'ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो', आज पढ़ें 'ज़िंदगी' पर कुछ अशआर

'ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो', आज पढ़ें 'ज़िंदगी' पर कुछ अशआर
आज बात 'ज़िंदगी' की...

उर्दू शायरी (Urdu Shayari) में बात जब ज़िंदगी (Life) की आती है, तो हर शायर ने इसे अपने नज़रिये से महसूस किया और क़लमबंद किया है...

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 20, 2020, 11:30 AM IST
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शेरो-सुख़न (Shayari) की दुनिया में हर जज्‍़बात को बेहद ख़ूबसूरती के साथ काग़ज़ पर उकेरा गया है. बात चाहे इश्‍क़ो-मुहब्‍बत (Love) की हो या समाज के किसी और मसले पर क़लम उठाई गई हो. शायरी में हर जज्‍़बात (Emotion) को ख़ूबसूरती के साथ बयान किया गया है. आज हम शायरों के इसी बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए 'रेख्‍़ता' के साभार से लेकर हाजि़र हुए हैं. शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात 'ज़िंदगी' की हो और दिल तक गई हो. तो आप भी इसका लुत्‍़फ़ उठाइए...

जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
जौन एलिया
ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम
मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं


इमाम बख़्श नासिख़

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
निदा फ़ाज़ली

मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी

ज़िंदगी शायद इसी का नाम है
दूरियां मजबूरियां तन्हाइयां
कैफ़ भोपाली

उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
सीमाब अकबराबादी



सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहां
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां
ख़्वाजा मीर दर्द

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
निदा फ़ाज़ली

ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में
हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे
बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे
शकील बदायूूंनी

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देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से
साहिर लुधियानवी
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