दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए, पढ़ें शहरयार की शायरी

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए, पढ़ें शहरयार की शायरी
शहरयार की शायरी

'शहरयार' (Shahryar) की शायरी : ज़िन्दगी के इस तमाशे में किसी इक मोड पर, कोई शामिल दूसरा होगा मुझे मालूम है...

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'शहरयार' (Shahryar) की शायरी : उर्दू के मशहूर शायर (Shayar) 'शहरयार' किसी परिचय के मोहताज नहीं है. उनका वास्तविक नाम कुंवर अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान (Akhlaq Mohammed Khan) था. शहरयार ने 'उमराव जान' फिल में लिए भी ग़ज़ल (Ghazal) लिखी जोकि आज भी लोगों की ज़बान पर हैं. शहरयार को उनकी शायरी के लिए ज्ञान पीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया. उनकी महत्वपूर्ण कृतियां हैं- ख़्वाब का दर बंद है, शाम होने वाली है, मिलता रहूंगा ख़्वाब में आदि शामिल हैं. आज हम 'कविताकोश' के साभार से आपके लिए लाए हैं 'शहरयार' का मुहब्‍बत भरा कलाम ...

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये...
दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये
इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार
दीवार-ओ-दर को ग़ौर से पहचान लीजिये



माना के दोस्तों को नहीं दोस्ती का पास
लेकिन ये क्या के ग़ैर का एहसान लीजिये

कहिये तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएँ
मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिये.



हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के...

हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के
आँधी ने ये तिलिस्म भी रख डाला तोड़ के

आग़ाज़ क्यों किया था सफ़र उन ख़्वाबों का
पछता रहे हो सब्ज़ ज़मीनों को छोड़ के

इक बूँद ज़हर के लिये फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के

कुछ भी नहीं जो ख़्वाब की तरह दिखाई दे
कोई नहीं जो हम को जगाये झिन्झोड़ के

इन पानियों से कोई सलामत नहीं गया
है वक़्त अब भी कश्तियाँ ले जाओ मोड़ के
इसे गुनाह कहें या कहें सवाब का काम...

इसे गुनाह कहें या कहें सवाब का काम
नदी को सौंप दिया प्यास ने सराब का काम

हम एक चेह्रे को हर ज़ाविए से देख सकें
किसी तरह से मुकम्मल हो नक्शे-आब का काम

हमारी आँखे कि पहले तो खूब जागती हैं
फिर उसके बाद वो करतीं है सिर्फ़ ख़्वाब का काम

वो रात-कश्ती किनारे लगी कि डूब गई
सितारे निकले तो थे करने माहताब का काम

फ़रेब ख़ुद को दिए जा रहे हैं और ख़ुश हैं
उसे ख़बर है कि दुश्वार है हिजाब का काम.

सराब = मरीचिका
जाविए = कोण
नक्शे-आब = जल्दी मिट जाने वाला निशान
हिजाब = पर्दा

अब तुझे भी भूलना होगा मुझे मालूम है....
अब तुझे भी भूलना होगा मुझे मालूम है
बाद इसके और क्या होगा मुझे मालूम है.

नींद आएगी, न ख्वाब आएँगे हिज्रांरात में
जागना, बस जागना होगा मुझे मालूम है.

इक मकां होगा, मकीं होगा न कोई मुन्तजिर
सिर्फ दरवाज़ा खुला होगा मुझे मालूम है.

आगे जाना, और भी कुछ आगे जाना है मगर
पीछे मुडकर देखना होगा मुझे मालूम है.

ज़िन्दगी के इस तमाशे में किसी इक मोड पर
कोई शामिल दूसरा होगा मुझे मालूम है.
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