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Valentine's Day 2020: मुहब्‍बत के वे शायर, जिनके इश्‍क़ के रंग में उनका कलाम रंग गया

Naaz Khan | News18Hindi
Updated: February 14, 2020, 11:46 AM IST
Valentine's Day 2020: मुहब्‍बत के वे शायर, जिनके इश्‍क़ के रंग में उनका कलाम रंग गया
साहिर ने अपनी मुहब्‍बत की कसक को अल्‍फ़ाज़ में कुछ इस तरह बयां किया है.

इश्‍क़ जब मुसव्विर को होता है तो वह रंगों से अपने जज्‍़बात उकेरता है और जब किसी शायर को होता है तो उसके अल्‍फ़ाज़ से जो दर्द भरी आह निकलती है, वह इश्‍क़ होती है.

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  • Last Updated: February 14, 2020, 11:46 AM IST
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इश्‍क़ वह शजर है जो अक्‍सर उसी साए में पनपता है, जहां उसके फलने की गुंजाइश कम होती है. जब भी इश्‍क़ होता है, सरहद, धर्म-मज़हब, ज़ात, अमीरी और न जाने कितने फ़ासलों, दीवारों के बावजूद होता है. शायद यही वजह है कि यह कभी नाकाम होता है तो कभी कामयाब हो जाता है, मगर कितने ही बंधनों, फ़ासलों को पार करने के बाद और यहां तक आते-आते दर्द की एक गहरी छाप दिल पर नक्‍़श हो चुकी होती है. इश्‍क़ जब मुसव्विर को होता है तो वह रंगों से अपने जज्‍़बात उकेरता है और जब किसी क़लमकार, शायर को होता है तो उसके अल्‍फ़ाज़ से जो दर्द भरी आह निकलती है, वह इश्‍क़ होती है.

मीर तक़ी मीर दर्द के शायर कहे जाते हैं. यह वह दर्द था जो इश्‍क़ के रास्‍ते उनके दिल में घर कर गया था. कहा जाता है कि मीर अपने उस्‍ताद ख़ान 'आरज़ू' की बेटी से मुहब्‍बत कर बैठे थे. मीर ने 'तज़करा शोरा-ए-उर्दू' में ख़ान 'आरज़ू' को अपना उस्‍ताद माना है. मगर जब इस बात का ख़ान 'आरज़ू' को पता लगा तो दोनों के बीच दरार आ गई. इसका मीर के दिल पर ऐसा गहरा ज़ख्‍़म लगा कि उन्‍होंने लोगों से मिलना जुलना छोड़ दिया और ख़ुद को एक कमरे में क़ैद कर लिया. उनके ज़हन पर भी इसका गहरा असर हुआ. उनके दर्द की इसी कसक को उनके कलाम में महसूस किया जा सकता है.

मीर के कलाम की यह ख़ासियत है कि उनके दर्द की कसक अपनी ओर खींचती है.
मीर के कलाम की यह ख़ासियत है कि उनके दर्द की कसक अपनी ओर खींचती है.


पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है

जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

मजाज़ जिस फ्लैट में रहते थे, उसके नीचे वाले हिस्‍से में एक नर्स रहती थीं. वह किसी अस्‍पताल में मुलाज़िम तो नहीं थीं, मगर निजी तौर पर नर्स का काम करती थीं. मजाज़ की मशहूर नज्‍़म 'नर्स की चारागरी' उन्‍हीं से मुताल्लिक़ मालूम होती है. उस समय उन्‍होंने मजाज़ की शराबनोशी रोकने की कोशिश की. दिल्‍ली में रहने के दौरान दो बातें ऐसी हुईं जिनको मजाज़ की ज़िंदगी में बहुत अहमियत
हासिल थी. एक तो शराबनोशी ने लत की सूरत इख़्तियार कर ली और दूसरी अहम बात यह हुई कि मजाज़ को एक शादीशुदा औरत से इश्‍क़ हो गया. इस बारे में एक बार आल अहमद सरवर ने कहा था कि अब तक दिल पर जो ज़ख्‍़म आए थे, वह ज़रा हल्‍के थे, मगर दिल्‍ली में एक ज़ख्‍़म ऐसा भी लगा कि उसकी चोट सारी उम्र न गई. शुरू में तो सब ठीक था, मगर मजाज़ इससे ज्‍़यादा चाहत थे आख़िर मायूसीउनके हाथ लगी.

हालांकि मजाज़ की बर्बादी और शराब की लत के लिए उनकी नाकाम मुहब्‍बत को इल्‍ज़ाम दिया जाता रहा है और उस वक्‍़त के ज्‍़यादातर शायरों, अदीबों ने उनकी ज़िंदगी में शामिल उनकी माशूक़ा को बेरहम नायिका के तौर पर पेश भी किया है. दरअसल, देखा जाए तो मजाज़ की बर्बादियों में किसी दूसरे से ज्‍़यादा ख़ुद उनका हाथ था. मजाज़ के इन इश्‍क़ के बारे में उनके करीबी दोस्‍त अली जवाद ज़ैदी की यह राय कुछ कम अहमियत नहीं रखती कि वह किसी एक के होकर नहीं रह सकते थे. फिर यह भी हक़ीक़त है कि मजाज़ ने एक इश्‍क़ की नाकामी के बाद लखनऊ में एक उसी तरह की दूसरी औरत, जो शादीशुदा थीं, उनसे दिल लगा लिया. अगर उन्‍हें किसी एक ही से मुहब्‍बत होती, तो मजाज़ अपनी नज्‍़म 'मादाम' उनवान से लिखी. नज्‍़म में उस औरत के हुस्‍न का क़सीदा इतनी अच्‍छी तरह लिखने न बैठ जाते. वहीं एक दूसरी लड़की से भी मजाज़ के इश्‍क के चर्चे आम रहे. मजाज़ की मशहूर नज्‍़म 'आवारा' में उस लड़की का नाम भी आ गया है. वह नज्‍़म इस तरह है-

रात हंस-हंस कर यह कहती है कि मैख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़ लाला रुख़ के काशाने में चल

यूं तो मजाज़ को कई बार मुहब्‍बत हुई, मगर एक ज़ख्‍़म दिल पे ऐसा लगा कि उम्र भर न गया.
यूं तो मजाज़ को कई बार मुहब्‍बत हुई, मगर एक ज़ख्‍़म दिल पे ऐसा लगा कि उम्र भर न गया.


जहां तक बात शायरे-इंक़लाब जोश मलीहाबादी की है, तो इस बात का उन्‍होंने इक़रार किया है कि उन्‍हें इश्‍क़ हुआ और बार-बार हुआ. इसके लिए अपनी आपबीती 'यादों की बरात' में उन्‍होंने बाक़ायदा पूरा एक अध्‍याय 'मेरे मुआश्‍क़े' के नाम से लिखा है और खुल कर अपनी कैफ़ियत को बयां किया है. उन्‍होंने उन लड़कियों के नाम के सिवा शायद ही कुछ छुपाया हो. जहां तक बात साहिर लुधियानवी की है तो कहा जाता है कि उनका मिज़ाज लड़कपन से ही आशिक़ाना था. यही वजह है कि उनकी ज़िंदगी में कई लड़कियां आईं. कई बार उन्‍‍‍‍‍हें मुहब्‍बत हुई. हालांकि वह किसी से शादी नहीं कर सके.

साहिर जब कॉलेज के दूसरे साल में थे तो एक लड़की को दिल दे बैठे थे. दोनों के इश्‍क़ के इतने चर्चे बढ़े कि दोनों को कॉलेज से निकाल दिया गया. दरअसल, उनकी प्रे‍मिका हॉस्‍टल में रहती थींं. छुट्टियों में साहिर के बुलाने पर वह हॉस्‍टल आ गईं. प्रिंसिपल को दोनों का यह मिलाप पसंद नहीं आया और इन्‍हें कॉलेज छोड़ना पड़ा. वह लड़की साहिर से शादी करना चाहती थी, लेकिन मज़हब की दीवार आड़े आ गई. फिर साहिर उस वक्‍़त बेरोज़गार भी थे. ऐसे में दोनों का मिलना मुमकिन नहीं हो सका. साहिर ने उस लड़की पर एक नज्‍़म लिखी थी, जिसका उनवान था, 'किसी को उदास देख कर'.

तुम्‍हें उदास-सी पाता हूं मैं कई दिन से
न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
वह शोख़ियां, वह तबस्‍सुम, वह क़हक़हे न रहे
हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम

साहिर लुधियानवी के एक अच्‍छे दोस्‍त हमीद अख्‍़तर थे, उन्‍होंने उनके बारे में अपनी किताब 'आशनाइयां क्‍या-क्‍या' में लिखा है कि साहिर की मंगनी हो चुकी थी, लेकिन वह टूट गई. साहिर का एक खुला इश्‍क़ अमृता प्रीतम से भी था. मगर कुछ ऐसा हुआ कि दोनों के बीच दूरियां पनप गईं. इसका ज़िक्र अमृता प्रीतम ने अपनी आपबीती 'रसीदी टिकट' में भी किया है. अपनी इस हालत पर साहिर ने अमृता के लिए एक नज्‍़म भी लिखी थी-

महफ़िल से उठ जाने वालो, तुम लोगों पर क्‍या इल्‍ज़ाम
तुम आबाद घरों के वासी, मैं आवारा और बदनाम
मेरे साथी ख़ाली जाम...

निदा फ़ाज़ली ऐसे शायर हैं जिनके कलाम में दर्द की रंगत तो है, मगर उम्‍मीदों भरा मुहब्‍बत का रंग भी मौजूद है.
निदा फ़ाज़ली ऐसे शायर हैं जिनके कलाम में दर्द की रंगत तो है, मगर उम्‍मीदों भरा मुहब्‍बत का रंग भी मौजूद है.


बाद में यह नज्‍़म फि़ल्‍म 'दूज का चांद' में शामिल हो गई. इसके अलावा अपने समय की मशहूर पार्श्‍व गायिका से भी साहिर का इश्‍क़ रहा. वह उनके घर जाती थीं. यहां तक कि उनकी रसोई में जाकर तवे पर रोटियां भी सेंकती थीं. साहिर भी उनसे शादी करना चाहते थे, लेकिन साहिर की मां ने शर्त रख दी कि वह अपना धर्म बदल लें और इस तरह यह कहानी भी अधूरी रह गई. उनके लिए साहिर ने नज्‍़में लिखी हैं. नज्‍़म 'तेरी आवाज़' में उन्‍होंने उनसे अपने इश्‍क़ का इज़हार कुछ इस तरह किया है-

रात सुनसान थी बोझिल थीं फ़ज़ा की सांसें
रूह पे छाए थे बेनाम ग़मों के साए
दिल को यह ज़िद थी कि तू आए तसल्‍ली देने
मेरी कोशिश थी कि कमबख्‍़त को नींद आ जाए

वहीं नज्‍़म 'माज़ूरी' में साहिर ने ज़िंदगी और ज़हन की कहानी सुनाई है. इसके अलावा भी साहिर को कई और लड़कियों से मुहब्‍बत हुई. जहां तक निदा फ़ाज़ली की बात है तो वह मुहब्‍बत के मामले में ख़ुश क़िस्मत रहे हैं. उन्‍होंने मुहब्‍बत की उस लज्‍़ज़त को महसूस किया जो अक्‍सर शायरों के कलाम में दर्द की मिठास घोल देती है. उनका इश्‍क़ उम्र, मज़हब के फ़ासले के बावजूद कामयाब भी हुआ.

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First published: February 6, 2020, 3:30 PM IST
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