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Republic Day 2021: देश की आजादी के लिए इन 7 महिलाओं ने छोड़ा था घर, बनीं पूरे समाज के लिए प्रेरणा

रानी लक्ष्मीबाई
रानी लक्ष्मीबाई

Republic Day 2021: देश की आजादी में जितना योगदान पुरुषों का है महिलाओं का उससे कम योगदान नहीं है. कई महिला स्‍वतंत्रता सेनानियों (Women Freedom Fighters) ने आजादी की लड़ाई को सफल बनाने के लिए त्‍याग किए और इस लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्‍सा लिया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 25, 2021, 9:39 AM IST
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आजादी को हासिल किए लगभग सात दशक बीत गए हैं और आज भी स्‍वतंत्रता सेनानियों (Indian Freedom Fighters) के लिए हर देशवासी के दिल में सम्मान और गर्व की भावना है. हम हर साल गणतंत्र दिवस (Republic Day) और स्‍वतंत्रता दिवस (Independence Day) के अवसर पर इन सेनानियों को याद करते हैं और अपने आजाद जीवन के लिए उनका शुक्रिया अदा करते हैं. देश की आजादी में जितना योगदान पुरुषों का है महिलाओं का उससे कम योगदान नहीं है. आइए, यहां आपको उन महिला स्‍वतंत्रता सेनानियों (Women Freedom Fighters) की बात बताते हैं जिन्‍होंने आजादी की लड़ाई को सफल बनाने के लिए कई त्‍याग किए और इस लड़ाई में बढ़चढ़ कर हिस्‍सा लिया.

झांसी की रानी

झांसी की रानी के बारे में किसने नहीं सुना होगा. उनकी बहादुरी भरे कारनामों से तो अंग्रेजों के भी छक्‍के छूटते थे. झांसी की रानी ने सन 1857 के विद्रोह में प्रमुख सेनानी के रूप में हिस्‍सा लिया था. हम आज उन्हें उनकी बहादुरी के कारण ही याद करते हैं.



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बेगम हजरत महल

सन 1857 के विद्रोह में बेगम हजरत महल का नाम स्‍वर्ण अक्षरों में लिखा गया. वे पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं जिन्होंने अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ देश के गांव गांव को एक करने का जिम्‍मा उठाया था.  उन्‍होंने अंग्रेजों से आमना सामना किया और लखनऊ पर कब्ज़ा किया. उन्‍होंने ही अपने बेटे को अवध का राजा भी घोषित किया. हालांकि, बाद में अंग्रेजों ने उन्‍हें जबरन नेपाल भेज दिया.

सरोजिनी नायडू

निश्चित रूप से सरोजिनी नायडू आज की महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल हैं. जिस जमाने में महिलाओं को घर से बाहर निकलने तक की आजादी नहीं थी, सरोजिनी नायडू घर बाहर एक कर देश को आजाद करने के लक्ष्‍य के साथ दिन रात महिलाओं को जागरूक कर रही थीं.  सरोजिनी नायडू उन चुनिंदा महिलाओं में से थीं जो बाद में INC की पहली प्रेज़िडेंट बनीं और उत्तर प्रदेश की गवर्नर के पद पर भी रहीं. वह एक कवयित्री भी थीं.

सावित्रिभाई फुले

महिलाओं को शिक्षित करने के महत्‍व को उन्‍होंने जन जन में फैलाने का जिम्‍मा उठाया था. उन्‍होंने ही कहा था कि अगर आप किसी लड़के को शिक्षित करते हैं तो आप अकेले एक शख्स को शिक्षित कर रहे हैं, लेकिन अगर आप एक लड़की को शिक्षा देते हैं तो पूरे परिवार को शिक्षित कर रहे हैं। उन्‍होंने अपने समय में महिला उत्पीड़न के कई पहलू देखे थे और लड़कियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित होते देखा था. ऐसे में तमाम विरोध झेलने और अपमानित होने के बावजूद उन्‍होंने लड़कियों को मुख्‍य धारा में लाने के लिए उन्हें आधारभूत शिक्षा प्रदान करने की जिम्‍मेदारी उठाई थी.

विजयलक्ष्मी पंडित

जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी भी देश के विकास के लिए तमाम गतिविधियों में बढ़चढ़ कर हिस्‍सा लेती थीं. उन्होंने कई सालों तक देश की सेवा की और बाद में संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंब्ली की पहली महिला प्रेज़िडेंट भी बनीं. वे डिप्लोमैट, राजनेता के अलावा लेखिका भी थीं

अरुणा आसफ अली

अरुणा आसफ अली उस दौर में कांग्रेस पार्टी की सक्रिय सदस्य रहीं और देश की आजादी के लिए कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता संग्राम में हिस्‍सा लिया.  जेल होने पर उन्‍होंने तिहाड़ जेल के राजनैतिक कैदियों के अधिकारों की लड़ाई भी लड़ी. जेल में रहते हुए उन्‍होंने कैदियों के हित के लिए भूख हड़ताल किया. इसके लिए उन्हें कालकोठरी की सजा झेलनी पड़ी थी.

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भीकाजी कामा

भीकाजी कामा को भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में सबसे बहादुर महिला के रूप में भी याद किया जा सकता है. लिंग समानता के लिए भी उन्‍होंने कई राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर हिस्‍सा लिया. वे भारतीय होम रूल सोसायटी स्थापित करने वालों में से एक रहीं. उन्‍होंने कई क्रांतिकारी साहित्य लिखे. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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