सांवला कभी ख़ूबसूरत था भारत में, अब क्यों नहीं ?

हिंदुस्‍तान में गोरा बनाने वाली क्रीम का बाजार 450 मिलियन डॉलर का हो चुका है. हमने अपनी मेहनत, अपने श्रम के 450 मिलियन डॉलर गोरा बनाने वाली कंपनियों को दे दिए ताकि वो हमें अपने आप पर और शर्मिंदा होना सिखा सकें

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: April 24, 2019, 11:14 AM IST
सांवला कभी ख़ूबसूरत था भारत में, अब क्यों नहीं ?
सावंली स्त्रियों पर बनी डिजाइनर आयुष केजरीवाल की खास सीरीज की एक फोटो. उनके इंस्‍टाग्राम पेज से साभार.
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: April 24, 2019, 11:14 AM IST
“अगर स्त्रियां जैसी हैं, वैसे ही खुद को प्‍यार करने लगें तो खरबों डॉलर के उस कॉस्‍मैटिक बिजनेस का क्‍या होगा, जिसका सारा मुनाफा ही इस बात पर टिका है कि तुम जैसी हो, ठीक नहीं हो. हम तुम्‍हें बताएंगे कि तुम्‍हें कैसा होना चाहिए.”
- नओमी वुल्‍फ, ‘द ब्‍यूटी मिथ’

10 साल पहले हम गोआ में छुटि्टयां मना रहे थे. एक पीआर कंपनी की स्‍पॉन्‍सर्ड ट्रिप थी. एक बड़े ब्रांड ने बुलाया था. फाइव स्‍टार में रुकिए, गोआ घूमिए, फेनी पीजिए और घर लौटकर आर्टिकल लिखिए कि ओट्स सेहत के लिए कितना जरूरी है. तब तक भारतीय समाज में कोई ओट्स का नाम भी नहीं जानता था. मक्‍का-बाजरा-जौ सब जानते थे. अपने गांव-देहात में पैदा होता था. हमारा काम था लिखना और लोगों को यकीन दिलाना कि अब तक जीवन क्‍या जिया, ओट्स नहीं खाया तो क्‍या किया.

और 10 साल बाद करोड़ों रु. की मार्केटिंग का नतीजा हमारे सामने है. नाश्‍ते में ओट्स न खाएं तो लगता है कहीं सेहत के साथ गद्दारी तो नहीं कर रहे.

17वीं सदी के इकोनॉमिस्‍ट एडम स्मिथ ने सबसे पहले दी थी ये थियरी कि पहले माल बनाओ, फिर उसका बाजार. बाजार ने वही किया. पहले प्रोडक्‍ट बनाया, फिर उसकी जरूरत पैदा की और फिर हम उस जरूरत के गुलाम हो गए.

क्‍या गोरी त्‍वचा हमेशा से हमारी चाह, हमारी जरूरत थी? क्‍या भारतीय समाज में हमेशा गोरी लड़कियां ज्‍यादा इज्‍जत पाती थीं? प्‍यार, शादी, मुहब्‍बत के ज्‍यादा काबिल मानी जाती थीं? क्‍या सांवली बेटियों की माएं हमेशा से चिंता में घुलती थीं और क्‍या ऐसी कहावतें हमेशा से थीं हमारे समाज में, जो मेरी दादी कहा करती थीं- “कथरी हो तो सुथरी, बिटिया हो तो उजरी.”

क्‍योंकि हमारे पुराने संस्‍कृत काव्‍यों में जिस नायिका का जिक्र है, वो श्‍याम वर्ण की है. जयदेव के ‘गीत-गोविंद’ की राधा कृष्‍ण की तरह सांवली है. ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ की शकुंतला भी गोरी नहीं है. ‘मेघदूत’ में यक्ष जब मेघ से यक्षिणी के सौंदर्य का बखान करता है तो कहता है, “वो श्‍याम वर्ण देह वाली है.” भवभूति के ‘उत्‍तर रामचरित’ की सीता भी सांवली है. वात्‍स्‍यायन के ‘कामसू्त्र’ की नायिकाएं सांवली देह वाली हैं. कामसूत्र में तो एक पूरा अध्‍याय है इस पर. वो लिखते हैं-
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स्रोत: डिजाइनर आयुष केजरीवाल के इस्‍टाग्राम पेज से साभार
स्रोत: डिजाइनर आयुष केजरीवाल के इंस्‍टाग्राम पेज से साभार


“श्‍याम वर्णम सौंदर्यम भूतिम प्रतिमान अस्ति” यानी यानी सांवला रंग सौंदर्य का प्रतिमान है.

इसका सबसे मजेदार उदाहरण तो भानुभट्ट की ‘नेपाली रामायण’ में मिलता है, जिसमें शूर्पणखा को गौर वर्ण और सीता को श्‍याम वर्ण का बताया गया है. शूर्पणखा डांवाडोल चरित्र की स्‍त्री है और सीता सौंदर्य और गरिमा का प्रतीक. हालांकि शूर्पणखा का ये चरित्र चित्रण एक अलग बहस का विषय है. लेकिन फिलहाल हमारे सारे प्राचीन साहित्‍य में कहीं स्‍त्री की गोरी चमड़ी का बखान नहीं मिलता, जबकि उसके नख-शिख सौंदर्य के वर्णन से साहित्‍य अटा पड़ा है.

फिर ये कब और कैसे हो गया कि सांवली लड़कियां दुख और शर्मिंदगी में डूब गईं. त्‍वचा को गोरा बनाने वाली क्रीमों से बाजार पट गया. दुल्‍हन का विज्ञापन उसके काम, नौकरी, सोच-समझ की कोई बात कहने से पहले ये बताता कि उसकी चमड़ी का रंग गोरा है और दुल्‍हे का विज्ञापन कुछ भी चाहने से पहले ये चाहता कि लड़की तो गोरी ही होनी चाहिए.

ये कब हुआ कि लड़कियां टीवी के उन विज्ञापनों पर भरोसा कर अपने काले रंग को सफेद बनाने में जुट गईं. वो दिन में धूप से बचाने वाली क्रीम लगाने लगीं, रात में गोरा बनाने वाली क्रीम. वो दिन भर मुंह पर कुछ पोते रहतीं ताकि शादी और मुहब्‍बत के मार्केट में उनकी वैल्‍यू बनी रहे.

गोरा बनाने पर आमादा बाजार सिर्फ मुंह को गोरा बनाकर संतुष्‍ट नहीं था. उसने कहा, ये तुम्‍हारी बांह के नीचे कांख भी सांवली पड़ रही है, उसके लिए अलग क्रीम लगाओ. काले पड़ रहे होंठों को गोरा बनाने के लिए अलग क्रीम. कोहनी और घुटनों की संवलाई के लिए अलग क्रीम और यहां तक कि प्राइवेट पार्ट्स को भी गोरा बनाने की क्रीम बाजार में आ गई. वेजाइनल फेयरनेस सोप का विज्ञापन तो बेहद डरावना था. एक दुखी अकेली औरत, जिसका पति उसकी तरफ देखता तक नहीं. फिर उसे मिलता है वेजाइनल फेयरनेस सोप और उसकी जिंदगी में फिर खुशियों की बहार आ जाती है. इस विज्ञापन से पहले हम नहीं जानते थे कि प्राइवेट पार्ट का काला रंग भी जीवन में दुख का कारण हो सकता है. विज्ञापन ने हमें बताया, हमने दुख दूर करने के लिए सोप खरीदा, लेकिन दुख दूर हुआ या नहीं, पता नहीं.

स्रोत: इंस्‍टाग्राम पेज "Unfairandbeautiful" से साभार
स्रोत: इंस्‍टाग्राम पेज "Unfairandbeautiful" से साभार


एक अनफेयर दुनिया में, जहां कुछ भी फेयर नहीं है, स्किन तो फेयर हो ही सकती है. ये मैं नहीं कह रही, फेयरनेस क्रीम का विज्ञापन कहता है- “The world is not fair, You Be Fair..”

बीच-बीच में ये होता है कि कोई आता है और किसी फेयरनेस कंपनी के विज्ञापन का करोड़ों का ऑफर ठुकरा देता है, जैसे तीन दिन पहले दक्षिण की एक हिरोइन सांई पल्‍लवी ने किया. बीच-बीच में ये भी होता है कि Dark is Beautiful और unfairandlovely जैसे हैशटैग चलते हैं. कोई एक पहल करता है और सांवली त्‍वचा वाली देवियों के चित्र बनाता है तो कोई फैशन डिजाइनर डार्क स्किन मॉडल्‍स की फोटो सीरीज.

लेकिन हिंदुस्‍तान के छोटे शहरों, कस्‍बों और महानगरों के भी एक बड़े हिस्‍से में आज भी सांवली चमड़ी के साथ पैदा हुईं लड़कियां शर्मिंदा हैं और उनकी मांए दुखी. वो छिप-छिपकर गोरा होने की क्रीम लगा रही हैं. इंस्‍टाग्राम के फिल्‍टर में अपने चेहरे का सच छिपा रही हैं. काली लड़कियों पर पढ़ने और कॅरियर बनाने का ज्‍यादा जोर है क्‍योंकि शादी के मार्केट में उसकी नैचुरल वैल्‍यू ज्‍यादा नहीं. दरवाजे से बारात लौट जा रही है क्‍योंकि दुल्‍हन काली निकली और एमएनसी में काम करने वाली लड़की आत्‍महत्‍या कर रही है क्‍योंकि काले होकर जीने से तो बेहतर है मौत.

स्रोत: इंस्‍टाग्राम पेज "Unfairandbeautiful" से साभार
स्रोत: इंस्‍टाग्राम पेज "Unfairandbeautiful" से साभार


और इन सबके बीच हिंदुस्‍तान में गोरा बनाने वाली क्रीम का बाजार 450 मिलियन डॉलर का हो चुका है. हमने अपनी मेहनत, अपने श्रम के 450 मिलियन डॉलर गोरा बनाने वाली कंपनियों को दे दिए ताकि वो हमें अपने आप पर और शर्मिंदा होना सिखा सकें.

ये वही लोग हैं, जिन्‍होंने हाल ही में ब्रिटिश सुपरमॉडल नओमी कैंपबेल की तस्‍वीर छापने से मना कर दिया था, क्‍योंकि वो काली है. ये विज्ञापन सिर्फ एशियाई देशों में नहीं छपा. गोरों के देश में तो सावंली त्‍वचा वाली ये लड़की सुपर मॉडल है. काले लोगों के देश में शर्मिंदगी की बात.

और आखिर में गोआ की छुट्टियों की एक और कहानी.

मैं और एक लड़की बीच पर थे. मार्च का महीना था, लेकिन धूप बहुत तेज. हमने संस्‍क्रीन लोशन लगाया, काला चश्‍मा पहला, सिर पर हैट डाली. हम हिंदुस्‍तानी लड़कियां, पहले से सांवली और सांवली होने से डरती थीं.

और वहीं बीच पर एक स्‍वीडिश महिला बिकनी में लेटी थी. उसके बगल में एक क्रीम पड़ी थी, त्‍वचा को टैनिंग से बचाने वाली नहीं, त्‍वचा की टैनिंग बढ़ाने वाली.

उस दिन हमने एक और सच जाना.

“गोरे लोगों के देश में कंपनी त्‍वचा को सांवला बनाने वाली क्रीम बेच रही थी.”

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First published: April 24, 2019, 11:14 AM IST
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