सफेद चादर पर खून का दाग नहीं तो लड़की चरित्रवान नहीं

वर्जिनिटी टेस्‍ट- ये शब्‍द सुनने में उतना डरावना नहीं है जितनी इसकी ग्राफिक डीटेल. उन लड़कियों की कल्‍पना कर ही रूह कांप जाती है, जो हर क्षण इस डर में जी रही हैं कि शादी की रात ब्‍लीडिंग होगी या नहीं. हर क्षण जिनके चरित्र पर मर्दवाद की चोर नजर है. जो हर क्षण शक के दायरे में है.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: May 20, 2019, 1:28 PM IST
सफेद चादर पर खून का दाग नहीं तो लड़की चरित्रवान नहीं
वर्जिनिटी टेस्‍ट
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: May 20, 2019, 1:28 PM IST
ये इस शुक्रवार की घटना है. महाराष्‍ट्र के थाणे में रहने वाला एक परिवार पुलिस के पास गया और उसने शिकायत दर्ज कराई कि समुदाय के लोगों ने उसका सामाजिक बहिष्‍कार कर दिया है. कुछ ही दिन पहले लड़के की दादी की मृत्‍यु हुई तो परिवार, रिश्‍तेदार और समुदाय का कोई व्‍यक्ति उनकी अंतिम यात्रा में भी नहीं आया. उस परिवार का पूरी तरह सामाजिक बहिष्‍कार कर दिया गया था.
वजह?



क्‍योंकि महाराष्‍ट्र के कंजरभाट समुदाय में पैदा हुए विवेक और ऐश्‍वर्या तमाईचिकार ने शादी की रात वर्जिनिटी टेस्‍ट से इनकार कर दिया था.

फिलहाल पुलिस ने प्रॉहिबिशन ऑफ पीपुल फ्रॉम सोशल बायकॉट (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रीड्रेसल) एक्‍ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है.

वर्जिनिटी टेस्‍ट..

वर्जिनिटी टेस्‍ट मतलब इस बात का कन्‍फर्मेशन कि शादी के पहले लड़की किसी और मर्द के साथ नहीं सोई. वर्जिनिटी टेस्‍ट मतलब औरत के चरित्र का प्रमाण पत्र. लेकिन क्‍या आपको पता है कि ये टेस्‍ट होता कैसे है? कंजरभाट समुदाय की एक लड़की की वो शादी वाली रात कैसी होती है? उस दिन क्‍या होता है?
ये कहानी खुद विवेक की पत्‍नी ऐश्‍वर्या तमाईचिकार की जबानी है.
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ऐश्‍वर्या तब छोटी थीं. उनकी एक दूर की बहन की शादी हुई तो शादी की रात वर्जिनिटी टेस्‍ट किया गया. चादर पर खून का दाग मिला. लड़के को बधाइयां दी गईं. लड़की उठी, उसने कपड़े पहने, वो सफेद चादर सलीके से तह की और अपने दुल्‍हन के सामानों वाले सूटकेस में रख ली. अगले दिन सुबह विदाई थी.
वो ससुराल पहुंची तो किसी विजेता की तरह. ससुराल में सुबह से ही दुल्‍हन की मुंह दिखाई के लिए आने वालों का तांता लगा था. जब भी कोई मिलने आता तो लड़की खून के दाग वाली वो सफेद चादर लेकर आती और मेहमान को दिखाती. वो उसे उलटकर-पलटकर, परखकर देखते और दुल्‍हन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते. फिर चादर सलीके से तहाकर रख दी जाती. फिर कोई नया मेहमान आता. फिर चादर खुलती. कई दिनों तक ये सिलसिला चलता रहा, जब तक नई दुल्‍हन का मुंह देखने लोग आते रहे.
लड़की के सामानों के साथ आई वो चादर कोई मामूली चादर नहीं थी. वो लड़की की पवित्रता, उसके चरित्र, उसके अनछुए होने का प्रमाण पत्र थी. ऐश्‍वर्या ने ये सब अपनी आंखों से देखा था. उन्‍हें तब भी नहीं पता था कि वर्जिनिटी टेस्‍ट के नाम पर उस दिन कमरे के अंदर क्‍या हुआ था, लेकिन ये लाल निशान वाली सफेद चादर का बार-बार खुलना और तहाया जाना एक अजीब तरह का अवसाद पैदा करता था.
वो अपनी एक और बहन की कहानी सुनाती हैं.

विवेक और ऐश्‍वर्या तमाईचिकार की शादी की तस्‍वीर
विवेक और ऐश्‍वर्या तमाईचिकार की शादी की तस्‍वीर


उसकी शादी हुई और परीक्षा की घड़ी आ पहुंची. चादर पर खून का दाग नहीं मिला. भाभी ने कमरे में जाकर चेक किया. बाहर आकर लड़की के घरवालों को बोला, तुम्‍हारी लड़की वर्जिन नहीं है. लड़की रोती रही, कहती रही कि आज तक किसी लड़के ने उसे हाथ भी नहीं लगाया, लेकिन कोई नहीं माना. लड़के वालों ने शादी तोड़ी तो नहीं, लेकिन लड़की जब ससुराल गई तो उसके सामानों में वो चरित्र का प्रमाण पत्र नहीं था और न ही उसके चेहरे पर गर्व और दर्प का वो भाव. वो सबकी नजरों में हमेशा के लिए अपराधी साबित हो चुकी थी.

ऐश्‍वर्या तमाईचिकार के साथ डेढ़ घंटे लंबे रिकॉर्डेड इंटरव्‍यू की तफसीलें ऐसी हैं कि उसे सुनते हुए लगता है मानो वो किसी आदिम युग की कथा है. यकीन करना मुश्किल है कि इक्‍कीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में इस देश के महानगर और उससे सटे इलाकों में होटल के कमरों और लॉज में चोरी-छिपे इतने बर्बर तरीके से किसी लड़की के चरित्र का परीक्षण किया जा रहा है.

ऐश्‍वर्या शादी की रात होने वाले उस वर्जिनिटी टेस्‍ट की तफसील बहुत विस्‍तार से सुनाती हैं.

कंजरभाटों में शादी शाम के समय होती है. शादी के बाद एक पंचायत बैठती है, जिसमें लड़का और लड़की, दोनों पक्षों के पंचायत के प्रमुख बैठते हैं. लड़के वाले सवाल करते हैं, लड़की के मां-बाप जवाब देते हैं. लड़की के शरीर की हरेक डीटेल पूछी जाती है. उसे कभी कोई बीमारी तो नहीं हुई, उसके शरीर पर कहीं कोई घाव या चोट का निशान तो नहीं, उसके दांत सारे सही-सलामत हैं. लड़की को ऐसे नापा-जोखा जाता है मानो वो इंसान नहीं, कोई सामान हो. फिर लड़की के मां-बाप से पूछा जाता है कि सब सही है, लड़की को भेजा जा सकता है. दरअसल वो ये पूछ रहे होते हैं कि लड़की के पीरियड तो नहीं चल रहे. अगर लड़की पीरियड में होती है तो बारात वापस चली जाती है और पांच दिन बाद फिर आती है. अगर पीरियड नहीं होते तो लड़की को सुहागरात के लिए भेजा जाता है.



ये सब लड़की की विदाई से पहले हो रहा है. ये काम लड़की के घर में नहीं होता, बल्कि इसके लिए अलग से एक लॉज या होटल का कमरा बुक किया जाता है. कंजरभाट समुदाय के वो ठिकाने भी पहले से तय होते हैं. लॉज और होटल वाले को भी पता होता है कि कमरा किसलिए बुक किया जा रहा है.

जिस कमरे में शादी के बाद लड़का-लड़की को भेजा जाता है, उसे पहले सैनिटाइज किया जाता है. पूरे कमरे की जांच होती है कि वहां पहले से कोई चाकू, कैंची, ब्‍लेड या ऐसी कोई भी धारदार चीज न हो, जिससे काटकर खून निकाला जा सके. लड़की को कमरे में बिलकुल निर्वस्‍त्र भेजा जाता है. ब्रा तक नहीं पहनने देते वरना ब्रा के हुक से वह शरीर को खरोंचकर उससे खून निकाल सकती है. लड़का और लड़की, दोनों को चेक किया जाता है कि उनके शरीर पर पहले से कोई चोट या घाव तो नहीं है. फिर दोनों को कमरे में निर्वस्‍त्र छोड़ देते हैं. उन्‍हें सेक्‍स करने के लिए आधे-एक घंटे का समय दिया जाता है. इस बीच घर के बड़े जैसे दीदी-जीजा और भईया-भाभी कमरे के दरवाजे पर ही पहरा देते रहते हैं कि कहीं वो बाहर से खून या रंग लाकर न डाल दें.

लड़का-लड़की को किसी भी तरह उतने समय के भीतर सेक्‍स करना होता है. अगर उनसे नहीं हो रहा है तो उन्‍हें पोर्न दिखाया जाता है. कई बार तो भईया-भाभी खुद डेमो देते हैं और करके बताते हैं कि कैसे करना है. ऐश्‍वर्या बताती हैं कि एक बार उनकी एक कजिन के साथ ऐसा हुआ कि उससे नहीं हो पा रहा था तो उसकी भाभी ने कमरे में जाकर चेक किया. उन्‍होंने अपनी आंखों के सामने ये सब होते देखा और बाहर आकर बोलीं कि सब ठीक से हो रहा है, तुम्‍हारी लड़की वर्जिन नहीं है.

ये सब होने के बाद एक बार फिर पंचायत बैठती है. लड़के वालों की पंचायत का हेड लड़के से पूछता है, “तुमको जो माल दिया गया था, वो कैसा था?” ये लड़की को ‘माल’ बुलाते हैं. अगर लड़की की ब्‍लीडिंग हुई होती है तो लड़का मराठी में तीन बार बोलता है, “खरा-खरा-खरा” और अगर ब्‍लीडिंग नहीं होती तो तीन बार बोलता है, “खोटा-खोटा-खोटा.” लड़की वर्जिन होती है तो खुशी-खुशी बिरयानी पकती है, वर्जिन नहीं होती तो दाल-चावल खाकर बारात विदा हो जाती है.



ऐश्‍वर्या कहती हैं कि कंजरभाटों में ये माना जाता है कि अगर चादर पर खून नहीं दिखा तो लड़की पहले भी किसी के साथ सेक्‍स कर चुकी है. फिर भरी पंचायत में सबके सामने लड़की से पूछा जाता है कि पहले उसने किसके साथ सेक्‍स किया है. अगर लड़की बोल रही है कि वो वर्जिन है, इससे पहले वो कभी किसी के साथ नहीं सोई तो भी कोई उसकी बात पर यकीन नहीं करता.

उस समुदाय के शिक्षित लड़के-लड़कियों ने जब भी अपने परिवार वालों को ये समझाने की कोशिश की कि कई बार लड़कियां बिना हाइमन के ही पैदा होती हैं, कई बार खेल-कूद से भी हाइमन फट सकता है. शादी की रात ब्‍लीडिंग न होने का ये अर्थ बिलकुल नहीं है कि लड़की वर्जिन नहीं है. लेकिन कोई इस बात को मानता नहीं. उनका कहना है कि हमारे यहां सैकड़ों सालों से यह प्रथा चली आ रही है और जो भी लड़की शादी की रात ब्‍लीड नहीं करती, वो किसी न किसी का नाम जरूर बताती है, जिसके साथ वो शादी से पहले सेक्‍स कर चुकी है.

अगर लड़की वर्जिन नहीं निकलती तो कुछ धार्मिक रिचुअल होते हैं और लड़के से कहा जाता है कि वो लड़की को माफ कर दे. वर्जिन न होने पर लड़की को विदा करके तो ले जाते हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से उसका अपमान बहुत होता है. उसे हमेशा इस बात का ताना देते हैं, याद दिलाते हैं कि कि वो एक खराब चरित्र की लड़की थी. शादी की रात जिसकी चादर पर खून का दाग नहीं लगा.

वर्जिनिटी टेस्‍ट. ये शब्‍द सुनने में उतना डरावना नहीं है जितनी इसकी ग्राफिक डीटेल. उन लड़कियों की कल्‍पना कर ही रूह कांप जाती है, जो हर दिन इस तकलीफ से गुजर रही हैं. हर क्षण इस डर में जी रही हैं कि शादी की रात ब्‍लीडिंग होगी या नहीं. हर क्षण जिनके चरित्र पर मर्दवाद की चोर नजर है. जो हर क्षण शक के दायरे में है.

ये ल़ड़कियां आज की तारीख में, इसी देश, इसी समाज में रह रही हैं. वो बिलकुल आपके जैसी दिखती हैं, आपके साथ ही स्‍कूल, कॉलेज, दफ्तर जाती हैं. बस अपनी कहानी का ये हिस्‍सा उन्‍होंने सबकी नजरों से छिपाकर रखा है.

ऐश्‍वर्या और उनके पति विवेक इस समुदाय के पहले शख्‍स हैं, जिन्‍होंने इस प्रथा के खिलाफ लड़ाई छेड़ रखी है. बदले में पहले तो समाज ने उन्‍हें अपमानित और परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है. बहिष्‍कार और मान‍सिक प्रताड़ना का सिलसिला लगातार जारी है.

शायद एक ऐश्‍वर्या और एक विवेक काफी नहीं. उनके समाज से ढेरों र्एश्‍वर्या और ढेरों विवेक पैदा हों तब कहीं जाकर किसी ठोस बदलाव की उम्‍मीद की जा सकती है.

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