर आपके कितने दोस्‍त हैं?
- उनमें से कितने दोस्‍तों को आप निजी तौर पर जानते हैं?
- कितने दोस्‍त ऐसे हैं, जिन्‍हें फेसबुक पर तो देखते हैं, लेकिन कभी मिले नहीं.
- कितने ऐसे हैं, जिनसे सामाजिक तौर पर पार्टियों या गेट-टुगेदर में मिलते हैं?
- कितने ऐसे हैं, जिनके साथ वक्‍त बिताते हैं?
- कितने ऐसे हैं, जिनके साथ निजी बातें शेयर करते हैं?
- कितने ऐसे हैं, जिन्‍हें आप किसी संकट में रात 2 बजे भी बेहिचक फोन कर सकते हैं?

सर्वे के आकड़े चौंकाने वाले थे. 5000 दोस्‍तों और हजारों फॉलोवरों वाली फेसबुक पीढ़ी के वास्‍तविक करीबी दोस्‍तों की संख्‍या महज 5 थी. वो ज्‍यादा से ज्‍यादा डेढ़ सौ लोगों को जानते थे, 15 को करीब से जानते थे और महज पांच लोग ऐसे थे, जिन्‍हें वो सचमुच अपना दोस्‍त कह सकते थे.

5 भी बहुत बड़ी संख्‍या लगती है, अगर उस लड़की की कहानी याद करूं, जिसने आत्‍महत्‍या से पहले फेसबुक पर लिखा था कि वो मरने जा रही है और लोगों ने मजाक समझकर उसकी पोस्‍ट लाइक कर दी. फेसबुक आज समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय बना हुआ है. पीट्सबर्ग यूनिवर्सिटी के स्‍कूल ऑफ मेडिसिन की रिसर्च कहती है कि सोशल मीडिया के कारण लोगों में अकेलापन बढ़ा है. शिकागो यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर कॉग्निटिव एंड सोशल न्‍यूरोसाइंस के डायरेक्‍टर कैकिओपो की किताब Loneliness: Human Nature and the Need for Social Connection सोशल मीडिया के बाद इंसानों में तेजी बढ़े अकेलेपन के बारे में बात करते हुए कहती है कि जो जितना ज्‍यादा वक्‍त सोशल मीडिया पर बिता रहा है, वह अपने निजी जीवन में उतना ज्‍यादा अकेला है.

इतने प्‍यार से “व्‍हॉट इज इन योर माइंड” पूछने और दोस्‍तों के दोस्‍तों तक का बर्थडे याद दिलाने वाला सोशल नेटवर्क आखिर हमारा अकेलापन दूर क्‍यों नहीं कर पा रहा है?



जब हम अपने घर में अकेले और उदास बैठे हैं तो अपनी फेसबुक वॉल स्‍क्रॉल करते हुए ऐसा लगता है कि पूरी दुनिया खुश है, एक हमें छोड़कर. फिर थोड़ी देर बाद हम अपना फोन चेक करते हैं और पाउट वाली कोई पुरानी फोटो फेसबुक पर इस कैप्‍शन के साथ पोस्‍ट कर देते हैं- “फीलिंग ऑसम.” असल में तो हम उदास थे, लेकिन फेसबुक पर ऑसम फील करने लगे. उस ऑसम पर पांच लोग दिल बनाकर जाते हैं और 25 लोग लाइक करके. अकेला महसूस कर रहे इंसान से बात करने वाला कोई नहीं क्‍योंकि जो बात कर सकते थे, वो सब 25 और लोगों की वॉल पर दिल बनाने और लव यू सो मच लिखने में बिजी हैं. गंभीर बात भी वर्चुअल ही हो रही है- इनबॉक्‍स में. और तभी ये हो सकता है कि एक व्‍यक्ति जवाब का इंतजार कर रहा हो और दूसरा साइन आउट करके इनबॉक्‍स से आउटबॉक्‍स हो जा जाए. सैकड़ों बार इस तरह संवाद खत्‍म होने पर लोग छला हुआ सा महसूस करते हैं, लेकिन वर्चुअल दुनिया में किसी बात की कोई गारंटी, कोई जिम्‍मेदारी नहीं है. ये सब जानते हैं. अभी जवाब न पाकर जो अकेला पड़ गया है, कल किसी और को ऐसे ही अकेला छोड़ साइन आउट हो सकता है.

एक बार 25 साल की एक लड़की ने मुझे बताया कि उसने अपना फेसबुक अकाउंट ही डीएक्टिवेट कर दिया क्‍योंकि उसे रोज लगता था कि पूरी दुनिया की शादी हो रही है, सब लड़कियां हनीमून पर जा रही हैं और वो अकेली रह गई है. एक बार एक औरत ने मुझसे इनबॉक्‍स में पूछा कि आप मेरे पति की फ्रेंडलिस्‍ट में हैं. आप तो औरतों के पक्ष में लिखती हैं. क्‍या मेरे पति की जासूसी करने में मदद करेंगी क्‍योंकि उसने मुझे ब्‍लॉक कर रखा है. उसे शक था कि उसके पति का किसी और के साथ अफेयर है. वो मुझसे सिर्फ अपने पति के वॉल के स्‍क्रीनशॉट मांग रही थी.



लोग जिंदगी में दुखी, लेकिन फेसबुक पर सुखी हैं. पति के साथ पहाड़ों पर छुट्टियों का फोटो एलबम लगाने वाली औरत इनबॉक्‍स में आपको बताती है कि कैसे उसका पति अकसर उसे पीटता है. एक स्‍त्री शादी खत्‍म होने के बाद गरिमा से नया जीवन शुरू करने की बजाय फेसबुक पर विरहणी नायिका बन गई है. एक आदमी दिन-रात अपने पुरस्‍कारों और उपलब्धियों का ही बखान करता रहता है. लग रहा है फेसबुक मानो कोई रंगमंच हो. चारों ओर हर वक्‍त कोई परफॉर्मेंस चल रहा है. सुख-दुख, पीड़ा-आनंद, प्रेम-विरह सबकुछ अभिनय का हिस्‍सा है. लोग जी नहीं रहे, एक-दूसरे को इंप्रेस करने के उपक्रम में मुब्तिला हैं. वो खुश नहीं हैं, सिर्फ दूसरों को बताना चाहते हैं कि वो खुश हैं. कई बार वो दुखी भी नहीं हैं, लेकिन दुख का अभिनय कर रहे हैं. निजी उपलब्धियां तब तक बेमानी हैं, जब तक फेसबुक पर नहीं हों.

और इन सबके बीच पूरी दुनिया में अकेलापन महामारी की तरह फैल रहा है. इतना कि सरकार लोनलीनेस मंत्रालय और मंत्री बना रही है. फेसबुक पर सबको सबकी पल-पल की खबर है, लेकिन दिल का हाल कोई किसी का नहीं जानता.

शिकागो यूनिवर्सिटी की स्‍टडी कहती है कि हम इतिहास के सबसे ज्‍यादा कनेक्‍टेड, लेकिन सबसे ज्‍यादा अकेलेपन के मारे लोग हैं.
अकेला होना और अकेलेपन का शिकार होना एक ऐसा स्टेटस है, जो हम फेसबुक पर शेयर नहीं करते.

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