Mental Health: मानसिक स्वास्थ्य के बारे में अपने पैरेंट्स से बात करना आखिर क्यों कठिन होता है?

इस भावनात्मक बीमारी के प्रति देखभाल को उतना ही बढ़ाया जाना चाहिए जितना कि हमारी शारीरिक बीमारी के प्रति है.
इस भावनात्मक बीमारी के प्रति देखभाल को उतना ही बढ़ाया जाना चाहिए जितना कि हमारी शारीरिक बीमारी के प्रति है.

मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) समस्या का सामना कर रहे लोगों के लिए अपने माता-पिता (Parents) से बात करना उतना ही तनावपूर्ण है, जितना कि समस्या.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 13, 2020, 11:50 AM IST
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बच्चों, किशोरों और युवा व्यस्कों को अक्सर मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) की समस्याओं का सामना करना मुश्किल होता है. जो बात इसे और भी कठिन बना देती है, वह है इस संबंध में अपने माता-पिता से बात करना. मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना कर रहे लोगों के लिए अपने माता-पिता (Parents) से बात करना उतना ही तनावपूर्ण है, जितना कि समस्या. कोरोना वायरस महामारी ने देखने के नजरिए को बहुत बदल दिया है. अतीत की अपेक्षा वर्तमान को देखें तो लगेगा कि क्वारंटीन होने के कारण अपनी समस्याओं के बारे में अपने प्रियजनों से बात करना आसान होगा, लेकिन वास्तविकता कुछ अलग है.

मुंबई में फैशन डिजाइनिंग की फाइनल ईयर की छात्रा 23 वर्षीया तनीषा भट्टाचार्य कहती हैं- मेरा रोना या चिल्लाना हमेशा मेरा मूडी और अपरिपक्व होने का सबूत रहा है और हां बच्चा होने का भी. मेरा परिवार इसका आदी नहीं है. वे इस बात को नहीं समझ सकते कि लगभग 6 वर्षों से चिंता (एंग्जाइटी) से पीड़ित व्यक्ति के लिए यह कितना मुश्किल होता है. निराशा, क्रोध, चिंता आज महामारी का रूप धारण कर चुके हैं. जब बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर उनके माता-पिता और रिश्तेदारों का रवैया लापरवाह होता है तो यह बहुत नुकसादेह होता है. जब माता-पिता मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को गुजरता हुआ चरण कहते हैं तो बच्चे अक्सर स्थिति को कमतर आकंते हुए सोचते हैं- मैं ठीक हूं. यह न केवल युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करने से रोकता है, बल्कि बात करने की किसी उम्मीद को भी खत्म कर देता है.

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बंगलुरु की युवा उद्यमी 24 वर्षीया शिरीन (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि जैसा कि हर भारतीय घर वाले माहौल में होता है, स्थिति उससे अलग आज भी नहीं है. वह कहती हैं- मेरे माता-पिता हर रोज की चिंता और अवसाद को उदासी मानते हैं, जिसे पार्क में टहलने या घर से बाहर निकलने के साथ हल किया जा सकता है. जब मैं मुंबई में रहकर कमाने के लिए संघर्ष कर रही थी, तब मेरे पास अपनी समस्याओं के महत्व को समझाने की भावनात्मक क्षमता नहीं थी और यही वजह है कि मुझे पेशेवर मदद मांगनी पड़ी. मेरे लिए यह आसान था कि मैं अपनी देखभाल खुद करूं. हालांकि, लंबे समय के बाद मैंने अपनी मां से थेरेपी लेने के बारे में खुल कर बात की, लेकिन बात बहुत अच्छी तरह से नहीं हुई.
हमारे माता-पिता की परेशानी का कारण बनने का विचार अक्सर अपराध-बोध की एक मजबूत भावना पैदा करती है, जो आगे चलकर युवाओं और बच्चों को मानसिक बीमारी से पैदा हुए अंतर को दूर करने से रोकता है. 26 साल की अनीशा, जो एक शिक्षक हैं और कोलकाता से बाहर रहती हैं, वह 15 साल की उम्र में अपना पहला नर्वस ब्रेकडाउन होने की उथल-पुथल के बारे में बताती हैं. वह बताती हैं- तब भी अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए मैं अपने माता-पिता से इस बारे में खुलकर चर्चा नहीं कर सकती थी कि मुझे क्या परेशानी है. मुझे लगा कि मैंने उन्हें परेशान किया है और यह मेरा पहला अपराध बोध था. शुरुआती समय से मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता की कमी ने सहानुभूति को नजरअंदाज किया.

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इस भावनात्मक बीमारी के प्रति देखभाल को उतना ही बढ़ाया जाना चाहिए जितना कि हमारी शारीरिक बीमारी के प्रति है. अक्सर माता-पिता चिंता को एक सामने आए सवाल की तरह लेने की कोशिश करते हैं- आपके साथ क्या गलत हुआ है? जो उत्तर देने के लिए सबसे कठिन हिस्सा बन जाता है. कोलकाता से बाहर जाने वाली परामर्शदाता मनोवैज्ञानिक डॉ. अनुपमा बनर्जी बताती हैं कि हमारे माता-पिता के लिए बोलना अधिक कठिन होता है, क्योंकि वे अक्सर समस्या को बहुत संवेदनशील दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करते हैं, न कि संवेदनशील स्थिति से. वह कहती हैं- अगर वे रो रहे हैं या अच्छे मूड में नहीं हैं तो माता-पिता को बच्चों के संकेतों के प्रति बहुत संवेदनशील होना चाहिए. हो सकता है कि बच्चा एक गैर-निर्णय, तटस्थ और जगह की तलाश में है जहां वह बात कर सके.
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