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क्योंकि पानी सब कुछ याद रखता है


Updated: December 3, 2019, 7:38 PM IST
क्योंकि पानी सब कुछ याद रखता है
फिल्म की कहानी टिकी है पांच तत्वों पर जो जंगल की फलने फूलने की वजह है, हवा, पानी, आग और धरती.

हम सब पानी से बने हैं, पानी पीते हैं, पानी पचाते हैं और पानी निकालते हैं, यानी पानी हमें अच्छे से पहचानता है, इसका मतलब हुआ पानी सब कुछ याद रखता है.

  • Last Updated: December 3, 2019, 7:38 PM IST
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हम सब पानी से बने हैं, पानी पीते हैं, पानी पचाते हैं और पानी निकालते हैं, यानी पानी हमें अच्छे से पहचानता है, इसका मतलब हुआ पानी सब कुछ याद रखता है. ये संवाद है बच्चों की फिल्म फ्रोज़न 2 का, ये संवाद बोलने वाला एक स्नोमैन है. फिल्म की कहानी दो बहनों की है जिसमें एक बहन मायावी ताकत रखती है और अपने हाथ से निकलने वाली शक्ति से किसी भी चीज़ को बर्फ बना सकती है. दूसरी बहन में कोई शक्ति नहीं है लेकिन हौसले की कमी नहीं है. बड़ी बहन को एक अजीब सी आवाज़ सुनाई देती है. जो उसे दिन रात परेशान करती रहती है. उस आवाज का पता लगाने के लिए जो रोमांच होता है वही फिल्म की कहानी है. लेकिन अगर फिल्म की कहानी को इतना सा ही मान लिया जाए तो शायद हम इसे लिखने वाले और बनाने वाले की रचनात्मकता और उसके भावों के साथ अन्याय करेंगे.

फिल्म की कहानी टिकी है पांच तत्वों पर जो जंगल की फलने फूलने की वजह है, हवा, पानी, आग और धरती. एक दिन जंगल से उसकी वजह कहीं दूर चली जाती है. या नाराज हो जाती है. जंगल में रहने वाले आदिवासी भी यहीं मानते हैं. वहीं बड़ी बहन एलेसा और छोटी बहन एना को उसके पिताजी ने इन चारों तत्वों को लेकर जो कहानी सुनाई है उसके मुताबिक जंगल के आदिवासियों ने उनके दादाजी को धोखा दिया और उन पर हमला कर दिया जिसकी वजह से चारों तत्व नाराज़ हो गए.

सही वजह क्या है यही पता करने के लिए दोनों बहनें एक रोमांचक सफर पर निकलती हैं. जहां उनके सामने जो खुलासा होता है वो दरअसल इस पूरी फिल्म का वो अहम हिस्सा है जिसकी वजह से आज हमने अपनी दुनिया को उस जगह पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां से वापस आना बेहद मुश्किल है औऱ हम आना भी नहीं चाहते हैं.

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दरअसल फिल्म बताती है कि किस तरह राजा विकास के नाम पर जंगल में आ रहे पानी को रोक कर बांध बना लेता है. जिससे जंगल पूरी तरह सूखने लगते हैं. आदिवासियों का राजा जब उन्हें इस काम को करने से रोकता है तो वो धोखे से उसे भी मार देता है और बाहर कहानी निकलती है कि आदिवासियों ने उन पर हमला कर दिया जिसकी वजह से उन्हें मारना पड़ा. लेकिन प्रकृति नाराज़ है. वहां के लोगों ने कई सालों से खुला आसमान नहीं देखा है.

इन चारों तत्वों को जोड़ने के लिए एक पांचवां तत्व बेहद ज़रूरी है जिसके बारे में कोई नहीं जानता है वो तत्व खुद बड़ी बहन एलेसा है यानी बर्फ. एक तरफ बड़ी बहन खुद को समर्पित करते हुए खुद को चारों तत्वों से मिला लेती है वहीं छोटी बहन मानव सभ्यता की भलाई के लिए प्रकृति का साथ देने का मन बनाते हुए बांध तोड़ने का फैसला लेती है. इस काम में वो जिसकी मदद लेती है वो है धरती दानव. जो पत्थर फेंक फेंक कर बांध को तोड़ देते हैं.

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फिल्म रूपकों का इस्तेमाल करते हुए हमें पर्यावरण की कई सीख दे जाती है. मसलन हम जिस तरह प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं उसका ही नतीजा है कि पांचवां तत्व यानी बर्फ जिसे हम धरती पर ग्लेशियर के रूप में देखते हैं. जो हमारी पूरी धरती पर जिंदगी का स्रोत हैं. वो धीरे-धीरे पिघल रहे हैं. वहीं धरती दानव पत्थरों के बने हुए दैत्य हैं. जो बताते हैं कि अगर धरती नाराज़ हो जाती है तो फिर विनाश को कोई नहीं रोक सकता है. इसी तरह विकास के नाम पर जो हम बांध बनाए जा रहे हैं उनका नतीजा भी सामने आने लगा है. गंगा के गंगा बनने तक उस पर पड़ने वाले पांचों प्रयागों को हमने बांध में बांध दिया है. गंगा के गंगत्व को हमने रहने ही नहीं दिया. नर्मदा पर बने सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई पर भले ही हम इतरा रहे हों लेकिन उसके पीछे हो रहा विनाश हम देखना ही नहीं चाहते हैं. यमुना का हाल किसी से छिपा नहीं है. ब्रह्मपुत्र हर साल तबाही का मंजर पैदा करती है. कोसी को तो बिहार का शोक ही कहा जाने लगा है. जबकि हकीकत क्या है ये सभी को पता है.

दरअसल फ्रोजन 2 बच्चों से ज्यादा बड़ों को देखने और समझने के लिए बनी फिल्म है. ये बात इसलिए भी कहना ज़रूरी हो गया क्योंकि 2-3 दिसंबर की दरमियानी रात ऐसी काली रात थी. जो कई लोगों की जिंदगी को लेकर चली गई और लाखों जिंदगियां तबाह कर गई.

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भोपाल गैस त्रासदी आज भी हजारों लोगों के लिए एक बुरा सपना बन कर रह रही है. भोपाल में रहने वाला हर वो बाशिंदा जिसने उस गैस की घुटन को महसूस किया है वो जानता है कि हवा ना होगी तो क्या होगा. इस त्रासदी को भोगने वाले लाखों लोगों की आवाज़ बनने वाले अब्दुल जब्बार भी बीते दिनों हमारे बीच नहीं रहे और विडंबना देखिए कि उनके पास इलाज के लिए पैसे तक नहीं थे. यहां तक कि उनके करीबियों ने सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी बेवा के लिए मदद की अपील की. भोपाल गैस त्रासदी से हमने क्या सबक लिया. हमने बस इस दिन को एक नाम दिया प्रदूषण नियंत्रण दिवस.

इस नाम को रटते हुए हमने दिल्ली सहित कई शहरों को यहां तक कि भोपाल भी उसमें शामिल है वहां विकास की ऐसी आंधी चलाई की उसमें पेड़ भी उड़ गए और पहाड़ भी ढह गए. नदियां तालाब तो हम पहले ही पी चुके हैं.

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मेडागास्कर फिल्म में जंगल में फंसे हुए कई लोग जब जानवरों से डरे हुए रहते हैं तो एक बूढ़ी औरत उनका हौसला बढ़ाने के लिए बोलती है. घबराओं मत दोस्तों हम न्यूयॉर्कर है, हमें जब भी ज़रूरत पड़ी हमने खुद के लिए बिल्डिंगे खड़ी कीं, हमें जब भी भूख लगी हमने खुद के लिए बर्गर के आउटलेट खोल लिए, हमें जब भी प्यास लगी हमने बांध बनाए, बिजली बनाई. हम न्यूयॉर्कर हैं. हम वहां पर जब कुछ कर गए तो हम यहां भी सब झेल जाएंगे.

ये न्यूयॉर्कर होना एक फितरत है जो पूरी दुनिया में पैर पसार गई है जो जंगलों में रहने वाले आदिवासी को असुर बताती है और कहती है कि तुम असभ्य हो, आओ हम तुम्हें बताते हैं कि सभ्यता क्या होती है. जो हमारे पुराणों, हमारी कथाओं के ज़रिये हमें समझाती है कि वो जो जंगल में रहते थे सब उनका ही किया धरा है. जो बड़ी ही चालाकी से हमारे सामने ये प्रस्तुत करती है कि वाल्मीकि एक डाकू थे. फिर बाद में उनको आभास हुआ और वो सभ्य हो गए. लेकिन वो ये बात उतनी ही चालाकी से छिपा लेते हैं कि जिन्होंने उन्हें अपनी कहानियों में डाकू बनाया था वो लोग जंगलों को जला कर खेती करना चाहते थे. इन्ही लोगों के विरोध ने वाल्मीकि को डाकू बनाया. हो सकता है कि हममें से एक तबका इस बात को मानने से इंकार कर दे. ये करना उसका अधिकार है लेकिन जितना इस बात को इंकार करना उसका अधिकार है उतना ही जंगलों पर अधिकार उन आदिवासियों का भी है जिन्हें हम सभ्य बनाने पर तुले हैं. ये वही लोग है जो प्रकृति के साथ तारतम्यता बना कर चलते हैं इसलिए हमें असभ्य लगते हैं.

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फ्रोजन 2 इनकी बात भी कहती है. अंत में फिर से शुरू की बात. जब भोपाल में गैस त्रासदी हुई तो रात में जो लोग बचे थे उनमें से एक मैं भी था. मुझे उस गैस से बचाने वाला पानी ही था. अगर उस सर्द रात को हम भाईयों की रजाई पर पिताजी ने बाल्टियों से पानी नहीं डाला होता. हमारा मुंह लगातार पानी से धुलाया नहीं होता तो शायद 4 साल की उम्र में मेरी जीवन लीला समाप्त हो गई होती. इसलिए हमें ये मानना पड़ेगा की पानी हमें अच्छे से पहचानता है, इसका मतलब हुआ पानी सब कुछ याद रखता है.

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First published: December 3, 2019, 3:16 PM IST
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