किराए का बॉयफ्रेंड? हमें रिश्तों की ज़रूरत है या पुतलों की

जब मैंने इस तरह की ऐप्स की साइट देखी तो पता चला कि हमारा समाज किस ओर जा रहा हैं.

नवज्योत@k_navjyot | News18Hindi
Updated: September 5, 2018, 12:27 PM IST
किराए का बॉयफ्रेंड? हमें रिश्तों की ज़रूरत है या पुतलों की
जब मैंने इस तरह की ऐप्स की साइट देखी तो पता चला कि हमारा समाज किस ओर जा रहा हैं.
नवज्योत@k_navjyot
नवज्योत@k_navjyot | News18Hindi
Updated: September 5, 2018, 12:27 PM IST
बीते दिनों सोशल मीडिया पर एक खबर आई कि अब किराए पर बॉयफ्रेंड मिलेंगे. खबर में एक ऐसे ऐप का ज़िक्र था जो आप को किराए पर बॉयफ्रेंड दिलाने का दावा करता है. ऐप का नाम है 'Rent a boyfriend'. मैंने यह खबर पढ़ी और अपने ट्विटर पर शेयर की. यूं तो मैं तकरीबन हर खबर शेयर करती हूं लेकिन ज्यादातर खबरें सियासी ही होती हैं. और हर खबर पर लोगों की प्रतिक्रियाएं भी आती हैं. लेकिन इस खबर पर लोगों के रिऐक्शन बहुत आए. कुछ ने तो यहां तक लिख दिया कि क्या गर्लफ्रेंड भी किराए पर मिलेगी, कुछ ने लिखा कि अपनी गर्लफ्रेंड मिलेगी या दूसरे की. खैर इससे पता चल गया कि खबर में लोगों की इतनी रुचि है तो ऐप के कितने दीवाने होंगें. जब मैंने इस तरह की ऐप्स की साइट देखी तो पता चला कि हमारा समाज किस ओर जा रहा हैं.

'Rent a Boyfriend' ऐप में लोगों की दिलचस्पी जगी क्यों? दरअसल किराए का बॉयफ्रेंड 'Rent a Boyfriend' जैसा शब्द समाज सामने लाता है. वो समाज जो अब तक बॉयफ्रेंड शब्द हज़म नहीं कर पाया भला किराए के बॉयफ्रेंड से उसका हाज़मा क्यों नहीं बिगड़ेगा. लिहाज़ा लोगों के रिऐक्शन भी बिगड़े आए. ऐप का दावा है कि महज कुछ वक्त के लिए ये आपको ऐसा साथी मुहैया कराएगा जिसके साथ आप अपना दिल आप अपना दिल हल्का कर सकती हैं. अपनी तकलीफे साझा कर सकती हैं दावा है कि डिप्रेशन से घिरे इंसानों के लिए यह ऐप कारगर होगा. मकसद तो सही है लेकिन सवाल यह कि इसकी ज़रुरत क्यों पड़ रही है? भीड़ से घिरे इंसानों को एक साथी तलाशने के लिए ऐप की मदद क्यों लेनी पड़ रही है?

बिखरते परिवार
भारतीय संस्कृति की पहचान संयुक्त परिवार और मज़बूत रिश्ते रहे हैं. और तमाम सर्वे ये साबित कर चुके हैं कि संयुक्त परिवार में रहने वाले लोग ज्यादा सुखी और खुश होते हैं. कोई भी पेड़ तब तक टिका रह सकता है जब वो अपनी जड़ से जुड़ा है, जैसे ही उसकी जड़ें कमजोर हुई हवा उसे उड़ा ले जाएगी और उसका वजूद खत्म कर देगी. तो यहां ये बात साफ हो जाती है कि आप जब तक झुंड में हैं तब तक ही सुरक्षित हैं जहां अकेले हुए वही समाज (परेशानियां) आपको घेर लेंगी. और आप अपना अकेलापन दूर करने के लिए ऐसी ऐप्स की तरफ जाएंगें. जहां आपको नकली रिश्तों को गले लगाना पड़ेगा.

सोशल मीडिया
फोन आया तो लोगों को दूर बैठे अपनों से बात करने का मौका मिला. स्मार्टफोन आया तो सोशल मीडिया के माध्यम से लोग और करीब आ गए. लेकिन सवाल यह कि क्या वाकई हम अपनों के करीब आए या अपनों से दूर चले गए. हमें हर कोई व्यस्त नज़र आता है. कोई कम्प्यूटर पर तो कोई मोबाइल पर. यहां तक कि अपने घरों में एक ही कमरे में बैठे मां-बेटा, भाई-बहन तक एक दूसरे से बात नहीं करते क्योंकि वो सोशल साइट पर मस्त हैं. ज़ाहिरन हम अपनों से दूर हो गए हैं. इतने दूर कि साथ के लिए हमें ऐप का सहारा लेना पड़ रहा है.

यानि पहले हम अपना बना बनाया घर तोड़ रहे हैं फिर उसी को संवारने के लिए नकली रिश्तों में आशियाना तलाश रहे हैं. पिछले दिनों ऐसी ही खबर जापान से भी आई थी जिसमें लिखा था कि वहां लोग अपने कामों में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास अपनो के लिए समय नहीं. यहां तक कि लोग शादी भी नहीं कर रहे, इसलिए वहां 2 घंटे के लिए लोग गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड किराए पर लेते हैं. खबर पढ़ कर लगा था कि शुक्र है हम भारत में रहते हैं लेकिन जब अपने आसपास देखा तो भारतीय समाज भी उसी ओर जाता  दिखा.

An apple a day keeps a doctor away. लेकिन An app a day keeps everybody away. दोनों ही बातें सेहत की हैं एक में शारीरिक सेहत है तो दूसरे में मानसिक और सामाजिक सेहत को समझा जा सकता है. एक सेहत सुधारने का बात करती है तो दूसरी सेहत और समाज बिगाड़ने की. ऐप बनाना और उसका इस्तेमाल करना गलत नहीं है लेकिन ये भी सोचना होगा कि हमें खुद और आने वाली पीढ़ी को रिश्तों की ज़रूरत है या पुतलों की.
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