'ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो' पढ़ें मियां दाद ख़ां 'सैयाह' का कलाम

'ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो' पढ़ें मियां दाद ख़ां 'सैयाह' का कलाम
मियां दाद ख़ां 'सैयाह' का कलाम. Image Credit/Pixabay

मियां दाद ख़ां 'सैयाह' (Miyan Dad Khan Sayyah) पहले 'इशाक़' तख़ल्‍लुस रखते थे, मगर जब मिर्जा़ 'ग़ालिब' के शार्गिद हुए तो 'सैयाह' (Sayyah) तख़ल्‍लुस पाया.

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  • Last Updated: July 16, 2020, 10:26 AM IST
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मियां दाद ख़ां 'सैयाह' (Miyan Dad Khan Sayyah) मिर्जा़ असद उल्‍लाह ख़ां 'ग़ालिब' (Mirza Ghalib) के चहीते शार्गिदों में शुमार थे. 'सैयाह' औरंगाबाद के रहने वाले थे. पहले 'इशाक़' तख़ल्‍लुस रखते थे, मगर जब मिर्जा़ 'ग़ालिब' के शार्गिद हुए तो 'सैयाह' (Sayyah) तख़ल्‍लुस पाया. मियां दाद ख़ां नाम था और सैफ़लहक़ (Saiful Haque) लक़ब था, जो 'ग़ालिब' ने दिया था. वह फ़ारसी ज़बान बहुत अच्‍छी तरह जानते थे. फ़ारसी और उर्दू दोनों ज़बानों में शेर कहते थे. मगर शेरो-सुख़न (Shayari) की दुनिया में उन्‍हें वह अहमियत नहीं मिली जिसके वह हक़दार थे और 80-85 बरस की उम्र में 1907 में उनका इंतक़ाल हो गया. 'सैर-सैयाह' उनकी मशहूर किताब है. आज हम  'रेख्‍़ता' के साभार से हाजि़र हुए हैं मियां दाद ख़ां 'सैयाह' का दिलकश कलाम लेकर, तो पढ़िए और लुत्‍फ़ उठाइए...



बैठेंगे दीवाने दो...
क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो



ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो
लाल डोरे तेरी आंखों में जो देखे तो खुला

मय-ए-गुल-रंग से लबरेज़ हैं पैमाने दो

ठहरो तेवरी को चढ़ाए हुए जाते हो किधर

दिल का सदक़ा तो अभी सर से उतर जाने दो

मना क्यों करते हो इश्क़-ए-बुत-ए-शीरीं-लब से

क्या मज़े का है ये ग़म दोस्तो ग़म खाने दो

हम भी मंज़िल पे पहुंच जाएंगे मरते खपते

क़ाफ़िला यारों का जाता है अगर जाने दो

शम् ओ परवाना न महफ़िल में हों बाहम ज़िन्हार

शम्अ-रू ने मुझे भेजे हैं ये परवाने दो

एक आलम नज़र आएगा गिरफ़्तार तुम्हें

अपने गेसू-ए-रसा ता-ब-कमर जाने दो

सख़्त-जानी से मैं आरी हूं निहायत ऐ तल्ख़

पड़ गए हैं तेरी शमशीर में दंदाने दो

हश्र में पेश-ए-ख़ुदा फ़ैसला इस का होगा

ज़िंदगी में मुझे उस गब्र को तरसाने दो

गर मोहब्बत है तो वो मुझ से फिरेगा न कभी

ग़म नहीं है मुझे ग़म्माज़ को भड़काने दो

जोश-ए-बारिश है अभी थमते हो क्या ऐ अश्को

दामन-ए-कोह-ओ-बयाबां को तो भर जाने दो

वाइज़ों को न करे मना नसीहत से कोई

मैं न समझूंगा किसी तरह से समझाने दो

रंज देता है जो वो पास न जाओ 'सय्याह'

मानो कहने को मेरे दूर करो जाने दो



जिस तरह थी कलीम को...
है दिल को इस तरह से मेरे यार की तलाश

जिस तरह थी कलीम को दीदार की तलाश

हों रिंद सर खुला भी जो होवे तो डर नहीं

ज़ाहिद नहीं कि मुझ को हो दस्तार की तलाश

मैं हूं कहीं प आठों पहर है उसी की फ़िक्र

जाती नहीं है दिल से मेरे यार की तलाश

दिल हाथों-हाथ बिक गया बाज़ार-ए-इश्क़ में

करनी पड़ी न मुझ को ख़रीदार की तलाश

अपने ही दिल में ढूंढ़ना लाज़िम था यार को

इतने दिनों जो की भी तो बे-कार की तलाश

बैआना नक़्द-ए-जां करो 'सय्याह' पेश-कश

रहती है उन को ऐसे ख़रीदार की तलाश

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कोई काम आता है...
कौन सय्याद इधर बहर-ए-शिकार आता है

ताइर-ए-दिल क़फ़स-ए-तन में जो घबराता है

ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं का जो इस शोख़ के ध्यान आता है

ज़ख़्म से सीना-ए-मजरूह का चर जाता है

हिज्र में मौत भी आई न मुझे सच है मसल

वक़्त पर कौन किसी के कोई काम आता है

अब तो अल्लाह है यारान-ए-वतन का हाफ़िज़

दश्त में जोश-ए-जुनूं हम को लिए जाता है

डूब कर चाह-ए-ज़क़न सीना मेरा दिल निकला

क़द्द-ए-आदम से सिवा आब नज़र आता है

मुज़्दा ऐ दिल कि मसीहा ने दिया साफ़ जवाब

अब कोई दम को लबों पर मेरा दम आता है

तेग़ सी चलती है क़ातिल की दम-ए-जंग ज़बां

सुल्ह का नाम जो लेता है तो हकलाता है

तुर्रा-ए-काकुल-ए-पेचां रुख़-ए-नूरानी पर

चश्मा-ए-आईना में सांप सा लहराता है

शौक़ तौफ़-ए-हरम-ए-कू-ए-सनम का दिन रात

सूरत-ए-नक़्श-ए-क़दम ठोकरें खिलवाता है

दू-ब-दू आशिक़-ए-शैदा से वो होगा क्योंकर

आईने में भी जो मुंह देखते शरमाता है

सख़्त पछताते हैं हम दे के दिल उस को 'सय्याह'

अपनी अफ़्सोस जवानी पे हमें आता है
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