क्या औरत के हक़, उसकी खुशी में रोड़ा बन रहे हैं

सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक महिला अधिकारों की मांग उठ रही है. दुनिया भर में अलग अलग पहलूओं पर महिलाएं आवाज़ उठा रही हैं, और लड़ाई जीत भी रही हैं लेकिन दूसरी और उनकी खुशी कम होती जा रही है. ऐसा एक शोध में पाया गया है. तो इस विरोधाभास के पीछे की वजह क्या है?

News18Hindi
Updated: September 7, 2018, 6:39 PM IST
क्या औरत के हक़, उसकी खुशी में रोड़ा बन रहे हैं
बीते कुछ सालों में महिला अधिकारों पर तेज़ी से आवाज़ उठाई जा रही है
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Updated: September 7, 2018, 6:39 PM IST
खेल में लड़कियों ने बाज़ी मारी, नौकरियों में लड़कियों ने बाज़ी मारी. मेरिट लिस्ट में लड़कियों ने बाज़ी मारी. हर तरफ लड़कियां आगे हैं, महिला अधिकारों की बातें हो रही हैं, बात आगे भी बढ़ रही है और अधिकार हासिल भी किए जा रहे हैं. तमाम तरह की हिंसा और भेदभाव के बावजूद महिलाएं अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं और उसे टुकड़ों-टुकडों में ही सही जीत भी रही हैं. राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक आज़ादी मिलने के साथ ही महिलाओं की खुशी में भी इज़ाफा होना चाहिए. लेकिन असल में ऐसा नहीं है. पढ़ने में थोड़ा अजीब लग सकता है क्योंकि जब अधिकार मिलने लगे तो ख़ुशी कम होने की वजह समझ नहीं आती.

2016 में अर्थशास्त्री बेटसे स्टीवनसन और जस्टिन वॉल्फर्स ने इस विरोधाभास को समझाया जिसमें औरत के अधिकार बढ़ रहे हैं और उसकी खुशी घट रही है. इन दोनों अर्थशास्त्रियों ने पाया कि 70 के दशक में अमेरिकी महिलाओं की ज़िंदगी से संतुष्टि पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा थी.( भारतीय महिलाओं की स्थिति पर थोड़ी देर बाद आते हैं). लेकिन इसके बाद महिलाओं की खुशी का स्कोर कम होता गया, वहीं पुरुष का स्थायी रहा. 90 के दशक तक महिलाएं, पुरुष से कम खुश रहने लगी. कमाल की बात यह थी कि इन 30-35 सालों में अमेरिका में महिलाओं के अधिकारों को लेकर सबसे ज्यादा कदम उठाए गए. फिर वो लिंग के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव हो या फिर महिलाओं को ज्यूरी से बाहर रखने जैसे नियम पर रोक. यहां तक की इसी दौरान मैरिटल रेप पर आवाज़ उठाई गई. इसके बावजूद जब खुश रहने की बात आई तो अमेरिकी महिलाओं का स्कोर कम नहीं, काफी कम था.

feminism, women rights
अमेरिका में 1980 से 2000 के बीच महिला अधिकारों के पक्ष में कड़े कदम उठाए गए


समझाया गया कि इसकी एक वजह उन पुरुषों का जेल में जाना हो सकता है जो महिलाओं के योग्य साथी थे. दरअसल 1980 से लेकर 2000 तक जेल में अफ्रीकी अमेरिकी पुरुषों की तादाद पांच गुना बढ़ी. आलम यह था कि अमेरिकी कॉलेज से ज्यादा अश्वेत पुरुष जेल में पाए जा रहे थे. बताया जाता है कि इस वजह से शादी के बाज़ार पर काफी असर पड़ा. हालांकि सबसे ज़्यादा असर अफ्रीकी अमेरिकियों पर ही पड़ा लेकिन कुल मिलाकर भी अमेरिकी शादियों में 13% की गिरावट देखी गई. नतीजा यह था कि औरतों को उन मर्दों से शादी करनी पड़ी जिन्हें वो शायद मना कर देती लेकिन अब उनके पास कोई चारा नहीं था.

ज़ाहिर तौर पर हालात से परेशान होकर की गई शादी खुशी कम ही देती है. लेकिन पुरुषों का जेल में जाना ही एक वजह नहीं थी क्योंकि इसी दौरान यूरोप के देशों की महिलाओं की खुशी का ठिकाना भी बहुत ज़्यादा नहीं था. सबूत बताते हैं कि जब बाहरी दुनिया में महिलाओं को अधिकार हासिल हो रहे थे, वहीं घरों में उनकी भूमिका में कोई बदलाव नहीं हुआ. यानि वो बाहर जाकर काम तो करने लगी लेकिन घर का काम अभी भी उसी के कंधों पर है. जो हाल 1980 से 2000 तक अमेरिकी महिलाओं का था, वैसा ही कुछ वर्तमान में भारतीय महिलाओं का बना हुआ है जो नौकरी तो करने लगी हैं, एक हद तक आर्थिक रूप से स्वंतत्र हो रही हैं लेकिन घर की जिम्मेदारी अभी भी उन्हीं पर है. ये दोहरा बोझ उनकी खुशी में खलल डाल रहा है. दफ्तर जाने से पहले घर की जिम्मेदारी, फिर दफ्तर की और फिर लौटकर घर का काम – ऐसे में यह उम्मीद करना कि औरत खुश रहे – थोड़ी ज़्यादती होगी.

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2000 से लेकर 2012 तक भारतीय शहरी इलाकों में काम करने वाली औरतों का प्रतिशत लगभग 14% पर अटका हुआ है.


इस दोहरे बोझ ने स्वीडन की औरतों की ज़िंदगी में उथल पुथल मचा दी थी. स्वीडन, लैंगिक समानता के लिए कड़े कदम उठाने के लिए जाना जाता है, बावजूद इसके वहां की औरतों के लिए खुशी की राह आसान नहीं. एक स्टडी बताती है कि घर का काम करना एक पुरुष के लिए उतना अवसादपूर्ण नहीं होता जितना कि एक औरत के लिए. जहां घर का काम करने से पुरुष मदद करने के लिए और ज़्यादा प्रोत्साहित होता है, वहीं महिलाएं घर का काम करते हुए शोषित महसूस करती हैं. ऐसे में जब महिला अपने अधिकारों को लेकर और ज़्यादा जागरुक हो जाती है, तब घर का काम कहीं न कहीं उसे और ज़्यादा अवसाद में डाल देता है. वहीं भारत में तो फिलहाल आलम यह है कि 2000 से लेकर 2012 तक शहरी इलाकों में काम करने वाली औरतों का प्रतिशत लगभग 14% पर अटका हुआ. यह आंकड़ा भारतीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यन्वयन मंत्रालय की 2017 की रिपोर्ट का है.

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महिलाओं पर दफ्तर और घर के काम ने दोहरा दबाव बनाया है


आज़ाद ख़्याली के मौहाल में रहने वाली महिलाएं कम खुश रहती पाई गई क्योंकि वह अपने साथ होने वाले भेदभाव को जल्दी पकड़ती हैं और तमाम मौकों के साथ साथ तनख़्वाह के मामले में भी वह अपने आसपास के पुरुषों से भी खुद की तुलना करती हैं. वहीं पारंपरिक सोच की महिलाएं खुद को जेंडर रोल में ज़्यादा देखती हैं और खुद को मिलने वाले अवसर की तुलना भी अपने आसपास के मर्दों से नहीं, बल्कि औरतों से ही ज़्यादा करती हैं.

ऐसा कहा जा सकता है कि जैसे जैसे महिलाओं के अधिकार और मौके बढ़ रहे हैं, वैसे वैसे औरतों की समाज को लेकर अपेक्षाएं बढ़ती जा रही हैं और वह उन्हीं अपेक्षाओं पर दुनिया को परखती हैं. जब समाज उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता तो वह निराश होती जाती है. क्या इसका मतलब है कि घर में बंद, पुरुष को सर्वेसर्वा मानने वाली औरत की ज़िंदगी ही ज़्यादा बेहतर है. शायद नहीं, सामाजिक चेतना को जागने में वक्त लगता है. कानूनी अधिकार मिलने में वक्त लगता है, उसे अपनी ज़िंदगी में धारण करने में उससे ज़्यादा वक्त और नए बदलाव के साथ समाज का सामंजस्य स्थापित करने में उससे कहीं ज़्यादा वक्त. लेकिन धीरे धीरे ही सही, सब कुछ अपनी जगह पर फिट बैठता जाता है. तब तक खुशी को जाने मत दीजिए, उसे कसके पकड़कर रखिए.
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