महाराष्ट्र में कैसे शुरू हुआ गणेशोत्सव, भारत की आज़ादी से गणेश चतुर्थी का क्या है कनेक्शन?

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Updated: August 28, 2019, 12:45 PM IST
महाराष्ट्र में कैसे शुरू हुआ गणेशोत्सव, भारत की आज़ादी से गणेश चतुर्थी का क्या है कनेक्शन?
पेशवाओं ने गणेशोत्सव मनाने की परंपरा शुरू की और बाद में सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू करने का श्रेय बाल गंगाधर तिलक को जाता है.

पेशवाओं ने गणेशोत्सव मनाने की परंपरा शुरू की और बाद में सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू करने का श्रेय बाल गंगाधर तिलक को जाता है.

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यूं तो गणेशोत्सव पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जाता है लेकिन जैसा महाराष्ट्र (Maharashtra) में मनाया जाता है वैसा कहीं और देखने को नहीं मिलता है. दरअसल महाराष्ट्र में जोरशोर से मनाने के पीछे आज़ादी (Independence) की लड़ाई की एक कहानी जुड़ी हुई है. तो आइये जानते हैं कि गणेशोत्सव कैसे शुरू हुआ.

गणेश चतुर्थी का पौराणिक महत्व है. शिव पुराण के मुताबिक भ्राद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश का जन्म हुआ था. पूरे देश में लोग अपने-अपने घरों में भगवान गणेश की पूजा करते थे, लेकिन महाराष्ट्र में धूमधाम से मनाने के पीछे दूसरा कारण है.

1890 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) अक्‍सर मुंबई (Mumbai) की चौपाटी पर समुद्र के किनारे जाकर बैठते थे और सोचते थे कि कैसे लोगों को एकजुट किया जाए. वहीं उनके दिमाग में विचार आया कि क्यों न गणेशोत्सव को सार्वजनिक स्थल पर मनाया जाए, इससे हर वर्ग के लोग इसमें शामिल हो सकेंगे.

पेशवाओं ने परंपरा शुरू की

लेकिन अगर इसकी एतिहासिकता की बात करें तो इसका पूरा श्रेय मराठा पेशवाओं को दिया जाना चाहिये. कहा जाता है कि पेशवा सवाई माधवराव के शासन के दौरान पुणे के प्रसिद्ध शनिवारवाड़ा नामक राजमहल में भव्य गणेशोत्सव मनाया जाता था. अंग्रेजों के शासन के समय गणेश उत्सव की भव्यता में कमी आने लगी, लेकिन यह परंपरा बनी रही.

बाल गंगाधर तिलक का योगदान
पेशवाओं ने गणेशोत्सव का त्यौहार मनाने की परंपरा शुरू की और बाद में सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू करने का श्रेय बाल गंगाधर तिलक को जाता है. बाल गंगाधर तिलक ने पहली बार साल 1893 को पहली बार गणेशोत्सव का आयोजन किया. जो कि धीरे-धीरे पूरे महाराष्ट्र में लोकप्रिय हो गई.
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मित्रमेला संस्था
वीर सावरकर और कवि गोविंद ने नासिक में गणेशोत्सव मनाने के लिए मित्रमेला संस्था बनाई थी.इस संस्‍था का काम था देशभक्तिपूर्ण मराठी लोकगीत पोवाडे आकर्षक ढंग से बोलकर सुनाना. पोवाडों ने पश्चिमी महाराष्ट्र में धूम मचा दी थी.

कवि गोविंद को सुनने के लिए भीड़ उमड़ने लगी. राम-रावण कथा के आधार पर लोगों में देशभक्ति का भाव जगाने में सफल होते थे. लिहाज़ा, गणेशोत्सव के ज़रिए आजादी की लड़ाई को मज़बूत किया जाने लगा. इस तरह नागपुर, वर्धा, अमरावती आदि शहरों में भी गणेशोत्सव ने आजादी का आंदोलन छेड़ दिया था.
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.



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First published: August 27, 2019, 4:25 AM IST
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