#HumanStory: खुद व्हीलचेयर पर बैठकर दूसरों को अपने म्यूजिक पर थिरकाते हैं DJ वरुण खुल्लर

पूरे दो साल मैंने न सूरज का उगना देखा, न ढलना. बिस्तर पर पड़ा रहता. उठने के लिए दो लोगों का सहारा लेता. जब बाहर निकला तो हर जगह रिजेक्शन मिला. क्लब जैसी जगह पर व्हीलचेयर पर बैठे डीजे की कोई कल्पना भी नहीं कर पाता था.

News18Hindi
Updated: August 15, 2018, 10:23 AM IST
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Updated: August 15, 2018, 10:23 AM IST
(मिलें, वरुण खुल्लर से जो देश के पहले दिव्यांग डीजे (डिस्क जॉकी) हैं. पढ़ाई के दौरान एक एक्सिडेंट ने उन्हें हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर ला दिया, लेकिन इससे उनके हौसलों पर कोई फर्क नहीं पड़ा. वे कहते हैं, 'आप चल रहे हों तो मैं भी तो अपनी व्हीलचेयर पर चल ही रहा हूं. इसमें फर्क कहां है!')

वरुण उर्फ डीजे आमिष जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे. इसी दौरान दोस्तों के साथ मनाली घूमने गए. वरुण याद करते हैं, उस ट्रिप में जिंदगी को यू-टर्न दे दिया. पत्रकार बनने की चाह सीधे म्यूजिक से जुड़ गई. एक दोस्त गाड़ी चला रहा था. सामने से आती ट्रक से बचने के लिए कार मोड़ी जो सीधी 25 फीट गहरी खाई में जाकर फंसी. हम सबको बाहर निकाल लिया गया. मेरी हालत खराब थी. मनाली में डॉक्टरों ने दिल्ली ले जाने की सलाह दी. एयरलिफ्ट न हो सका. एंबुलेंस से दिल्ली लाया गया और इलाज शुरू हो गया.

आईसीयू से जनरल वार्ड में 10 दिन बाद लाया गया. मैं लेटा रहता. तब तक मुझे पता नहीं था कि हुआ क्या है. पैर हिलाने की कोशिश करता लेकिन कोई मूवमेंट नहीं था. मुझे लगा कि एक्सिडेंट से पैर भी शॉक में हैं. परिवार में भी किसी ने मुझसे कोई गंभीर बात नहीं की. आखिरकार सब्र टूटने पर मैंने सीधे डॉक्टर से पूछा. उन्होंने कहा- तुम अब कभी चल नहीं पाओगे. डॉक्टर का बिना किसी घालमेल का सीधा सा जवाब देर तक मुझे सुनाई नहीं दे सका. जब समझ आया तो भी यकीन नहीं आया. अब भी मुझे इस 'कभी' पर यकीन नहीं. लगता है, ये छोटा-सा वक्त है जो खत्म हो जाएगा.



अस्पताल में 2 महीने गुजारने के बाद घर लौटा तो असल तकलीफ इंतजार कर रही थी. मैं हर वक्त बिस्तर पर लेटा रहता. छोटे-छोटे कामों के लिए भी किसी मदद की जरूरत पड़ती. कोई बिठा देता तो बैठा रहता, कोई उठा देता तो उठ जाता. सुबह कार में थैरेपी के लिए अस्पताल ले जाया करता.
उसी थोड़ी देर की ड्राइव में जितना आसमान दिखता, देख लेता. पूरे दो सालों तक मैंने न उगता सूरज देखा, न ढलता सूरज. बस एक ही काम किया- म्यूजिक सुनना. घरवालों से मांग करता कि मुझे फलां बुक ला दो, ये वाला सॉफ्टवेयर ला दो. मैं म्यूजिक सुनता और अपने तरीके से उसे बनाता-सजाता. संगीत में दिलचस्पी तो पहले से ही थी लेकिन इन दो सालों ने मुझे उसके और करीब ला दिया.

लंबे वक्त तक अपने ही घर में नजरबंद रहा. तब पहली बार अकेले घर से बाहर आया, कार ड्राइव करनी शुरू की. हिम्मत जुटाकर यहां-वहां जाना शुरू किया. मैं डीजे बनने के लिए किसी इंस्टीट्यूट में दाखिला चाहता था. सबने व्हीलचेयर पर बैठे लड़के को एडमिशन देने से इन्कार कर दिया. भटकते-भटकते आखिरकार गुड़गांव के एक इंस्टीट्यूट में दाखिला मिला. लगभग छह महीने के कोर्स के बाद खुद प्रैक्टिस की और फिर दूसरी भटकन शुरू हो गई. मैं काम मांगने जाता तो लोग सहानुभूति जताते लेकिन कोई हुनर देखने तक को तैयार नहीं होता था.
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जहां भी जाता, मानो रिजेक्शन देखने के लिए ही जाता. बड़े-बड़े क्लबों को भी इस ख्याल से ही शर्म आती कि उनका डीजे व्हीलचेयर पर हो सकता है. कहीं भी सीढ़ियों के साथ रैंप नहीं था. एक क्लब में मैंने रैंप बनवाने की बात कही तो उनका सीधा जवाब था- इससे क्लब का 'लुक' खराब हो जाएगा. यानी आप दिव्यांग हैं तो जिंदगी जीने, उसका लुत्फ लेने का आपको कोई हक नहीं. आप घर रहें. मैंने तब भी हिम्मत नहीं हारी. रिजेक्शन के लिए ही सही, मैं भटकता रहा.

बीते साल जून में मुझे पहला बड़ा ब्रेक मिला. इस बेक्र का मेरी व्हीलचेयर से कोई ताल्लुक नहीं. इसका सीधा संबंध मेरे संगीत से है. मैं जब डीजे आमिष बनकर फ्लोर पर पहुंचता हूं तो कोई भी अपने पैरों को थिरकने से नहीं रोक पाता. चाहता हूं कि लोग मुझे मेरे म्यूजिक से याद रखें कि न कि इसलिए कि मैं व्हीलचेयर पर हूं.

(इंटरव्यू- कल्पना शर्मा)

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