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World Diabetes Day 2019: कितना गंभीर है डायबिटीज? एलोपैथ और आयुर्वेद की लें मदद

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: November 14, 2019, 9:31 AM IST
World Diabetes Day 2019: कितना गंभीर है डायबिटीज? एलोपैथ और आयुर्वेद की लें मदद
दरअसल इंसुलिन का काम है ज्यादा पैदा हुए ग्लूकोज यानी सूगर को ब्लड से निकालकर सेल्स यानी कोशिकाओं में पहुंचाना.

भारत में टाइप 2 डाइबिटीज के मरीज ज्यादा हैं जो लाइफस्टाइल डिसऑर्डर की वजह से बढ़ते जा रहे हैं. एक आंकड़े के मुताबिक भारत में 2020 तक 130 मिलियन लोग डायबिटीज से पीड़ित होंगे.

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  • Last Updated: November 14, 2019, 9:31 AM IST
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डायबिटीज भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर बीमारी बन चुकी है. इसके दुष्परिणाम की वजह से लीवर, किडनी और आंखें सीधे तौर पर प्रभावित होती हैं. भारत में टाइप 2 डाइबिटीज के मरीज ज्यादा हैं जो लाइफस्टाइल डिसऑर्डर की वजह से बढ़ते जा रहे हैं. यही वजह है कि समय-समय पर जागरुकता अभियान चलाकर इससे होने वाले दुष्परिणाम से अगाह कराया जाता है ताकी भारत में डायबिटीज विकराल रूप लेने से पहले कंट्रोल किया जा सके. एक आंकड़े के मुताबिक भारत में 2020 तक 130 मिलियन लोग डायबिटीज से पीड़ित होंगे.

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एलोपैथ के नजरिए से
एलोपैथ के नजरिए से देखा जाए तो शरीर में मौजूद पेनक्रियॉज (Pancreas) दो तरह का हॉर्मोन पैदा करता है. इनमें से एक का नाम है ग्लूकागोन (Glucagon) और दूसरे का नाम है इंसुलिन (insulin). अल्फा सेल्स पेनक्रियॉज का ग्लूकॉगोन फॉर्म करता है. वहीं बीटा सेल्स इंसुलिन पैदा करता है. जाहिर है इन्हीं दोनों हॉर्मोन्स के असंतुलन से शरीर में बीमारी डायबिटीज के रूप में जन्म लेती है.

पेनक्रियाज (Pancreas) ब्लड ग्लूकोज को संतुलित करता है
दरअसल इंसुलिन (insulin) का काम है ज्यादा पैदा हुए ग्लूकोज यानी सूगर को ब्लड से निकालकर सेल्स यानी कोशिकाओं में पहुंचाना. वहीं ग्लूकॉगोन (Glucagon) का काम है कि अगर कम सूगर ब्लड में पाया गया तो ये लीवर को प्रेरित करता है कि वो अपने अंदर जमा ग्लाइकोजन को ग्लूकोज में परिर्वतित करे जिससे उसका इस्तेमाल किया जा सके. इसलिए शरीर में मौजूद पेनक्रियाज (Pancreas) ब्लड ग्लूकोज को संतुलित करने के लिए बेहद अहम माना जाता है क्योंकि वो दोनों हॉर्मोन ग्लूकॉगोन और इंसुलिन जेनरेट करता है जो शरीर में सूगर कंट्रोल करने में बेहद मददगार होते हैं. ध्यान देने योग्य बात यह है कि शरीर में ब्लड ग्लूकोज का लेवल 80-150 माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर होना चाहिए जिसे की संतुलित माना जाता है.

इंसूलिन और ग्लूकॉगोन हॉर्मोन के असंतुलन से होती है ये बीमारी
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जहां तक डायबिटीज के प्रकार का सवाल है तो एलोपैथ में इसे दो प्रकार का माना गया है. एक टाइप 1 है जिसमें शरीर में इंसुलिन का फॉरमेशन बंद हो जाता है. वहीं दूसरा प्रकार टाइप 2 है जिसके तहत शरीर इंसूलिन का इस्तेमाल सही तरीके से नहीं कर पाता है. साउथ एशियन, लैटिनोज, पैसिफिक आइलैंडर्स, नेटिव अमेरिकन्स में टाइप 2 डायबिटीज एक अनुवांशिक बीमारी के तौर पर पाया जाता है. वहीं एलोपैथ ने भी अब इसे अलग नजरिए से देखना शुरू कर दिया है. एलौपेथ मानने लगा है कि इंसुलिन और ग्लूकॉगोन हॉर्मोन के असंतुलन से डायबिटीज होने के चांसेज ज्यादा होते हैं. वहीं शहरी लोगों में स्ट्रेस, अनुचित
भोजन और गड़बड़ लाइफस्टाइल डायबिटीज के लिए मोटे तौर पर जिम्मेदार है न कि जेनेटिक कारण जो आंतरिक माहौल (Homeostasis) को असंतुलित करता है.

डायबिटीज को कंट्रोल करना भी चुनौतीपूर्ण
एलएनजेपी अस्पताल में मेडिसिन विभाग में कार्यरत प्रोफेसर डॉ नरेश के मुताबिक डायबिटिज को Early Diagnose कर उसे कंट्रोल किया जा सकता है और मरीज एक नॉर्मल इंसान की तरह जिंदगी जी सकता है. साथ ही डायबिटीज से होने वाले दुष्परिणाम से आसानी से बचा जा सकता है. डॉ नरेश कहते हैं कि डायबिटीज को एलोपैथ के नजरिए से खत्म नहीं किया जा सकता लेकिन कंट्रोल किया जा सकता है. वहीं जाने माने फिजीशियन डॉ विनय भट्ट का कहना है कि टाइप 2 डायबिटिक पेशेंट का अगर early diagnosis हुआ तो इसे खत्म किया जा सकता है और ये रिवर्सिबल है लेकिन देर से diagnosis के बाद डायबिटीज को कंट्रोल करना भी चुनौतीपूर्ण होता है.

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आयुर्वेद के नजरिए से
वात, कफ पित में असंतुलन से बीमारी का होना आर्युवेद से प्रमाणिक है. आर्युवेद के हिसाब से तीनों में असंतुलन आतंरिक संतुलन (Homeostasis) को गड़बड़ करता है और तभी बीमारियां होती हैं. टाइप 1 डायबिटीज जन्मजात बीमारी होती है जब इंसुलिन का फॉरमेशन होता ही नहीं है. वहीं टाइप 2 डायबिटीज मुख्यतौर पर स्ट्रेस और लाइफस्टाइल डिसऑर्डर की वजह से होता है. आयुर्वेद के मपताबिक कफ दोष की वजह से इंसान डायबिटीज का शिकार होता है.

आयुर्वेद के मुताबिक इंसान का शरीर पांच आवरण का बना होता है.

पहला- अन्नमाया कोष (Physical Body)
दूसरा- प्राणमाया कोष (vital Energy Sheath roughly corresponding to cardio pulmonary and respiratory system )
तीसरा- मनोमाया कोष (Emotions)
चौथा- विज्ञानमाया कोष (Reason)
पांचवां- आनंदमाया कोष (A spiritual state of bliss and freedom from stress and binaries such as right and wrong )

कब्ज और दस्त की समस्या बढ़ जाती है
आयुर्वेद के मुताबिक Negative Emotions की वजह से स्ट्रेस रिलेटेड हॉर्मोन्स जेनरेट होता है जो लंबे समय तक की मौजूदगी की वजह से प्राणमाया कोष में गड़बड़ी फैलाता है. शरीर का Vital Energy इससे पूरी तरह डिस्टर्ब होता है. इस वजह से vital energy का वो प्रवाह जिससे शरीर में मोजूद कोशिका (Cells) एक्टिव रहती है वो डिस्टर्ब हो जाती है. इस वजह से सांस में गड़बड़ी से लेकर पाचन तक में गड़बड़ी होती है जिससे कब्ज और दस्त दोनों तरह की समस्या बढ़ जाती है और कोशिका
थकने लग जाती है जो कि अनन्माया कोष में जाकर शरण लेता है.

मेडिटेशन, प्रॉपर डाइट और उचित लाइफस्टाइल जरूरी
आयुर्वेद के हिसाब से आतंरिक संतुलन बेहद जरूरी है (Homeostasis) जो योग, मेडिटेशन, प्रॉपर डाइट और उचित लाइफस्टाइल के जरिए संभव है और अगर ऐसा किया गया तो वात, कफ, पित का असंतुलन बरकार रखा जा सकेगा और डायबिटीज से लड़ने में कारगर होगा. वैसे कई तरह के योग जिनमें शिवानंद योग, रामदेव योग, विनियोग और अस्टांग योग शामिल हैं जो लाइफ स्टाइल डिसऑर्डर से जुड़े तमाम रोगों से लड़ने में बेहद सहायक है.

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आयुर्वेद औषधी डायबिटीज से लड़ने में कारगर
डॉ नितिन अग्रवाल राष्ट्रीय सचिव, विश्व आर्युवेद परिषद के मुताबिक डायबिटीज लाइफस्टाइल में गड़बड़ी के कारण पित दोष को जन्म देता है. लोगों में समृद्धि की वजह से डाइट तो बढ़िया हो गया है लेकिन शारीरिक श्रम में बेहद कमी आई है. इतना ही नहीं लोगों को अब मानसिक तनाव के साथ जीने की आदत पड़ चुकी है जिससे उनमें गुस्सा, तनाव लेने के आदत हो जाती है जिससे उनका मेटाबॉलिज्म खराब हो जाता है. डॉ अग्रवाल कहते हैं कि आयुर्वेद औषधी इन बीमारियों से लड़ने में कारगर है जो शिथिल पड़ चुके लीवर, पेनक्रियाज और किडनी को रिजुनुवेट (Rejuvenate) करने की क्षमता रखता है लेकिन इन औषधि के साथ पीड़ित लोगों को अपनी लाइफस्टाइल भी चेंज करना पड़ेगा तभी हम अपने देश को डायबिटीज कैपिटल बनने से रोक सकते हैं.

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First published: November 14, 2019, 9:31 AM IST
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