International Day of Sign Language: जानें क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस, क्या है इसकी खासियत

सांकेतिक भाषा एक प्राकृतिक भाषा है जो सिर्फ शरीर के हाव-भाव पर ही आधारित है.
सांकेतिक भाषा एक प्राकृतिक भाषा है जो सिर्फ शरीर के हाव-भाव पर ही आधारित है.

विश्व बधिर संघ ने अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस (International Day of Sign Language) मनाए जाने का प्रस्ताव रखा था. संयुक्त राष्ट्र (UNO) महासभा ने 23 सितंबर 2018 को सांकेतिक भाषा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी.

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  • Last Updated: September 23, 2020, 11:14 AM IST
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आपने अकसर देखा होगा जो लोग सुनने और बोलने में सक्षम नहीं होते उनका अपनी बात रखने का अलग ढंग होता है. जैसे कि वे अपने हाथ, चेहरे और शरीर के हाव से बात करते हैं जिसे सांकेतिक भाषा यानी Sign Language कहा जाता है. जिस तरह हर भाषा के अपने व्याकरण और नियम होते हैं ठीक उसी तरह साइन लैंग्वेज का भी अपना एक कोर्स (Course) होता है, लेकिन यह भाषा कभी लिखी नहीं जाती है. आपको बता दें कि विश्व बधिर संघ ने अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाए जाने का प्रस्ताव रखा था. संयुक्त राष्ट्र (UNO) महासभा ने 23 सितंबर 2018 को सांकेतिक भाषा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की. सांकेतिक भाषा दिवस पहली बार 2018 में मनाया गया था. वर्तमान साल में सांकेतिक भाषा दिवस की थीम 'साइन लैंग्वेज हर एक के लिए' है.

क्यों मनाया जाता है सांकेतिक दिवस
अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस जागरूकता और उसके महत्व को बताने के लिए मनाया जाता है. इस दिन बधिरों के लिए अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें इस भाषा की नई-नई बातों से अवगत कराया जाता है. विश्व बधिर संघ के मुताबिक दुनिया में लगभग 72 मिलियन बधिर हैं, इनमें बधिरों का 80 प्रतिशत आंकड़ा सिर्फ विकासशील देशों में हैं. विकासशील देशों में 300 से भी ज्यादा साइन लैंग्वेज का इस्तेमाल किया जाता है. आपको बता दें कि भारत में बोलने और सुनने में असमर्थ व्यक्तियों की समस्या विश्व में सबसे ज्यादा है.

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सांकेतिक भाषा सीखने के फायदे


सांकेतिक भाषा एक प्राकृतिक भाषा है जो सिर्फ शरीर के हाव-भाव पर ही आधारित है. इसे एक दृ्श्य भाषा (Visual Language) भी कहा जाता है जो कि सिर्फ दिखाई देती है क्योंकि इस भाषा को लिखा नहीं जा सकता. जब बात आती है साइन लैंग्वेज को सीखने की, आपके सामने दो विकल्प होते हैं. पहला यह कि आप इसे सिर्फ अपने शौक के लिए सीख सकते हैं. दूसरा यह कि इस भाषा को सीखने के बाद आपके पास करियर में एक विकल्प और जुड़ जाता है.

करियर के नजरिए से बेहतर
अगर आप में इस समुदाय के प्रति प्रेम-भावना है तो आप इस भाषा को सीख किसी बधिर समाजसेवी संगठन से जुड़कर इनकी मदद कर सकते हैं. इस दौरान आपको इस समुदाय के बारे में बहुत कुछ जानकारी हासिल हो सकती है. इस भाषा को सीखने के बाद आपके पास कई वर्किंग सेक्टर में करियर बनाने के ऑप्शन होंगे जैसे कि सरकारी क्षेत्र, मेंटल हेल्थ, मेडिकल, कानून से लेकर बिजनेस तक इसमें शामिल हैं. अगर आपको सांकेतिक भाषा का ज्ञान है तो आप किसी भी स्वंयसेवी संस्था से जुड़कर अपना करियर बना सकते हैं.

साथ ही परफॉर्मिंग आर्ट और कई कॉरपोरेट कंपनियां भी सांकेतिक भाषा ज्ञान होने पर आपको हायर कर सकती हैं क्योंकि अब निजी सेक्टर भी बधिरों को काम पर रखने में हिचकिचाते नहीं हैं. आप इस भाषा को सीखने के बाद एक मीडिया में भी बतौर समाचार वक्ता (News Anchor) करियर बना सकते हैं. आपको बता दें कि सांकेतिक भाषा सीखने के लिए देश भर में कई सेंटर तो काम कर ही रहे हैं, साथ ही अमेरिकन साइन लैंग्वेज जैसे कोर्स ऑनलाइन कराए जा रहे हैं.

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आमदनी का अच्छा स्रोत
इस क्षेत्र में करियर बनाने के कई मौके हैं. साथ ही शुरुआती दौर में अच्छी आमदनी भी है. यदि आप किसी विदेश एनजीओ या किसी मेडिकल क्षेत्र से जुड़ते हैं तो आपको 20 से 25 हजार शुरुआती सैलरी मिल सकती है. अनुभव बढ़ने के साथ आपकी सैलरी में भी इजाफा होगा.

जानिए कैसे होती है पढ़ाई
मूक-बधिरों को पढ़ाने के दो तरीके तैयार किए गए हैं. इसमें पहला है मौखिक संवाद और दूसरा इंडियन साइन लैंग्वेज. आपको बता दें कि देश में इंडियन साइन लैंग्वेज का चलन ज्यादा है और देशभर के 500 स्कूलों में इसी पेटर्न को इस्तेमाल में किया जाता है.
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