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सुनो, फोन रखो, वॉट्सऐप कॉल करो…

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व्‍हॉट्सएप कॉल का बढ़ता चलन

व्‍हॉट्सएप कॉल का बढ़ता चलन

क्या आपने भी नोटिस किया है कि अब आपके फोन पर ज्यादातर वॉट्सऐप कॉल आती हैं. खासतौर पर तब जब बात थोड़ी संवेदनशील हो.

कुछ दिन पहले की बात है. एक दोस्त से फोन पर बात हो रही थी. बात करते हुए अचानक उसने फोन काट दिया और वॉट्सऐप कॉल करने को कहा. दोस्ती पुरानी और भरोसे वाली थी. इसलिए मुझे थोड़ा अजीब लगा. और ये समझने में वक्त कि उस दिन आखिर हुआ क्या था क्योंकि नेटवर्क में तो कोई दिक्कत नहीं थी.

क्या आपने भी नोटिस किया है कि अब आपके फोन पर ज्यादातर वॉट्सऐप कॉल आती हैं. खासतौर पर तब जब बात थोड़ी संवेदनशील हो.

कुछ चीजें धीरे-धीरे अपना अर्थ खोलती हैं. आपने कभी सोचा है कि अचानक हमारी जिंदगियों में वॉट्सऐप कॉल की इतनी बहार क्यों आ गई है? वॉट्सऐप कॉल का यूं सामान्य फोन कॉल की जगह ले लेना सिर्फ खराब नेटवर्क की भरपाई के लिए नहीं है. ये उससे कहीं गहरी बात है. लोग डर रहे हैं एक-दूसरे से बात करने में. उन्हें डर है कि उनका फोन रिकॉर्ड किया जा सकता है. वो जिससे फोन पर जिंदगी, दुख, दफ्तर की गॉसिप, कहानी, गप्प, परनिंदा जो कुछ भी बांट रहे हैं, उस पर भरोसा नहीं कर रहे. एक ओर वो दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहे और दूसरी ओर किसी दूसरे का भरोसा तोड़ भी रहे हैं. एक ही वक्त में ये दोनों चीजें हो रही हैं. कभी किसी का फोन कॉल, कभी किसी की चैट का स्क्रीनशॉट, कभी कोई वीडियो, कुछ भी पब्लिक हो जा रहा था. बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी बात. हर बात, जो किसी और के लिए इन्फॉर्मेशन हो सकती है.

नेटफ्लिक्स पर एक सीरीज है “डार्क नेट.” वो कहती है कि दुनिया में जितनी इन्फॉर्मेशन है, उस सबकी किसी-न-किसी के लिए कोई कीमत जरूर है. सीरीज का पहला ही एपीसोड एक लड़की की कहानी है, जिसकी इंटीमेट तस्वीरें ब्रेकअप के बाद उसके बॉययफ्रेंड ने इंटरनेट पर डाल दीं और वो डार्क नेट की अंधेरी दुनिया में वायरल हो गई हैं. लड़की को उसे वहां से मिटाने के लिए हैकर्स हायर करने पड़ते हैं. हैकर्स पैसे लेकर इंटरनेट पर पड़ी उससे जुड़ी हर इन्फॉर्मेशन मिटा देते हैं.

हम दिन भर अपने परिचितों, मित्रों, सहकर्मियों, पड़ोसियों से जो भी साझा कर रहे हैं, वो सब एक किस्म की इन्फॉर्मेशन है. और हर इन्फॉर्मेशन की दुनिया में कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी के लिए कोई कीमत है. और कुछ नहीं तो किसी को उससे खुशी, ईर्ष्‍या, जलन, बदला, गुस्सा, संतोष, डाह कुछ भी हो सकता है. कौन-सी इन्फॉर्मेशन किसके हित और अहित से कहां जुड़ी है, कहना मुश्किल है. हर बात के अर्थ उससे कहीं ज्यादा बड़े और गहरे हैं, जितने दिखाई दे रहे हैं. लेकिन यहां ये सवाल उतना मौजूं नहीं कि आपके सुख-दुख से जुड़ी किसी भी इन्फॉर्मेशन की किसी और के लिए क्या कीमत हो सकती है.



सवाल ये है कि ये सब साझा किए जाने के लिए भरोसे वाली जगह कहां है? हमारी भरोसे वाली जगहें कब और कैसे शक के घेरे में आ गईं? विश्वास की जगह डर ने कैसे ले ली?

और सवाल ये है कि ये भरोसा क्‍या है?
ये सीक्रेट क्‍या है?

18वीं सदी की शुरुआत में फ्रांस के एक स्कल्पचर आर्टिस्ट फ्रांसुआज जेफरी ने एक मूर्ति बनाई थी, जिसका नाम था- “फर्स्‍ट सीक्रेट कॉन्फिडेंस टू वीनस.” उस स्कल्पचर में दो स्त्रियां हैं. एक स्त्री दूसरे के कान में चुपके से कुछ कह रही है. दोनों की आंखों और चेहरे के भाव कुछ ऐसे हैं, जैसे वो कोई राज़ बांट रही हों.

ढाई सौ साल पहले भी लोग एक-दूसरे के कान में चुपके से अपने राज़ बांटते थे इस उम्मीद में कि जिस पर भरोसा किया है, वो उस भरोसे को सहेजकर रखेगा. फ्रांस के लूव्र में रखी उस मूर्ति में दोनों स्त्रियों के बीच का वो सीक्रेट अब तक सीक्रेट ही है. भरोसा टूटा नहीं.

बहुत साल मुंबई के मैक्समूलर भवन में एक जर्मन फिल्म देखी थी. नाम याद नहीं. उस फिल्म में एक यहूदी कैदी है, जिसके पास उसके एक रसूख वाले दोस्‍त के बारे में कोई ऐसी जानकारी है, जो नाजियों के काम आ सकती है. जानकारी के बदले वो उसे कॉन्‍संट्रेशन कैंप से आजाद करने का ऑफर देते हैं. नाजियों की बात न मानने का मतलब है मौत और बता देने का मतलब है, दोस्त से धोखा. वो मरना चुनता है, दोस्त का राज़ उगलना नहीं.

फ्रेंच आर्टिस्‍ट फ्रांसुआज जेफरी की कलाकृति- “फर्स्‍ट सीक्रेट कॉन्फिडेंस टू वीनस
फ्रेंच आर्टिस्‍ट फ्रांसुआज जेफरी की कलाकृति- “फर्स्‍ट सीक्रेट कॉन्फिडेंस टू वीनस


कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जो ठीक-ठीक सीक्रेट भी नहीं होतीं. लेकिन फिर भी हम भरोसे के एक महीन तार पर चलकर किसी दूसरे तक जाते हैं और उससे वो बात कह देते हैं. ये भरोसे के उसी महीन तार की एक सच्ची कहानी है. एक लड़की पर एक बार उसके पति ने हाथ उठाया. चोट चेहरे से ज्यादा गहरी दिल पर लगी. उसकी छवि एक स्वतंत्र स्त्री की थी. उसने अपना दिल हल्का करने के लिए ये बात अपनी एक दोस्त को बता दी, जिसके लिए उसे लगता था कि दोनों के बीच भरोसे का एक महीन तार है. लेकिन कई साल बाद उसका दिल ये जानकर टूट गया कि उसका ये बहुत निजी दुख फेमिनिस्ट नरेटिव के नाम पर अन्य कई स्त्रियों के साथ साझा किया जा चुका था. भरोसे की वो नाजुक डोर फिर ऐसी टूटी कि कभी नहीं जुड़ी.

एक बार एक लड़के ने किसी और लड़की की कुछ बेहद निजी किस्म की कहानी सुनाते हुए मुझे उसका नाम बताना चाहा. मैंने कहा, “मेरी दिलचस्पी सिर्फ कहानी में है. ये कहानी संसार की 2 अरब स्त्रियों में से किसी की भी हो सकती है.” उस क्षण मुझे सबसे ज्यादा अचंभा उस पुरुष की नैतिकता पर हुआ. वो जो तुम तक आई थी अपना इतना निजी अंतरंग साझा करने, वो भी तो भरोसे की उस महीन डोर पर चलकर आई होगी. क्या उसे पता है कि वो डोर इतनी नाजुक है कि जरा सी फूंक से टूट जाए. क्या उसे पता है कि तुम्हारे हाथों में उसका सीक्रेट अब कोई सीक्रेट नहीं रहा. तुम आधे जमाने में गा सकते हो. क्या तुम्हारे लिए भरोसा कोई मूल्य है? क्या तुम लोगों पर भरोसा करते और उन्हें भरोसा देते हो?

इन सारी कहानियों में कौन सी बात सीक्रेट है और कौन सी नहीं? कौन सी वलनरेबल है, कौन सी महत्वपूर्ण, कौन सी मामूली और कौन सी नाजुक?

क्या असल जिंदगी की सारी कहानियां लूव्र की उस मूर्ति और उस जर्मन फिल्म की कहानी जितनी सुंदर और आसान होती हैं?

हमारे लिए सीक्रेसी और भरोसे के मायने क्या हैं?
हम अपने और दूसरों के लिए इसे कैसे देखते हैं?



ये हमारी ही आंखों के सामने देखते-देखते हो गया सबसे करीबी दोस्‍त भी अपना फोन रिकॉर्ड होने के डर से वहॉट्सएप पर फोन करने लगा. इस तरह हमारी जिंदगियों में ये हुआ कि लोगों ने बात करना तो नहीं छोड़ा, लेकिन भरोसा करना छोड़ दिया. इसलिए या तो वो संभलकर बात करने लगे या ऐसे तरीकों से, जिससे किसी को मौका ही न मिले कि वो आपकी इन्फॉर्मेशन को सुरक्षित कर ले और फिर बाद में उसका इस्तेमाल करे.

संसार में कोई ऐसा युग, कोई ऐसा दौर नहीं रहा, जब सारे इंसानों के बीच भरोसे का ही रिश्ता रहा हो. छल, धोखेबाजियां, दुरभिसंधियां, झूठ सबकुछ अनादिकाल से होता रहा है. जूलियस सीजर में भी आखिर ब्रूटस अपने सबसे गहरे दोस्त का भरोसा तोड़ देता है. इतिहास में भरोसे के टूटने की कहानियां भरोसे वाली कहानियों से कुछ कम नहीं.

लेकिन ये जो अविश्वास है, ये जो डर, ये वो वाला अविश्वास नहीं है. एक ऐसे समय में, जब आपकी जिंदगी हर वक्त किसी सर्विलांस पर है. आप हर वक्त, हर जगह सीसीटीवी की निगरानी में हैं. आपके स्मार्ट फोन का एआई चौबीसों घंटे आप पर नजर रखे हुए है, इंटरनेट आपकी बातें सुन रहा है, यू-ट्यूब ने आपके पसंद का पैटर्न नोट कर लिया है, गूगल को आपके एक-एक पल के मूवमेंट की खबर है, सरकार के पास आपके खर्च किए एक-एक पैसे का हिसाब है, ऑनलाइन डेटिंग साइट के पास लाखों पन्नों में आपके मन और शरीर की फंतासियों का पूरा ब्यौरा है तो इस चौकीदारी के सामने आप जिस तरह निःशस्त्र, कमजोर और वलनरेबल होते हैं, ये उस तरह की बात नहीं कि जिस तरह ब्रूटस ने जूलियस का भरोसा तोड़ दिया था.

जो फितरतन चोर नहीं भी था, तिजोरी खुली देख उसका भी ईमान बिगड़ गया.

सिस्टम ने जिंदगी को रिकॉर्ड करने की जिस तरह सुविधा दे दी, जाहिरन कोई तो कहीं तो होगा, जो सबकुछ को रिकॉर्ड कर रहा होगा. स्नोडेन फिल्म देखने के बाद ऐसा नहीं लगा था कि इस लैपटॉप के कैमरे के उस पार कहीं कोई बैठा आपको देख रहा है. कोई सीक्रेट कैमरा आप पर नजर रखे है, ये ख्याल वैसा ही है, जैसे कोई पब्लिक में आपके कपड़े उतार रहा हो. ये डर की, अविश्वास की, भरोसे के खत्म होने की शुरुआत है. भरोसा तोड़ने की इंसानी फितरत को मशीन और मजबूती और मुस्तैदी से अंजाम दे रही है.



एक ऐसा समाज, जहां लोग एक-दूसरे को हमेशा शक की निगाह से देखें, न भरोसा पा सकें, न दे सकें, वो समाज कैसा होगा. जरनल ऑफ न्यूरोसाइंस में दो साल पहले एक स्टडी छपी थी. न्यूरोसाइंस की जटिल भाषा को आसान शब्दों में कहूं तो हमारी बॉडी के हर अंग की फंक्शनिंग एक-दूसरे के साथ एक भरोसे के रिश्‍ते से चलती है. एक पत्थर आपकी तरफ आए तो हाथ अपने आप आगे बढ़कर उसे रोक लेता है. ये पूरा न्यूरोसिस्टम एक ट्रस्ट या विश्वास के तार से जुड़ा हुआ है. कोई एक मामूली सी नर्व भी उस भरोसे को तोड़ दे तो शरीर की मशीन रुक सकती है. ये स्टडी बताती है कि भरोसा हमारे इमोशनल वेल बीइंग यानी भावनात्मक स्वास्थ्य के ईंधन की तरह है. किसी भरोसे के टूटने से जो सदमा लगता है, उससे शरीर की आंतरिक व्यवस्था का भरोसा भी टूट सकता है. सेल्स डैमेज हो सकती हैं और मृत्यु तक हो सकती है. हार्वर्ड तो 80 साल तक इसी पर रिसर्च करता रहा कि जिंदगी में खुशी की सबसे बड़ी वजह क्या है और 80 साल की स्‍टडी को सिर्फ दो शब्‍दों में कहा- “प्यार और भरोसा.”

इसलिए जीवन में हमारी भरोसे वाली जगहों का कम होते जाना कोई जरा सी बात नहीं है. भरोना न देना, न पाना भी जरा सी बात नहीं है. एक भरोसे वाले दोस्त का अचानक वॉट्सऐप कॉल करना जरा सी बात नहीं है. ये मेरे और उसके थोड़ा कम मनुष्य हो जाने की बात है. एक समाज के रूप में हमारे कम मनुष्य होने की बात है. ये हमारे और अकेले होने की आहट है. किसी का भरोसा पाने में बरसों लगते हैं और तोड़ने में बस कुछ सेकेंड.
क्या आप पर भरोसा किया जा सकता है?

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