मेरे होठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो, पढ़ें वसीम बरेलवी की शायरी

मेरे होठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो, पढ़ें वसीम बरेलवी की शायरी
वसीम बरेलवी की शायरी

वसीम बरेलवी की शायरी (Wasim Barelvi Shayari) : मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा, अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा...

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वसीम बरेलवी की शायरी (Wasim Barelvi Shayari) : वसीम बरेलवी उर्दू के मशहूर शायर हैं. वसीम बरेलवी ने अपनी शायरी में प्यार के हर जज्बात को बेहद खूबसूरत ढंग से उकेरा है. उनकी शायरी में प्यार, तड़प, जफा और वफ़ा के सारे रंग मिलते हैं. उनके शेर इतने खूबसूरत होते हैं कि आप आसानी से उनके जरिए अपने दिल की बात कह सकते हैं. वसीम बरेलवी की कुछ प्रमुख कृतियां हैं- आँखों आँखों रहे, मौसम अन्दर-बाहर के, तबस्सुमे-ग़म, आँसू मेरे दामन तेरा, मिजाज़, मेरा क्या. आज हम कविताकोश के साभार से आपके लिए लाए हैं वसीम बरेलवी की चुनिंदा शायरी...

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है...

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते
मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है


ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

बिसाते -इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

'वसीम' जहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते.

कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी...
कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी
तुझी से फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी

ऐसे रिश्ते का भरम रखना बहुत मुश्किल है
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी.

उसूलों पे जहाँ आँच आये ...

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटें
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है.

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा...

मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा.

कही सुनी पे बहुत एतबार करने लगे...

कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे
मेरे ही लोग मुझे संगसार करने लगे

पुराने लोगों के दिल भी हैं ख़ुशबुओं की तरह
ज़रा किसी से मिले, एतबार करने लगे

नए ज़माने से आँखें नहीं मिला पाये
तो लोग गुज़रे ज़माने से प्यार करने लगे

कोई इशारा, दिलासा न कोई वादा मगर
जब आई शाम तेरा इंतज़ार करने लगे

हमारी सादा -मिजाज़ी की दाद दे कि तुझे
बग़ैर परखे तेरा एतबार करने लगे.

मैं अपने ख़्वाब से बिछ्ड़ा नज़र नहीं आता...

मैं अपने ख़्वाब से बिछ्ड़ा नज़र नहीं आता
तू इस सदी में अकेला नज़र नहीं आता

अजब दबाव है इन बाहरी हवाओं का
घरों का बोझ भी उठता नज़र नहीं आता

मैं इक सदा पे हमेशा को घर छोड़ आया
मगर पुकारने वाला नज़र नहीं आता

मैं तेरी राह से हटने को हट गया लेकिन
मुझे तो कोई भी रस्ता नज़र नहीं आता

धुआँ भरा है यहाँ तो सभी की आँखों में
किसी को घर मेरा जलता नज़र नहीं आता.
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