जानिए क्यों होता है सिजोफ्रेनिया (Schizophrenia) और क्या हैं इसके लक्षण

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: September 4, 2019, 6:40 PM IST
जानिए क्यों होता है सिजोफ्रेनिया (Schizophrenia) और क्या हैं इसके लक्षण
इस बीमारी से पीड़ित इंसान वास्तविक और काल्पनिक वस्तुओं को समझने की शक्ति खो बैठता है और उसकी प्रतिक्रिया परिस्थितियों के अनुसार नहीं होती है.

इस बीमारी से पीड़ित इंसान वास्तविक और काल्पनिक वस्तुओं को समझने की शक्ति खो बैठता है और उसकी प्रतिक्रिया परिस्थितियों के अनुसार नहीं होती है.

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सिजोफ्रेनिया (Schizophrenia) एक गंभीर मानसिक बीमारी है जिससे छुटकारा पाना मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं. कई बार इस बीमारी से पीड़ित इंसान इस कदर निराश हो जाता है कि उसे आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखाई देता है. यह बीमारी ज्यादातर बचपन में या फिर किशोरावस्था में होती है जो कि 16 साल से 30 साल के बीच में है. सिजोफ्रेनिया को लेकर कई भ्रांतियां भी हैं लेकिन दरअसल ये भ्रांतियां बेफजूल हैं और उनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है.

इस बीमारी से पीड़ित इंसान वास्तविक और काल्पनिक वस्तुओं को समझने की शक्ति खो बैठता है और उसकी प्रतिक्रिया परिस्थितियों के अनुसार नहीं होती है. दुनिया में सिजोफ्रेनिया के रोगी लगभग एक फीसदी हैं. वहीं भारत में सिजोफ्रेनिया से जूझ रहे मरीजों की संख्या लगभग 40 लाख है. इस बीमारी का इलाज नहीं करवाने वाले 90 फीसदी लोग भारत जैसे विकासशील देशों में देखे जा सकते हैं जिनमें गरीबी और जानकारी के अभाव में अस्पताल जाने से बचने की आदत रहती है.

बीमारी का प्रभाव

मानसिक बीमारियों में सबसे खतरनाक माना जाने वाला सिजोफ्रेनिया कई बार जानलेवा साबित हो सकता है क्योंकि कई मरीजों में यह आत्महत्या करने की मानसिकता को बढ़ावा देता है. इस बीमारी में मरीज को हमेशा किसी के होने का अंदेशा रहता है या फिर उसे ऐसी आवाज सुनाई पड़ती है जिसका वास्तविकता से लेना देना नहीं होता है. कई मरीजों में ये लक्षण साफ देखे जा सकते हैं लेकिन कई रोगियों में ऐसा दिखाई नहीं पड़ता है. मनोचिकित्सक मानते हैं कि अलग अलग मरीज में अलग तरह के लक्षण दिखाई पड़ते हैं. इससे ग्रसित मरीज अपनी देखभाल नहीं कर पाते हैं इसलिए उनकी दूसरों पर निर्भरता बढ़ जाती है. वहीं कुछ मरीज अपने को बीमार नहीं मानकर इसके इलाज का विरोध भी करते हैं.

बीमारी की वजह

इस बीमारी की कई वजह बताई गई हैं जिनमें अनुवांशिक कारण, पर्यावरण, दिमाग में न्यूरो कैमिकल का असंतुलन, तनाव पूर्ण अनुभव, खराब पारिवारिक रिश्ते और दुर्घटना जैसी कई चीजें शामिल हैं. रिसर्च के मुताबिक जिन परिवारों में सिजोफ्रेनिया जैसी बीमारी माता-पिता या फिर दूसरी पीढ़ी में नहीं पाई गई है, वहां इस बीमारी के होने की गुंजाइश एक फीसदी से कम है. वहीं इससे ग्रसित परिवारों में इस बीमारी के होने की संभावना 10 फीसदी से ज्यादा होती है.

वहीं दिमाग में पाए जाने वाले कैमिकल जिन्हें न्यूरोट्रांसमीटर भी कहा जाता है अगर उसमें असंतुलन हुआ तो सिजोफ्रेनिया जैसी बीमारी किसी इंसान को अपने चपेट में आसानी से ले सकती है. ब्रेन में मौजूद इन कैमिकल्स का नाम डोपामाइन और सिरोटोनिन है जिनके असंतुलन से सिजोफ्रेनिया जैसी बीमारी होती है. मैरिजुआना और एलएसडी जैसे ड्रग्स भी इस गंभीर बीमारी का कारक माने जाते हैं.
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सिजोफ्रेनिया के लक्षण

1. मरीजों में भ्रम का होना जैसे कोई उन्हें तंग कर रहा है या फिर खुद को ताकतवर समझ बैठने का भ्रम पाल लेना. इतना ही नहीं कुछ रोगी अपने में दैविक शक्तियों के होने तक का एहसास करने लगते हैं.

2. मरीजों को कुछ ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं जिनका वास्तविक तौर पर सुनाई पड़ना संभव नहीं है. इसी तरह कई तरह के काल्पनिक स्वाद और सुगंध भी उन्हें महसूस होते हैं जिसे डॉक्टर हैलूसिनेशन की संज्ञा देते हैं.

3. वार्तालाप में एकरूपता की कमी और ऐसे मरीज एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु पर चर्चा करते हुए चले जाते हैं जिनमें तारतम्य का अभाव होता है. अन्य लोग हैरत में पड़ जाते हैं कि कि ये अचानक मुद्दे से भटक कर अन्य चीजों पर क्यों छलांग लगा रहे हैं.

4. ऐसे लोगों में काम करने को लेकर मोटिवेशन का अभाव होता है और वो जरूरी कामों को भी करने से बचते नजर आते हैं. इतना ही नहीं सुख या दुख की घड़ी में उनका उदगार प्रगट नहीं हो पाता है और वो या तो उदासीन या फिर तटस्थ नजर आते हैं जो एक तरह से परस्थितियों के उलट होता है.

5. मरीजों में समाज से दूरी बनाकर रहने की आदत दिखाई पड़ती है और उसे लगता है कि कोई भी उसको नुकसान पहुंचा सकता है. वो इस कदर अपने दिमाग में पल रहे भ्रम को सच मान लेते हैं कि उन्हें काल्पनिक चीजें असली लगने लगती हैं और वो दवा इसलिए भी नहीं खाना चाहते क्योंकि उन्हें शक होता है कि कहीं दवा उन्हें मारने के लिए तो नहीं खिलाई जा रही है.

6. ऐसे लोगों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, किसी चीज को याद करने की क्षमता या फिर भविष्य के लिए कोई योजना बनाने की क्षमता काफी कम हो जाती है.

सिजोफ्रेनिया के प्रकार (Types of Schizophrenia)

1. सकारात्मक लक्षण (Positive Symptoms)
काल्पनिक चीजों के होने का भ्रम या डर (psychotic symptoms) भी कहा जाता है

2. नकारात्मक लक्षण (Negative Symptoms)
मरीज बेहद ही हताशा और निराशा में जीने लगता है. इस तरह के मरीज की संख्या कुल सिजोफ्रेनिक पेशेंट में 25 फीसदी होती है जिनमें आत्महत्या करने की प्रवृतियां काफी ज्यादा होती हैं.

3. भावनात्मक लक्षण (Emotional symptoms)
इसे नकारात्मक की श्रेणी में रखा जाता है जहां दुख या सुख की परिस्थितियों में चेहरे का उदगार प्रगट नहीं होता है. इसके अलावा सोचने समझने की क्षमता का ह्रास और ध्यान केंद्रित करने की बेहद कमी होती है.

डॉक्टर्स इस बीमारी को लाइलाज नहीं मानते हैं और इसका इलाज काउंसलिंग और साइकोथिरैपी से किया जा सकता है. सिजोफ्रेनिया के लक्षणों से छुटकारा एक गंभीर प्रयास के बाद संभव है वहीं इसके लिए कई तरह की भ्रांतियां एक भ्रामक प्रचार है. इस बीमारी को Split personality, Multiple Personality कहना गलत है और इससे पीड़ित लोग हिंसक होते हैं ऐसा कहना महज एक दुष्प्रचार है.

 

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First published: September 4, 2019, 6:33 PM IST
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