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हम मरी हुई बकरी को फांसी देने पर तुले हैं

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Updated: October 18, 2019, 2:11 PM IST
हम मरी हुई बकरी को फांसी देने पर तुले हैं
दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर पढ़ें एक रिपोर्ट

पड़ोसी राज्य (पंजाब-हरियाणा) में पराली जलाने की वजह से दिल्ली में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है. पढ़िए मौसम के बढ़ते मिजाज और दिल्ली सरकार के रवैये पर एक रिपोर्ट...

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  • Last Updated: October 18, 2019, 2:11 PM IST
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(पंकज रामेंदु)

इश्क फिल्म में नायक (अजय देवगन) एक इमारत की ऊपरी मंजिल की खिड़की से भागने की कोशिश करता है. और गिरकर एक पाइप पर लटक जाता है. वो पाइप को पकड़े-पकड़े खुद को बचाने की गुहार लगा रहा होता हैं, तभी उसे इमारत के दूसरे छोर पर एक आदमी दिखाई देता है. यह आदमी उसी पाइप को काटने पर तुला है जिस पर नायक लटका हुआ है. नायक घबरा कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगता है. लेकिन दूसरी छोर पर बैठा हुआ आदमी अपने काम में लगा रहता है. अचानक उसकी नज़र लटके हुए नायक पर पढ़ती है. वो उसको देखता है और फिर पाइप काटने में जुट जाता है. नायक उसे देख कर और ज़ोर से चिल्लाता है. दूसरे छोर पर बैठा हुआ आदमी अपने कान की तरफ इशारा करके नायक को समझाता है कि वो सुन नहीं सकता है. पाइप पर लटका हुआ नायक जो अपनी जिंदगी को जाता हुआ देख रहा है चिढ़ते हुए बोलता है ‘अबे सुन नहीं सकता है, देख तो सकता है ना’.
अक्टूबर मध्य से लेकर लगभग पूरे नवंबर तक दिल्ली की हालत उसी लटके हुए इंसान की तरह हो जाती है. खास बात ये है कि दिल्ली ज़ोर से चिल्ला भी नहीं सकती है क्योंकि दम घोंटू माहौल में उसकी आवाज़ भी नहीं निकल सकती है.

पड़ोसी राज्य (पंजाब-हरियाणा) में इसी वक्त किसान पराली जलाना शुरू करते हैं. खास बात ये है कि पड़ोसी राज्य ये कहते हैं कि पराली जलाने में काफी कमी आई है. ईपीसीए (एन्वायर्नमेंट पॉल्यूशन (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल) अथॉरिटि) का भी यही कहना है कि दिल्ली की हालत में पराली महज़ 10 फीसदी ही जिम्मेदार है. वहीं इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी (आइआईटीएम) भी यही मानता है कि दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने से 10 से 15 फीसद इज़ाफा हुआ है.

हालांकि आइआइटीएम के मुताबिक, बीते दस दिनों में इसमें बेपनाह बढ़ोतरी देखने को मिली है. 7 अक्टूबर को जहां पराली जलाने के 12 मामले सामने आए थे, वहीं अगले दिन ये मामले बढ़कर 46 हुए, और 11 अक्टूबर को इनकी संख्या 146 थी, जो उसके ही अगले दिन 172 हो गई. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पराली जलाने पर नियंत्रण को लेकर सरकारें कितनी गंभीर हैं. दरअसल पराली जलाने वाला किसान भी इसकी गंभीरता को शायद आंक ही नहीं पा रहा है. उसे लगता है कि इससे हमारा क्या बिगड़ने वाला है. वो शायद ये सोच ही नहीं पा रहा है कि हवाएं सीमाओं में बंध कर नहीं बहती हैं. उसकी फितरत में सिर्फ बहना होता है और हवा रुख बदल भी सकती है. ईपीसीए जिस तरह से ये कह रहा है कि दिल्ली में प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार क्षेत्रीय स्तर पर खुले में जलाया जाने वाला प्लास्टिक, धूल और धुआं है. उससे इंकार नहीं किया जा सकता है और इसमें कोई दो राय नहीं है कि पराली जलाने के मामले में पहले की अपेक्षा काफी कमी आई है लेकिन हमें ये समझना भी ज़रूरी होगा कि जब मरीज आइसीयू में होता है तो थोड़ा भी उसके लिए बहुत होता है.
हालांकि दिल्ली सरकार भी कोई दूध की धुली नहीं है, दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी रटारटाया काम करना आता है. जैसे ही दिल्ली में प्रदूषण में इज़ाफा देखने को मिलता है वो तुरंत पड़ोसियों के सिर पर पराली जलाने का दोष मढ़ने लग जाते हैं, और समाधान के लिए उनके पास ऑड-ईवन रह जाता है. ऐसा नहीं है कि ऑड-ईवन नहीं होना चाहिए, अगर इससे रत्ती भर भी फर्क पड़ता है तो ये बिल्कुल होना चाहिए. लेकिन फिर इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए. मुख्यमंत्री ऑड-ईवन तो लाते हैं लेकिन फिर उसमें कहीं बाइकवालों को छूट, कहीं महिलाओं को छूट, तमाम तरह की छूट लाकर वो ऑई-ईवन को ईवन कहां रहने देते हैं. क्या महज़ 15 दिनों के लिए इस प्रक्रिया को सख्ती से नहीं निभाया जा सकता है? क्या मुख्यमंत्री अपने वोट बैंक को किनारे पर ऱखकर कुछ पल के लिए ये नहीं सोच सकते हैं कि वो भी इसी हवा में सांस ले रहे हैं (और उन्हें तो सांस की पहले से ही तकलीफ भी है)?

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एक बार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल इस मुद्दे पर बोल भी चुकी है कि जब दिल्ली की हालत खराब है तो किसी को भी छूट क्यों दी जाए? दिल्ली के ट्रांसपोर्ट को सुधारने पर कुछ बेहतर काम नहीं हुआ है. मेट्रो इस कदर मंहगी है कि रोज़ाना सफर करने वाला अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा मेट्रो के किराए में दे देता है. इसलिए वो अपने साधन से जाना बेहतर समझता है. हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जब जनता की बात आती है तो वो पालन करने वाली होती है. अगर आदेश सख्ती से दिया जाए और निगरानी के साथ उसका पालन करवाया जाए तो जनता को उसका पालन करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है.

आखिर क्यों पराली जलती है....
दरअसल हरियाणा और पंजाब के किसान खेती के मामले में उत्तर प्रदेश के किसान से कहीं आगे हैं. यहां पर जब धान की कटाई की जाती है तो उसके लिए मजदूरों की जगह मशीनों का इस्तेमाल होता है. मशीन से कटाई का एक नुकसान ये होता है कि वो धान वाले हिस्से को काट देती है और बाकी फसल खेत में खड़ी रह जाती है. किसान अगर इसे हटवाता है तो उसका खर्चा ज्यादा आता है और किसान सोचता है कि जो काम माचिस की एक तीली से निपट रहा है उसके लिए पैसा खर्च करने की क्या ज़रूरत हैं. बस किसान उसे जला देते हैं. जबकि यूपी में ऐसा नहीं है वहां अब भी अधिकतर जगहों पर धान की कटाई मजदूर ही करते हैं. वहां इसे जड़ से काटा जाता है और किसान पुआल का चारा बनाकर पशुओं को खिलाते हैं.

समाधान तो है मगर अपनाए कौन...
कृषि वैज्ञानिकों ने पराली से निपटने के लिए एक मशीन तैयार की है. इसका नाम पेड्डी स्ट्रॉ चॉपर है. ये मशीन पराली के छोटे –छोटे टुकड़े करके उसे खेत में फैला देती है, बाद में बारिश होने पर ये गल कर खेत की मिट्टी को उपजाऊ बना देते हैं. इस मशीन का दाम 1.45 लाख रुपये है जिस पर सरकार 50 फीसद की सब्सिडी भी देती है. लेकिन दिक्कत ये है कि किसान इसे खरीदने में इसलिए रुचि नहीं दिखाता है क्योंकि उसे लगता हे पराली की समस्या तो महज़ दो तीन हफ्ते की होती है, उसके बाद तो ये मशीन साल भर यूंही पड़े-पड़े जंग खाएगी. वहीं हरियाणा और पंजाब सरकार पराली जलाने से रोकने के लिए केंद्र का मुंह ताक रही है. केंद्र कह रहा है कि हम पहले ही खर्च कर चुके हैं.

कुल मिलाकर दिल्ली, हरियाणा और पंजाब की सरकारें भी इस मसले पर एक दूसरे के साथ आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेल रही हैं... हर साल इस बात पर बहस छिड़ती है और ये पिछले पांच सालों से हो रहा है लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकलता है. किसान को कुछ लेना देना नहीं है वो इस बारे में तब सोचेगा जब उसके घर में धुआं भरेगा. दरअसल प्रकृति को संभालने और प्रदूषण को खत्म करने के मामले में हमारी सरकारें उस कहानी की याद दिलाती हैं जिसमें रानी के गिरने के बाद सब दोष एक दूसरे पर मढ़ रहे होते हैं.

एक बार एक रानी अपने राज्य की नदी में नहाने जाती है. जब वो घाट से नीचे उतर रही होती है तो पानी पड़ा होने के कारण उसका पैर फिसल जाता है और वो गिर पड़ती है जिससे उसकी कमर टूट जाती है. इस बात से क्रोधित हुए राजा, पानी गिराने वाले को जवाब तलब करता है. पानी डालने वाला वहां पर आता है और बताता है कि इसमें उसका कोई दोष नहीं है दरअसल पानी भरने वाली मशक अच्छी नहीं बनी थी इसलिए पानी एक जगह पर गिर पड़ा. मशक बनाने वाला बोलता है कि उसने मशक तो ठीक बनाई थी लेकिन कसाई ने उसे चमड़ा सही नहीं दिया था. कसाई का कहना था कि जिस बकरी का चमड़ा था वो बीमार थी उसकी ठीक से देख रेख नहीं हुई थी. बकरी पालने वाला बोलता है कि उसकी बकरी खाती ही नहीं थी, उसने कई बार कोशिश की, हार कर उसे कसाई को सौंपा गया. कुल मिलाकर बात समझ में आती है कि इस पूरे प्रकरण में दोष बकरी का था. राजा बकरी को फांसी की सजा का एलान करता है. जो पहले से ही मर चुकी है. इस तरह सब कुछ पहले की ही तरह चलने लगता है.

तो बस 15 दिन की बात है, उसके बाद फिर सब कुछ वैसा ही हो जाएगा, कम से कम अगले साल तक ये मुद्दा तो नहीं उठेगा.

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First published: October 18, 2019, 2:06 PM IST
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