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लड़कों के यौन शोषण के खिलाफ पुलिस में तत्‍काल रिपोर्टिंग की जरूरत

News18Hindi
Updated: October 23, 2019, 2:18 PM IST
लड़कों के यौन शोषण के खिलाफ पुलिस में तत्‍काल रिपोर्टिंग की जरूरत
लड़कों के यौन शोषण के खिलाफ पुलिस में तत्‍काल रिपोर्टिंग की जरूरत

वक्‍त का तकाजा है कि समाज में जागरुकता पैदा की जाए ताकि लड़कों के यौन शोषण की रिपोर्ट दर्ज करने की किसी भी तरह की अनिच्छा, उदासीनता और लापरवाही को खत्म किया जा सके.

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  • Last Updated: October 23, 2019, 2:18 PM IST
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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार वर्ष 2017 में पूरे भारत में बच्चों के खिलाफ कुल 1,29,032 अपराध हुए. जबकि 2016 में बच्‍चों के खिलाफ 1,06,958 अपराध दर्ज किए गए.

वर्ष 2017 के दौरान बच्‍चों के साथ घटित बलात्कार के कुल 17,557 मामलों को दर्ज किया गया. हालांकि, बच्चों के साथ घटित बलात्कार के 10,059 मामलों को पॉक्‍सो अधिनियम से नहीं जोड़ा गया था. यह तथ्‍य इस बात की पुष्टि करता है कि या तो पुलिस अधिकारियों में पॉक्‍सो अधिनियम के बारे में किसी भी तरह की जानकारी का अभाव है, या फिर वे इस अधिनियम को जानने को इच्‍छुक नहीं हैं. गौरतलब है कि पॉक्‍सो बाल बलात्कार के मामलों में एक अधिक कठोर अधिनियम है और इसका उद्देश्य उन पीडि़त बच्‍चों को न्याय दिलाना है जो यौन हिंसा के शिकार हो चुके हैं. पीडि़त बच्‍चों को न्‍याय दिलाने का यह सबसे बड़ा कदम है, जिसे जिला पुलिस प्रमुख और राज्य पुलिस प्रमुखों द्वारा संज्ञान में लिया जाना चाहिए ताकि तत्काल इस दिशा में कार्रवाई की जा सके. बाल बलात्कार के सभी मामलों की एफआईआर (प्राथमिकी) में पॉक्‍सो अधिनियम को लागू करना एक कानूनी आवश्यकता है और इसमें से किसी भी तरह की लापरवाही को बर्दाश्‍त नहीं किया जाना चाहिए.

रिपोर्ट के एक खंड से पता चलता है कि वर्ष 2017 के दौरान पॉक्‍सो अधिनियम के तहत केवल 940 मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें पीड़ित जो थे वे लड़के थे. गौरतलब है कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लड़कों की जनसंख्या 23 करोड़ 2 लाख हैं.

वर्ष 2007 में महिला और बाल विकास मंत्रालय ने बाल यौन शोषण की घटनाओं का अनुमान लगाने के लिए एक राष्ट्रीय अध्ययन किया था. उस अध्‍ययन के अनुसार 48 प्रतिशत लड़कों ने किसी न किसी स्तर पर यौन शोषण का सामना किया था. वर्ष 2017 में कैलाश सत्‍यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन (केएससीएफ) ने भी एक अध्ययन किया था. अध्ययन से यह बात निकलकर सामने आई कि 25 प्रतिशत लड़कों ने यौन शोषण का सामना किया है. यहां तक कि अगर हम लड़कों के बीच बाल यौन शोषण (सीएसए) की घटनाओं के लिए बेंचमार्क के रूप में 25 प्रतिशत का ही आंकड़ा लेते हैं, तो यह स्पष्ट है कि लड़कों के बाल यौन उत्पीड़न की घटनाओं को पुलिस द्वारा दर्ज नहीं किया जा रहा है. हम मानते हैं कि लड़कों के यौन शोषण की रिपोर्टिंग नहीं होने का पहला कारण पीडि़त बच्‍चों के माता-पिता हैं, जो उनकी किसी भी तरह की अनिच्‍छा या अज्ञानता को ही दर्शाता है.

वक्‍त का तकाजा है कि समाज में जागरुकता पैदा की जाए ताकि लड़कों के यौन शोषण की रिपोर्ट दर्ज करने की किसी भी तरह की अनिच्छा, उदासीनता और लापरवाही को खत्म किया जा सके. बाल यौन शोषण से संबंधित मामलों की स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग की जाए और वे मामले रजिस्‍टर्ड भी हों.

केएससीएफ का स्‍पष्‍ट रूप से मानना है कि जब तक बाल यौन शोषण के मामलों की रिपोर्टिंग नहीं होगी, उसको रजिस्‍टर्ड नहीं किया जाएगा, उसकी जांच नहीं होगी और बाल यौन शोषण के आरोपी को चार्जशीटेड तथा दोषी नहीं ठहराया जाएगा, तब तक लड़कों के यौन शोषण के अपराध को नियंत्रण में नहीं लाया जा सकता है. इसलिए समाज को सुरक्षित बनाने के लिए इन कदमों को तत्‍काल और अनिवार्य रूप से उठाने की जरूरत है.

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First published: October 23, 2019, 1:56 PM IST
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