सफलता और खुशी क्या मिल सकती है गूगल पर?

उस दिन मैंने उस लड़के का टिंडर प्रोफाइल खोला, जो जेट एयरवेज में पायलट था. उसने पायलट के यूनीफार्म में जहाज के कॉकपिट वाली अपनी तस्वीर हटा दी थी और वो इंट्रो लाइन भी, जिसकी वजह से उसे सबसे ज्यादा राइट स्वाइप मिलते थे.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: April 27, 2019, 4:55 PM IST
सफलता और खुशी क्या मिल सकती है गूगल पर?
सफलता क्‍या है
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: April 27, 2019, 4:55 PM IST
मुझे एक आर्टिकल लिखना था ‘सक्सेस’ पर.

सफलता क्या है? लोगों के लिए सफलता का अर्थ क्या है? 50 पार पीढ़ी, जो जीवन में सफल या असफल, जो भी होना था, हो चुकी, के लिए सफलता के क्या मायने हैं? ग्लोबलाइजेशन के पहले और बाद की पीढ़ी सफलता को कैसे देखती है? मिलेनियल्स सफलता की इस शतरंज के कौन से खांचे में अपनी कौन सी गोटी कहां रखना चाहते हैं और कैसी बाजी खेलना?



1. सफलता की परिभाषा क्या है?
2. सफलता का पैरामीटर क्या है?

3. सफलता मापने का पैमाना क्या है?
4. क्या सफलता एक शाश्वत चीज है या इसके मायने और आंकलन लगातार बदल रहे हैं?

ऐसे ढेरों सवाल थे. मैंने इंटरनेट पर पढ़ना शुरू किया. तरह-तरह की रिसर्च, स्टडी, आंकड़े, विचार, जो आपको किसी नतीजे पर पहुंचाने से ज्यादा कन्फ्यूज करने के लिए काफी थे. 50 फीसदी आर्टिकल सफलता को जीवन का अंतिम लक्ष्य बताते हुए 10 बिंदुओं में सफल होने के नुस्खे बता रहे थे तो 50 फीसदी पूछ रहे थे, “आप सफल तो हैं, लेकिन क्या आप खुश हैं.?” मैंने पढ़ना बंद कर दिया.
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ये 2007 की बात है. एक दिन सुबह अखबार खोला तो बड़ी सी हेडलाइन थी: “Is Great Depression back?” हमारे देश और जिंदगी, दोनों में सब ठीक ही चल रहा था. फिर ये किस डिप्रेशन की वापसी का अलार्म था.

पता चला, दूर कहीं अमेरिका में एक बड़ी फायनेंशियल क्राइसिस हो गई थी. अमेरिका के सबसे बड़े इन्वेस्टमेंट बैंक लेहमैन ब्रदर्स का भट्ठा बैठ गया था. बैंक डूब गए थे. बैंकों ने लोगों को बुला-बुलाकर, उनके घर जा-जाकर घर खरीदने के लिए कर्ज दिए थे और अब लोग उस कर्ज को चुकाने की स्थिति में नहीं थे. नौकरियां चली गई थीं. बैंकों ने घर वापस ले लिए थे. लोग सड़कों पर आ गए थे. अखबारों में ऐसी तस्वीरें छपती कि बच्चों के खिलौनों, साइकिल और घर के सामानों के साथ कोई परिवार सड़क किनारे बैठा है. लोग ठंड और बर्फ से बचने के लिए पब्लिक लाइब्रेरियों में दिन गुजार रहे थे क्योंकि घर पर हीटर जलाने जितने पैसे भी नहीं थे. 1930 में पूरी दुनिया में आया आर्थिक संकट, जो इतिहास में “ग्रेट डिप्रेशन” के नाम से जाना गया, के बाद ये दूसरा बड़ा आर्थिक संकट था. पूरी दुनिया में इसका असर महसूस हुआ. भारत भी इससे अछूता नहीं था.

‘द ग्रेट डिप्रेशन, 1930’. अमेरिका में बंद यूनियन बैंक के सामने जमा भीड़
‘द ग्रेट डिप्रेशन, 1930’. अमेरिका में बंद यूनियन बैंक के सामने जमा भीड़


हम जिस अमेरिका के बारे में रोज अखबारों में पढ़ रहे थे, हममें से अधिकांश लोगों ने उसे देखा नहीं था. मैं अमेरिका के बारे में इतना ही जानती थी कि मेरा कजिन दस साल पहले अमेरिका गया था और अमेरिका जाने के बाद वो लोग अचानक बहुत अमीर हो गए थे. उनके घर में दीवार के आकार का टीवी था और रिश्तेदारियों में उनकी इज्जत बढ़ गई थी. पहला लैपटॉप, पहला आइपैड, पहला आइफोन, सबकुछ पहला मैंने उसी के पास देखा. और उसके लैपटॉप में वो एक वीडियो, जिसकी टैगलाइन थी – "This is United States of America, America means SUCCESS."

तभी हमने जाना कि अमेरिका का मतलब है ‘सफलता’. सफलता का मतलब है पैसा, अच्छी लाइफ-स्टाइल और अच्‍छी लाइफ स्टाइल का मतलब है खुशी. जो ये कहते कि वो खुशी चाहते हैं, उनके लिए भी खुशी का रास्ता सफलता से ही होकर जाता था. तीसरी दुनिया के युवाओं के सपनों का देश था अमेरिका और सफलता का मतलब अमेरिका जाना.

उस दिन उस अखबार की उस हेडलाइन ने कितने युवाओं का सफलता का सपना चकनाचूर कर दिया था. 15 साल से फूल रहा खुशी का गुब्बारा फूट गया था और अमेरिका में साइकिएट्रिस्टों से लेकर मोटिवेशनल स्पीकर्स और स्प्रिचुअल गुरुओं की बहार आ गई थी.

मेरा कजिन हिंदुस्तान लौट आया था और उसके साथ सफलता का ख्वाब भी.

ऐसा ही एक ख्वाब इस महीने की 18 तारीख को टूटा, जब किसी समय हिंदुस्तान की सबसे बड़ी प्राइवेट एयरलाइन कंपनी रही जेट एयरवेज ने अमृतसर से मुंबई के लिए आखिरी उड़ान भरी और इसी के साथ कंपनी के 22,000 कर्मचारी एकाएक सड़क पर आ गए. उस जहाज को उड़ा रहे पायलट से लेकर केबिन क्रू और कर्मचारी तक सब अगले दिन से बेरोजगार हो गए थे. कंपनी बंद हो गई थी. पता नहीं किस जिज्ञासा में इस खबर के बाद मैंने उस दिन उस लड़के का टिंडर प्रोफाइल खोला, जो जेट एयरवेज में पायलट था. उसने पायलट के यूनीफार्म में जहाज के कॉकपिट वाली अपनी तस्वीर हटा दी थी और वो इंट्रो लाइन भी, जिसकी वजह से उसे सबसे ज्यादा राइट स्वाइप मिलते थे. कुछ महीने पहले टिंडर इंडिया का एक सर्वे आया था, जिसमें पायलट, एंकर और फैशन फोटोग्राफर को टिंडर पर सबसे ज्यादा स्टार पाने वाला प्रोफेशन बताया गया था.

वो लड़का अब टिंडर का स्टार नहीं था. वो अब सक्सेसफुल नहीं था.

कहीं हम भी इस भीड़ का हिस्‍सा तो नहीं?
कहीं हम भी इस भीड़ का हिस्‍सा तो नहीं?


उन 22,000 लोगों में बहुत से ऐसे भी थे, जो छोटे शहरों और कस्बों से आए थे. बड़ी मुश्किलों से पढ़कर यहां तक पहुंचे थे. छोटे शहरों की लड़कियों ने एयर होस्टेस बनने के लिए घरों में लड़ाइयां लड़ी थीं. जब पहली बार एयरलाइन की नौकरी मिली तो लगा था, सपना पूरा हो गया. ये सफलता थी और सफलता का मतलब खुशी था. लेकिन एक झटके में दोनों हाथ से जाते रहे.

अब तक तो हमने तो यही सुना था कि शीशा हो या दिल हो, आखिर टूट जाता है. लेकिन यहां तो सक्सेस सबसे भुरभुरी चीज साबित हो रही थी. कब टूट जाए, पता नहीं. और इस चीज का टूट जाना शीशे के टूट जाने जितनी मामूली बात नहीं थी.

2008 में अमेरिका में बड़ी संख्या में लोगों ने आत्महत्या की थी. सच तो ये था कि जो हाथ से जा रहा था, वो महज रोजगार नहीं था. जब हजारों की संख्या में लोग सड़क पर आ गए तो ये सिर्फ नौकरियों का जाना नहीं था. ये उस सपने का टूटना था, जो बैंक पिछले 30 साल से बेच रहे थे. वो घर नहीं बेच रहे थे, वो सपने बेच रहे थे. वो सफलता बेच रहे थे. वो नौकरियां महज नौकरी नहीं, बल्कि एक खास लाइफ स्टाइल, सक्सेस और खुशी का आइडिया थीं. वो आइडिया टूट रहा था, जिसे अपनी जमीन समझकर हम पांव जमाकर खड़े हो गए थे.

अगर ये सक्सेस नहीं थी, तो फिर सक्सेस क्या है?

इसका अर्थ समझने के लिए मैं डिक्शनरी खोलती हूं. उसमें लिखा है:

“the accomplishment of an aim or purpose”

यानी किसी लक्ष्य या उद्देश्य का पूरा होना सफलता है.

1. ये लक्ष्य क्या है ?
2. उद्देश्य क्या है?



बच्चा जब स्कूल जाता है तो मम्मी-पापा, टीचर सब कहते हैं, क्लास में फर्स्‍ट आना लक्ष्य है. लक्ष्य सारे बच्चों को यही बताया गया है. इन सारे बच्चों में जो बच्चा फर्स्‍ट आता है, वो लक्ष्‍य को पूरा कर रहा है, बाकी नहीं. यानी सिर्फ वही सक्सेसफुल है, बाकी नहीं.

सक्सेस अगर इतनी कमाल की चीज भी है तो भी वो सबके हिस्से में आने वाली चीज तो नहीं है.
क्या होता, अगर क्लास में फर्स्‍ट आने की जगह सिर्फ पढ़ना और ज्ञान हासिल करना ही लक्ष्य होता. फिर शायद कई सारे बच्चे सक्सेसफुल हो सकते थे. या हर बच्चा कम या ज्यादा, अपने तरीके से सक्सेसफुल होता.

इसलिए शायद दिक्कत सफलता की नहीं, दिक्कत लक्ष्य को, उद्देश्य को समझने और चुनने की है. फिर ये लक्ष्य जरूरी नहीं कि बड़ी नौकरी और बड़ा पैसा हो. लक्ष्य कुछ भी हो सकता है.

गाना गाना, कविताएं लिखना, खाना बनाना, क्रिकेट खेलना, बागवानी करना, साइकिल चलाना, एप बनाना या मछलियां पालना, कुछ भी. जो भी उद्देश्य है, अगर आपने उसको हासिल किया तो आप सफल हैं. अगर आप उसे बेहतर ढंग से कर पा रहे हैं तो आप सफल हैं. अगर आप अच्छी कविताएं लिख पा रहे हैं तो आप सफल हैं.



इस सफलता का कोई पैरामीटर भी नहीं है कि कितनी मात्रा में उद्देश्य पूरा होना चाहिए. कितनी सफलता का मतलब सफलता होता है. बाहर कोई पैमाना नहीं, पैमाना अपने भीतर है. अगर आप खुश हैं तो आप सफल हैं.

ऐसा नहीं कि ये सब लिखते हुए मैं भूल गई हूं कि इस लिखे का पाठक कौन है. जो महानगरों और बड़े शहरों के समृद्ध परिवारों में पैदा नहीं हुआ है, जो अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों में नहीं पढ़ा, जिसके लिए जीवन की बुनियादी चीजों, नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है और जिसका संघर्ष प्रिवेलेज्ड लोगों के मुकाबले कहीं ज्यादा है. और वो भी एक ऐसे समाज में, जहां हर किसी को आजादी नहीं कि वो सफलता को अपने ढंग से परिभाषित करे. सफलता की बनी-बनाई परिभाषा हमारे दिमागों में इंजेक्ट कर दी गई है और हमसे उम्मीद की जाती है कि हम सिर्फ उसे फॉलो करें.

ये परिभाषा आपके दिमाग में भी इंजेक्‍टड है. आप, जो इस वक्त इसे पढ़ रहे हैं. बेहतर शिक्षा, बेहतर नौकरी, बेहतर पैसा, जीवन में इन सारी चीजों की जरूरत से इनकार नहीं और न इस बात से कि ये हासिल करने के लिए आपको बाकी प्रिवेलेज्ड लोगों के मुकाबले ज्यादा मेहनत भी करनी चाहिए.
लेकिन इसके साथ दो सवाल -
पहला - वो जरूरत तो है जीवन की, लेकिन क्या वो लक्ष्य है?
दूसरा - जब हम बेहतर नौकरी, बेहतर पैसा बोलते हैं तो दरअसल कितना बेहतर, बेहतर होता है?

हम सही जवाब तक तभी पहुंचते हैं, जब खुद से सही सवाल पूछें. वरना शिक्षा और सफलता की पारंपरिक परिभाषाओें को चुनौती देने वाली कहानियां भी जिस तरह हमें कंन्फ्यूज करती हैं, वो भी कुछ कम खतरनाक नहीं. याद है फिल्म तारे जमीं पर. पूरी फिल्में ये कहती रही कि एक बच्चा पढ़ने में अच्छा नहीं, दुनिया की रेस में नहीं तो क्या हुआ. हर बच्चा अच्छा है, हर बच्चे का अपना गुण है. वो पेंटिंग में अच्छा है. जरूरी नहीं वो गणित पढ़े, वो चित्र भी बना सकता है. फिल्म सफलता के पुराने आइडिया को लगातार ब्रेक करती है और अंत में जाकर उसी सफलता के गड्ढे में गिर जाती है, जहां बच्‍चे को फर्स्‍ट प्राइज दिए बगैर फिल्‍म अपने मुकाम तक नहीं पहुंचती. महत्‍वपूर्ण क्‍या था? पेंटिंग बनाना और अच्‍छी पेंटिंग बनाना. फिर बच्‍चे को फर्स्‍ट आने की क्‍या जरूरत थी?



हम एक कनफ्यूजिंग दुनिया में हैं. स्कूल, घर, आसपास के लोग और यहां तक कि नए विचार वाला सिनेमा भी आखिर में कनफ्यूज ही कर रहा है. और ऐसे में ये सवाल खुद से ही पूछा जाना चाहिए कि सफलता मतलब क्या? और कितनी सफलता मतलब पूरी सफलता?
ज्यादा बड़ा घर, ज्यादा बड़ी नौकरी, ज्यादा पैसा, ज्यादा बैंक बैलेंस, ज्यादा सफलता? ज्यादा मतलब कितना ज्यादा?

क्या उतना ज्यादा, जितना ‘एवरीथिंग मस्ट गो’ फिल्म के हीरो ने चाहा था. अपना पूरा जीवन ज्यादा पैसे, ज्यादा बड़े घर के लिए खर्च करने के बाद आखिर में फिल्म का हीरो घर के बाहर गार्डन में अकेला बैठा है. घर का सारा सामान बाहर दालान में. हर सामान, जो इतनी मेहनत और जतन से इकट्ठा किया गया, हर सामान जो जीवन में सफलता का प्रतीक था. वो सब अब बाहर लावारिस पड़ा है. वो हर आने वाले से कहता है कि वो जो सामान उठाकर ले जाना चाहे, ले जाए.
इतनी जतन से जोड़ी थीं सफलताएं. यूं ही उठाकर अजनबियों को दे दीं क्योंकि ग्रेट डिप्रेशन में बैंक आकर सामान न भी उठा ले जाए, तो भी सबकुछ हासिल करके आखिर में आप इसी नतीजे पर पहुंचते हैं कि “एवरीथिंग मस्ट गो.”

 

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