आदमी के सामने औरत के मुंह पर ताला बंद

हिंदी में भी ऑनलाइन मीडिया के सामने ये एक बड़ी चुनौती है कि उनकी साइट पर ये जो 75 फीसदी मर्द और सिर्फ 25 फीसदी औरतें हैं, वो इस अनुपात को कैसे ठीक करें.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: May 20, 2019, 10:57 AM IST
आदमी के सामने औरत के मुंह पर ताला बंद
सोशल मीडिया में औरतों की आवाज
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: May 20, 2019, 10:57 AM IST
औरतें बोलती क्‍यों नहीं? औरतें कब बोलती हैं? औरतें कहां बोलती हैं?

एक टर्किश फिल्म है ‘हेड ऑन.’ एक बला के खूबसूरत और अक्‍लमंद डायरेक्‍टर फतिह अकिन की. बेहद पारंपरिक रूढ़िवादी यहूदी परिवार की एक लड़की की कहानी. उस परिवार में औरतें ज्यादा बोलती नहीं. न मां बोलती थी और न बेटी को बोलने की इजाजत है. एक दिन घर में कोई सेलिब्रेशन है. पूरा परिवार इकट्ठा हुआ है. मर्द अलग कमरे में बैठे हैं और औरतें अलग. मर्द शराब पी रहे हैं और बातें कर रहे हैं कि अपनी बीवियों के अलावा वो और कितनी औरतों के साथ सोए हैं. ऐसी हर उपलब्धि पर एक जोरदार ठहाका लगता है. दूसरे कमरे में पर्दे में मुंह ढांककर रहने वाली औरतें बैठी हैं और ऐसे बैठी हैं कि यकीन ही न हो कि ये वही गाय हैं, जिनके मुंह में अभी थोड़ी देर पहले तक जबान भी नहीं थी. सिर्फ औरतों को पाकर सारी औरतें बेलगाम आशिक हो गई हैं. सब एक दूसरे को बता रही हैं कि प्यार-सेक्स में उन्हें क्या पसंद है. किसका पति कैसा है, किसका पति कैसे करता है. हालांकि जो भी करता है, बस पति ही करता है. दूसरे मर्दों का वहां कोई जिक्र नहीं. लेकिन ये बोल-बोलकर वो खुश इतनी हैं कि बयान के परे. वहां वो अपना दुख-सुख सब बोल रही हैं.



1972 में एक जर्मन पत्रकार एलिस श्वाइत्जर ने सिमोन न बोवुआर और ज्यां पाल सार्त्र का साथ में एक इंटरव्यू लिया था. यूं तो फ्रेंच पॉलिटिक्स से लेकर लिटरेचर, अस्तित्ववाद और फिलॉसफी तक पर दोनों के विचारों में कोई मतभेद नहीं था, लेकिन एक सवाल पर दोनों भिड़ गए. शालीनता से ही भिड़े थे, लेकिन उस इंटरव्यू को पढ़ते हुए इस सवाल पर दोनों के मतभेद में एक किस्म की तल्खी भी महसूस हुई. सवाल फ्रांस के फेमिनिस्ट आंदोलन से जुड़ा था. सार्त्र का कहना था कि बाकी सब तो ठीक है, मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि ये औरतों की अलग से बैठक करने की क्या जरूरत है. उसमें मर्द भी शामिल क्यों नहीं हो सकते. सिमोन का जवाब था कि मर्दों की मौजूदगी में बहुत सारी औरतें सहज नहीं हो पाएंगी और खुलकर अपनी बात नहीं रख पाएंगी. दोनों इस बात पर तकरीबन लड़ने ही लगे. सिमोन बोली, “मुझे पता है, तुम इस लड़ाई में हमारे साथ हो. लेकिन फिर भी औरत होने की ऐसी बहुत सी तकलीफें हैं, जो तुम समझ नहीं सकते.” ये बात सार्त्र को बुरी लग गई. उसके बाद के दो लंबे पैरा में सार्त्र इस बात की सफाई पेश कर रहे हैं, “ये बात बिलकुल बेबुनियाद है. ये ठीक है कि मर्द होने के नाते मैं उन तकलीफों को झेल नहीं रहा हूं. लेकिन जब मेरी कोई महिला साथी मुझसे ऐसे अनुभव साझा करती है तो मैं वो महसूस कर पाता हूं. मुझे बुरा लगता है.”

खैर, ये बहस शायद लंबी चली होगी, लेकिन किताब में तीन पन्नों में खत्म हो गई. एलिस श्वाइत्जर की वो किताब “सिमोन द बोवुआर टुडे, कन्वर्सेशंस 1972-1982” के नाम से द हॉगर्थ प्रेस, लंदन से छपी है.



फेसबुक पर महिलाओं का एक क्लोज्ड ग्रुप है, जहां औरतें अपने विचार, सुख, दुख, प्यार, खुशी सब साझा किया करती हैं. कल जब मैंने वहां ये लेख “कपड़े उतारे मर्द, शर्मिंदा हों औरतें,” शेयर किया तो एक लड़की ने कमेंट किया कि काश मैं ये अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर कर पाती. देर रात तक इनबॉक्‍स में कई लड़कियों के मैसेज आए कि उनके साथ भी कई बार ऐसी घटनाएं हुई हैं कि कोई मर्द बीच रास्ते अपने पैंट की जिप खोलकर खड़ा हो गया. ये बातें और ऐसी तमाम बेहद निजी किस्म की बातें लड़कियां अक्सर इनबॉक्‍स में आकर कहती हैं. वॉल पर कमेंट करके नहीं कहतीं. बहुत पहले एक बार मर्दों की हिंसा पर लिखा कुछ पढ़कर एक लड़की ने कहा था, “इसमें मुझे अपना पति दिखता है, लेकिन मैं उसे ये पढ़ा नहीं सकती.” वो कई बार कहती हैं कि ये कहानी वो शेयर करना चाहती हैं. चाहती हैं कि उनकी जिंदगी से जुड़े मर्द, उनके पिता, पति, भाई उसे पढ़ें, लेकिन उन्हें डर लगता है. डर लगता है कि उन्हें जज किया जाएगा. डर लगता है कि अपनी वॉल पर ऐसी चीजें शेयर करने पर फेसबुक फ्रेंडलिस्ट में जुड़े पुरुष उन्हें जज करेंगे. उनके बारे में राय बनाएंगे. अच्छा, तो तुम भी ऐसी स्लट टाइप की लड़की हो.

वो सार्वजनिक रूप से अपनी कहानी तो कभी नहीं कहतीं, ऐसी दूसरी कहानियों से भी सबके सामने एक दूरी बनाकर रखती हैं. शायद इसलिए सिमोन ने कहा था कि हम औरतें अलग से बात करेंगी. आपस में, अकेले और तुम मर्दों का वहां दखल नहीं होगा.
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हिंदी में इस वक्त 40 से ज्यादा वेब पोर्टल हैं. सबके फेसबुक पेज भी हैं. आप एक स्टडी करके देखिए. उनके सोशल मीडिया कंटेंट पर कितनी लड़कियां, औरतें आकर बात कर रही हैं. कितनी उस पर कमेंट कर रही हैं. पॉलिटिकल खबरों पर नहीं, बल्कि उन खबरों पर जो सीधे उनकी जिंदगी से जुड़ी हैं, जिनका सीधा सरोकार उनके सवालों से है. वो वहां आ रही हैं, लिंक पर क्लिक कर रही हैं, इंगेज कर रही हैं, आर्टिकल पढ़ रही हैं. बहुत हुआ तो लाइक करके चली जा रही हैं. वो उस पर अपने विचार नहीं व्यक्त करतीं. और गलती से भी अगर कोई लड़की बोल दे तो वहीं सोशल मीडिया के चौराहे पर जो उसकी स्लट शेमिंग होती है, जो चरित्र की बखिया उधेड़ी जाती है कि हमें यहां से बैठकर कमेंट डिलिट करने पड़ते हैं.
मेरी फेसबुक वॉल भी सबके कमेंट करने के लिए खुली नहीं है. पोस्ट पब्लिक होती है, लेकिन कमेंट सिर्फ वही कर सकते हैं, जो फ्रेंडलिस्ट में हैं. एक जमाने में हर दूसरा आदमी मुंह उठाकर कहने चला आता था कि तुम्हारा तो रेप होना चाहिए. कमेंट में उसके लिए दरवाजा बंद हुआ तो इनबॉक्स में आकर रेप करने और एसिड फेंकने की धमकी देने लगे. ये धमकियां चाहे जितनी हवाई हों, सच तो ये है कि हमें डर लगता है. हमें इस तरह की हर धमकी, हर गाली से डर लगता है.



अभी कुछ दिन पहले अनुपमा चोपड़ा के साथ एक इंटरव्यू में वरुण ग्रोवर ने कहा कि लड़कियां पॉलिटिकल मुद्दों पर कॉमेडी नहीं करतीं क्योंकि पब्लिक प्लेटफॉर्म पर उन्हें मिलने वाली धमकियां हमारी धमकियों से कहीं ज्यादा डरावनी हैं. हमें तो वो सिर्फ गाली देते हैं, लेकिन लड़कियों को तो सीधे रेप की धमकी. जाहिर है, वो पब्लिक स्पेस विरोध की हर आवाज के लिए खतरनाक है, लेकिन लड़कियों के लिए कहीं ज्यादा खतरनाक है.

और इस डर से औरतें बोलती नहीं.

औरतें बोलती नहीं क्योंकि वो मर्दों की नंगई से डरती हैं. वो सिर्फ इंटरनेट से नहीं डरतीं, वो हर उस स्पेस से डरती हैं, जहां मर्दों की मौजूदगी है. वो अकेले अंधेरे कमरे से डरती हैं, सूनसान सड़क से डरती हैं, घर में बाप से डरती हैं, दफ्तर में मर्द सहकर्मियों से डरती हैं. उनकी जिंदगी में जहां भी मर्द की मौजूदगी है, वो हर उस मौजूदगी से अधिकांश समय खौफजदा ही रहती हैं.

वो इतना डरती हैं कि जब औरतों ने शुरू-शुरू में लिखना शुरू किया था तो अपने नाम से लिखने से भी डरती थीं. अपनी कहानी सुनाने से डरतीं और इस बात से कि औरत के नाम से छपा तो उस लिखे को कोई गंभीरता से नहीं लेगा. 18वीं सदी के फ्रांस में एक औरत थी कोलेत, वो अपने पति के नाम से लिखा करती थी. और उसे लिखे की बदौलत पति का लेखन की दुनिया में बड़ा नाम था. जॉर्ज इलियट का नाम किसने नहीं सुना. 30 साल की उम्र तक मुझे लगता था कि 18वीं सदी का ये महान लेखक एक आदमी है. आपको शायद अभी भी यही लगता हो. लेकिन जॉर्ज इलियट दरअसल मैरी एन इवान थी, एक औरत, जो आदमी के नाम से लिखती थी. उनका उपन्यास ‘मिडिलमार्च’ सदी की महान किताबों में शुमार है.

महान लेखक जॉर्ज इलियट असल में औरत थी - मैरी एन इवान
महान लेखक जॉर्ज इलियट असल में औरत थी - मैरी एन इवान


मैरी ने अपने एक संस्मरण में लिखा है, “मैंने पुरुष के नाम से इसलिए लिखा क्योंकि मैं चाहती थी कि मेरे लिखे को गंभीरता से लिया जाए. 18वीं सदी के विक्टोरियन समाज में माना जाता था कि औरतों की बुद्धि उनके घुटने में होती है. उस समय लेखन काफी सम्मान और रुतबे वाला पेशा माना जाता था. लेखकों-कवियों को समाज में ऊंचा ओहदा हासिल था. इतना ऊंचा कि उस ऊंचाई पर औरतें अपना दावा नहीं कर सकती थीं.”

18वीं सदी में ही अमेरिका में एक लड़की थी लुइसा मे एल्कॉट, जो ए.एम. बर्नार्ड के नाम से लिखा करती थी. वो फेमस नॉवेल, ‘लिटिल गर्ल,’ जिस पर इस साल मैरिल स्‍ट्रीप की फिल्‍म आ रही है, एल्‍कॉट का ही है. इस साल ऑस्‍कर की दौड़ में एक फिल्म थी, ‘द वाइफ,’ जिसे ऑस्‍कर मिला नहीं, लेकिन वो भी एक ऐसे सुपर फेमस मेल राइटर की कहानी है, जिसकी किताबें दरअसल उसकी पत्नी ने लिखी थीं.
एलिस श्वाइत्जर वाली किताब में इस बात का भी जिक्र है कि कैसे फ्रांस के बुद्धिजीवी मर्दों को न सिर्फ लगता था, बल्कि वो काफी दावे के साथ अपनी महफिलों में ये बात कहा भी करते थे कि सिमोन द बोवुआर की किताबें दरअसल ज्यां पाल सार्त्र ने ही लिखी हैं.

लब्बोलुआब ये कि जब इंटरनेट नहीं था, तब भी औरतें पब्लिक स्‍पेस में या तो लिखती नहीं थीं, या मर्द के नाम से लिखती थीं या मर्द कहते थे कि उसका लिखा भी असल में किसी मर्द का लिखा है.

बाहर की जिस दुनिया में सदियों से सिर्फ पुरुषों का दबदबा रहा है, उस स्पेस में किसी भी रूप में घुसने से औरतें हमेशा से डरती रही हैं. आज भी डरती हैं. कभी ये डर कि उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाएगा तो कभी ये कि उनके चरित्र पर उंगलियां उठेंगी.



भारत में इस वक्‍त इंटरनेट यूजर्स का जेंडर अनुपात 28:72 का है यानी 72 फीसदी मर्द और सिर्फ 28 फीसदी औरतें. फेसबुक का आंकड़ा भी तकरीबन इसी के करीब है. लेकिन वो 28 फीसदी लड़कियां भी पब्लिक डिबेट में हिस्‍सेदारी नहीं कर रही हैं. पिछले साल ‘द गार्जियन’ ने इस पर एक स्‍टोरी की थी कि ऑनलाइन स्‍पेस में औरतों की आवाज इतनी कम क्‍यों है. वो उन आर्टिकल्‍स पर भी अपनी बात क्‍यों नहीं रखतीं, जो सीधे उनकी जिंदगी से जुड़े हैं. हिंदी में भी ऑनलाइन मीडिया के सामने ये एक बड़ी चुनौती है कि उनकी साइट पर ये जो 75 फीसदी मर्द और सिर्फ 25 फीसदी औरतें हैं, वो इस अनुपात को कैसे ठीक करें. कैसे विमेन यूजर्स की संख्‍या बढ़ाई जाए और कैसे उनके साथ एक संवाद कायम हो. कैसे वो पब्लिक डिबेट में हिस्‍सेदारी करें. और कैसे इस गोबरपट्टी के मर्दों को ये समझ आए कि पब्लिक स्‍पेस में बात करने का एक सलीका होता है. आप किसी औरत को इसलिए छिनाल, रंडी बुलाने लगें, रेप की धमकी देने लगें, उसके शरीर, उसकी निजता पर हमला करने लगें क्‍योंकि उसकी बात से आप सहमत नहीं, ये कहां की महान भारतीय सभ्‍यता है. आप कौन हैं, जो इंटरनेट के अंधेरे में अपना नाम और पहचान छिपाकर अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन कर रहे हैं. मर्द नंगई पर उतर आते हैं और औरतें डरकर चुप हो जाती हैं.

पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया पर बहुत सी लड़कियों-औरतों से खुलकर लिखना शुरू किया है. लेकिन वो भी ज्‍यादातर उनकी अपनी वॉल पर है, जिसे वो काफी हद तक रेगुलेट कर सकती हैं. अश्‍लील कमेंट डिलिट कर सकती हैं, रेप की धमकी देने वालों को ब्‍लॉक कर सकती हैं. लेकिन किसी दूसरे प्‍लेटफॉर्म पर कोई उन्‍हें गाली दे तो सार्वजनिक शर्मिंदगी के अलावा उन्‍हें क्‍या हासिल होगा.

और अंत में भी सच तो यही है कि आज भी न लिखने, न बोलने और इनबॉक्‍स में आकर धीरे से अपनी कहानी साझा करने वाली लड़कियों की संख्‍या बोलने वाली लड़कियों के मुकाबले कहीं ज्‍यादा है. सोशल मीडिया पर औरतें वॉल पर नहीं बोलतीं. वो एक ऐसी जगह तलाशती हैं, जहां कोई मर्द न हो, कोई उनकी बात सुन न रहा हो, जहां उन्‍हें डर न लगे और फिर धीरे से, भरोसे से, प्‍यार से इनबॉक्‍स में बोलती हैं, “ये तो मेरी भी कहानी है. बस मैंने सुनाई नहीं कभी.”

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