'घुमक्कड़ हूं और अपना दफ़्तर साथ लिए चलती हूं'

मैं वहां घूमने नहीं, रहने के लिए गई थी. सुंदर-सुंदर जगहों पर तस्वीरें खिंचवाना या अच्छी जगहों पर खाना खाना मेरा मकसद नहीं था. मैं पहाड़ी लोगों का हिस्सा होना चाहती थी. शुरुआत मैंने खाना पकाने से की.

News18Hindi
Updated: March 5, 2018, 1:34 PM IST
'घुमक्कड़ हूं और अपना दफ़्तर साथ लिए चलती हूं'
शिप्रा ने हिमाचल के गांव में अकेले 4 महीने बिताए
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Updated: March 5, 2018, 1:34 PM IST
जोश-जोश में पहाड़ी से उतरते हुए मैं काफी नीचे आ चुकी थी. ढलान पर साइकिल चलाना आसान था इसलिए पता भी नहीं चला कि मैंने कितनी दूरी पार कर ली है. शाम ढलने लगी तब याद आया कि मुझे अपने ठौर लौटना है. ताकत चुक गई थी. साइकिल चलाकर ऊपर जाना तो दूर, मैं चल भी नहीं पा रही थी. प्यास से गला चटक रहा था, तभी एक बूढ़े अंकल ने आवाज़ लगाई. वो मुझे चाय पर बुला रहे थे. अनजान चेहरा, शाम का वक्त, उसपर मैं अकेली और पस्त थी. मैंने खुद को 5 सेकंड दिए- खतरा तौलने के लिए और खुद को उनके साथ चाय पीता पाया. यात्रा ने मुझे यकीन करना सिखाया.

हम घूमने के लिए नौकरी से छुट्टी का इंतजार करते हैं, वहीं शिप्रा शेखर डिजिटल नोमैड हैं. पेशे से इंजीनियर शिप्रा ने work from home वाली नौकरी चुनी ताकि हर दिन उनकी आंखें किसी नई जगह पर खुलें. 27 बरस की उम्र में कई देशों की अकेले सैर कर चुकी शिप्रा ने 4 महीने हिमाचल के रक्कड़ गांव में बिताए. पढ़ें, hindi.news18.com से उनकी बातचीत.



जब भी मैं लोगों से अपने घुमक्कड़ी का शौक बांटती हूं तो उन्हें लगता है कि मेरे पास बहुत से पैसे होंगे या फिर वैसी ही नौकरी होगी. कोई ये नहीं सोचता कि मैंने घर का आराम छोड़कर अनिश्चितता की जिंदगी चुनी. साल का एकाध सप्ताह पूरी प्लानिंग के साथ किसी होटल में नहीं बिताया, किसी महंगे रेस्तरां में खाना नहीं खाया, अकेले घूमी, अपना खाना खुद पकाया, अपने कपड़े-बर्तन खुद धोए. उनकी तरह सोई, उनकी तरह जागी.

घूमने का शौक मुझे विरासत में मिला लेकिन ये समझ में तब आया जब कॉलेज में एक ट्रैवल फैलोशिप पर मुझे दो हफ्ते के लिए देश से बाहर जाने का मौका मिला. उससे पहले मैं ऑटो में भी अकेली नहीं बैठी थी. वापस लौटने के बाद नौकरी शुरू की लेकिन साल बीतते -न बीतते मैं ऊबने लगी. तभी एक रिमोट जॉब का ऑफर आया और मैंने उसे लपक लिया. तब मैं पुणे में थी. उस नौकरी को लेने के पीछे मेरा मकसद था घूमना. मैंने सोचा कि काम के लिए दफ्तर नहीं जाना है तो क्यों न घूमते हुए काम किया जाए! मैंने हिमाचल का रक्कड़ गांव चुना.



बचपन में पापा की डायरी में हिमाचल का जिक्र था. वे चाहते थे कि वहां किसी पहाड़ी पर उनका घर हो. मैंने सोचा, कोई बात नहीं, घर तो हम बना नहीं सकते लेकिन उनकी पसंदीदा जगह घूम तो सकते हैं. मैंने वहां के लोगों से बात की. रहने का बंदोबस्त किया. इंटरनेट के इंतजाम को टटोला. यानी वहां जाने से पहले मैंने वहां रहने के सारे इंतजाम कर लिए थे. हालांकि वहां पहुंचने के बाद मेरी प्लानिंग में कई बदलाव खुद-बखुद हो गए. मैं वहां घूमने नहीं, रहने के लिए गई थी. सुंदर-सुंदर जगहों पर तस्वीरें खिंचवाना या अच्छी जगहों पर खाना खाना मेरा मकसद नहीं था. मैं पहाड़ी लोगों का हिस्सा होना चाहती थी.
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मुझे एक हिमाचली की तरह रहना था. शुरुआत मैंने खाना पकाने से की. जहां मैं रहती थी, वहां एक कम्युनिटी किचन था, जहां सब मिलकर खाना पकाते. मैंने वहां हिमाचली व्यंजन सीखे. तिब्बत के करीब होने के कारण वहां की डिशेज पर तिब्बती स्वाद झलकता है, मैंने उनसे वो सब सीखा. थोड़ा-बहुत उन्हें अपने तेल-मसालों का स्वाद चखाया.



रक्कड़ में रहते हुए शुरुआत में मुझे अपने सोने-जागने के समय के साथ काफी स्ट्रगल करना पड़ा. मैं देर रात काम करती और सुबह देर तक सोती. वहां लोग सुबह 4 बजे जाग जाते और रात के 9 बजते हुए सो जाते. पहले-पहल मेरे सोने का वक्त होता तो चारों और चहल-पहल शुरू हो जाती, मैं काम करती तो चारों और सन्नाटा छा जाता. वक्त के साथ तालमेल बिठाने में मुझे कुछ दिन लगे.

बड़े शहरों से अलग यहां किसी को कहीं जाने की जल्दी नहीं है. आप कहीं भी निकलिए, लोग मुस्कुराते हुए आपका हालचाल लेते हैं. मेरे साथ ऐसे कई वाकये घटे, जहां अनजान लोगों ने मेरी मदद की और मैंने उनकी मदद ली, जो कि दिल्ली या पुणे या बैंगलोर जैसे शहरों में मैं सोच भी नहीं सकती. ऐसे ही एक बार पहाड़ी चढ़ते हुए एक अनजान बुजुर्ग के घर मैंने चाय पी. मुझे थका हुआ देखकर उन्होंने मुझे आवाज की थी. पहले तो मैं ठिठकी लेकिन फिर खतरे टटोले. पांच सेकंड में मैंने सोचा कि ये बूढ़े हैं, मेरे पास थोड़ी ज्यादा ताकत है, इनके पास कुत्ता है, कुत्ता पालने वाले लोग अमूमन भले होते हैं और मैंने चाय का उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया. ऐसे ही कई लोग मेरे दोस्त बने, जो शायद ताउम्र दोस्त रहें.



घूमते हुए ही मैंने पाया कि ज्यादातर लोग नेक होते हैं. थोड़े से गलत लोगों के डर से हम उन भले लोगों से भी नहीं जुड़ पाते. मैंने इस डर को छोड़ा. यात्रा ने मुझे यकीन करना सिखाया. मैं कुछ बेहद नेक इंसानों से मिली जो घर के आराम के साथ कभी मुमकिन नहीं था.

कमोबेश हम सबकी जिंदगी छोटे-बड़े पछतावों में बीतती है. मैंने टारगेट पूरा नहीं किया, बच्चे को नहीं पुचकारा, फैमिली के लिए कुछ नहीं किया, मैं ये नहीं कर सका, वो नहीं हो सका. जैसे-जैसे दुनिया घूमेंगे, ये सारे पछतावे हल्के पड़ते जाएंगे.

(तस्वीरें: शिप्रा शेखर के फेसबुक पेज से साभार)

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