शादी में क्यों लिए जाते हैं 7 फेरे, जानें क्या है इसका महत्व

शादी में क्यों लिए जाते हैं 7 फेरे, जानें क्या है इसका महत्व
हिंदू विवाह प्रथा में जब तक सात फेरे नहीं हो जाते तब तक विवाह संपूर्ण नहीं माना जाता है.

हिंदू धर्म में सात फेरे (7 Phere) से पूर्ण होने वाला यह बंधन सात जन्मों तक जुड़े रहने का वचन (Promise) देता है. हिंदू धर्म में विवाह (Marriage) वर और वधू समेत दोनों पक्षों के परिजनों की सहमति लिए जाने की प्रथा होती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated : November 26, 2020, 12:07 pm IST
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    'शादी का बंधन' सिर्फ दो लोगों में ही नहीं बल्कि दो परिवारों (Family) के बीच एक नई साझेदारी का रिश्ता होता है. 16 संस्कारों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण विवाह संस्कार (Wedding Rituals) होता है. इस संस्कार में समाज और अग्नि देवता को साक्षी मानकर सात फेरे लेकर दो लोगों के बीच एक पवित्र रिश्ता (Holy Relationship) कायम होता है. क्या आपने कभी सोचा है कि शादी में सात फेरे ही क्यों लिए जाते हैं. दरअसल, हिंदू धर्म में दीपावली के 11वें दिन देवउठान की प्रथा होती है और इस दिन से विवाह कार्यक्रम का शुभारंभ होता है जो लगातार 7 महीने तक चलता है. आखिर क्या धार्मिक रहस्य है इन सात फेरों के पीछे, आइए जानते हैं.

    7 वचन में 7 जन्मों तक का बंधन
    हिंदू धर्म से अलग कई धर्म ऐसे हैं जिनमें शादी दो लोगों के बीच सिर्फ एक समझौता होती है और इसको परिस्थितियों के आधार पर तोड़ा भी जा सकता है, लेकिन हिंदू धर्म में सात फेरे से पूर्ण होने वाला यह बंधन सात जन्मों तक जुड़े रहने का वचन देता है. हिंदू धर्म में विवाह वर और वधू समेत दोनों पक्षों के परिजनों की सहमति लिए जाने की प्रथा होती है. हिंदू विवाह प्रथा में पति-पत्नी के बीच शारीरिक और आत्मिक संबंध होता है जो अत्यंत पवित्र माना जाता है.

    शादी के 7 फेरे
    हिंदू धर्म में विवाह से पहले लड़के-लड़की की कुंडली और गुणों को मिलाने की प्रथा होती है. हिंदू धर्म में 16 संस्कारों का भी बड़ा महत्व है. यही, वजह है कि हिंदू विवाह प्रथा में जब तक सात फेरे नहीं हो जाते तब तक विवाह संपूर्ण नहीं माना जाता है. विवाह में वर-वधू के सात फेरे लेने की प्रक्रिया को 'सप्तपदी' भी कहा जाता है. शादी के मंडप में सात वचनों के साथ सात फेरे पूरे किए जाते हैं. प्रत्येक फेरे का वचन बहुत महत्व रखता है जो वर-वधू को जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं.



    7 फेरों का महत्व
    भारतीय संस्कृति में संख्या 7 मनुष्य के जीवन के लिए बहुत अहम होता है. इंद्रधनुष के 7 रंग, संगीत के 7 सुर, सूर्य के 7 घोड़े, मंदिर या मूर्ति की 7 परिक्रमा, 7 समुद्र, 7 चक्र, 7 ग्रह, 7 लोक, 7 तारे, 7 तल, 7 दिन, 7 द्वीप और 7 ऋषि का वर्णन किया जाता है. जीवन की क्रियाएं 7 होती हैं और ऊर्जा के केंद्र भी 7 होते हैं. सबसे अहम हिंदू धर्म में शादी का सीजन भी 7 महीने तक चलता है जिसमें अक्टूबर-नवंबर से शुरू होकर जून तक विवाह किए जाते हैं.

    7 फेरों का विधान
    7 फेरों या सप्तपदी में पहला फेरा खाने-पीने की व्यवस्था, दूसरा फेरा संयम और शक्ति संचय के लिए, तीसरा फेरा धन की व्यवस्था के लिए, चौथा फेरा आत्मिक सुख-शांति देता है. पांचवां फेरा पशुधन संपदा के लिए, छठा फेरा हर ऋतु में रहन-सहन के लिए और 7वें व अंतिम फेरे में वधू अपने वर का अनुगमन कर हमेशा साथ चलने और जीवन के हर सुख-दुख में सहयोग करने का अटूट वचन लेती है. 'मैत्री सप्तदीन मुच्यते' इसका अर्थ है कि सिर्फ 7 कदम साथ चलने से ही दो अजनबियों में भी मैत्री भाव पैदा होने लगता है.

    7वें फेरे में वर का वचन
    7वें फेरे में वर अपनी वधू से वचन लेते हुए कहता है 'हम दोनों 7 कदम चलने के बाद एक-दूजे के हमसफर और जीवनसाथी बन गए हैं. कर्म, वचन और मन के हर कदम पर हम जीवनसाथी के रूप में हमारा एक-एक कदम साथ-साथ उठे इसलिए आज अग्निदेव के सामने हम एक साथ 7 कदम रखते हैं. हम अपने गृहस्थ धर्म का उम्रभर पालन करते हुए एक-दूसरे के प्रति हमेशा सच्चे रहें और हमारा ये अटूट बंधन सदा बना रहे. 7 फेरों से शुरू हुआ हमारा ये प्यार समुद्र की तरह विशाल और गहरा हो.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)