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विश्व जल दिवस 2020: 'हम तुम्हें कोष देंगे तुम अपना पानी दो'

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Updated: March 22, 2020, 1:25 PM IST
विश्व जल दिवस 2020: 'हम तुम्हें कोष देंगे तुम अपना पानी दो'
कोरोना ने हमें दूरी बनाना सिखा दिया है और प्रकृति हमें बहुत कुछ सिखा रही है.

2050 तक पानी के लिए साल में कम से कम एक महीना संघर्ष करने वालों की संख्या बढ़कर पांच सौ करोड़ तक पहुंच जाएगी

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  • Last Updated: March 22, 2020, 1:25 PM IST
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अगर कोई कार हमें नुकसान पहुंचा रही है तो हम क्या करते हैं, हम और सुरक्षित कार का निर्माण करते हैं, न कि वापस बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी का इस्तेमाल करने लग जाते हैं. लेकिन प्रगति का मतलब किसी की जान लेना नहीं होता है, प्रगति का मतलब किसी को बीमार करना नहीं होता है और न ही ये होता है कि जो चीज हम पैदा नहीं कर सकते उसे बर्बाद कर दें. जैसे ग्लेशियर और यहां के पानी को जहरीला और बर्बाद किया जा रहा है. जिस की वजह से लोग बीमार पड़ रहे हैं, मर रहे हैं.

ये संवाद नेटफ्लिक्स पर मौजूद वेब सीरीज रेगनॉर्क (Ragnarok) के हैं. पहला संवाद बोलने वाली लड़की जुतुल परिवार से है जो नॉर्वे के तीन सबसे अमीर परिवारों में से एक है. इस परिवार की केमिकल कंपनी की वजह से नॉर्वे के ऐडा (काल्पनिक शहर) में मौजूद नदी तबाह हो रही है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं. औऱ इस पानी को पी कर लोग बीमार पड़ रहे हैं. नोर्स मान्यता के मुताबिक यह धरती का सबसे अंतिम शहर है जो दैत्यों और भगवान की युद्ध स्थली माना जाता है. इस वेब सीरिज में भी जुटुल परिवार को उसी दैत्य परिवार का हिस्सा बताया गया है जिससे लड़ने के लिए जो लड़का या नायक खड़ा होता है वो तूफान के देवता थोर का रूपक है. सीरिज में धार्मिक कहानी को वर्तमान में पर्यावरण और पानी से जोड़ कर पिरोया गया है. सीरिज जिस बात की ओर इशारा करती है वो यही है कि रईस पैसा देता है और बदले में वो जो चाहे वो लेता है. चाहे फिर जंगल हो, ज़मीन, जल हो या फिर जान ही क्यों ना हो.

बीते दिनों जब डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) भारत में पिकनिक मनाने आए थे और ताजमहल (Taj mahal) में फोटो खिंचवाने के लिए परिवार सहित पहुंचे थे. उस वक्त उनके पीछे मौजूद यमुना नीली थी. यमुना कभी ऐसी नहीं थी. लेकिन जब भारत में उनके आने की मुनादी पीटी गई थी तभी साथ में ये घोषणा भी कर दी गई थी कि जितनी यमुना ट्रंप को दिखे वो साफ सुथरी दिखे. उसमें पानी दिखे वो बहती सी दिखे. तो यमुना वैसी दिखी.

इसके बदले ट्रंप ने हो सकता है किसी कोष का ऐलान किया हो. गरीब देश या विकासशील देश पर्यावरण, पानी की कमी और दूसरी आपदाओं से जुड़ी हुई जिन मुसीबतों को झेल रहे हैं उन्हें पैदा करने में उनका लेश मात्र भी हाथ नहीं है. लेकिन जिनका हाथ है वो अपने हाथ साफ करने के लिए एक कोष खोल कर बैठे हैं. इसी कोष को कहते हैं जलवायु कोष.



ये कोष सत्तर की फिल्मों की कहानी पेश करता है जिसमें गरीब ड्राइवर अपने परिवार की भलाई के लिए मालिक के बेटे की हत्या का गुनाह अपने सिर पर लेकर जेल चला जाता है. बदले में मालिक उसके परिवार की देखरेख का भरोसा देता है. खास बात ये है कि जब वो जेल से छूट कर आता है तो उसे पता चलता है कि उसने जेल भी भुगत ली और उसका परिवार भी सजा काट रहा था.

जो नहीं कर रहा है वो भर रहा है

दरअसल, जलवायु परिवर्तन जिंदगी को लगातार मुश्किल बनाती जा रही है. इसमें सबसे ज्यादा नाइंसाफी उन लोगों के साथ हो रही है जिनकी इस बदलाव में भूमिका न के बराबर है. जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम के व्यवहार में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है, जिसने जिंदगी को और मुहाल बना दिया है. वैश्विक तापमान में जो भी इजाफा हो रहा है इसका सीधा असर उन समुदायों पर पड़ रहा हा जिनकी पहुंच साफ पानी तक नहीं है.

जलस्रोत सूखते हैं तो पहले से ही पानी ढोने में अपना जीवन बिता रही महिलाओं और लड़कियों को पानी लाने के लिए और दूर चल कर जाना पड़ता है, जिसकी वजह से उन्हें स्कूल जाने और दूसरे कामों के लिए कम वक्त मिलता है. वहीं जब बाढ़ आती है तो जलस्रोत मानव शौच से दूषित हो सकते हैं जिसकी वजह से बीमारी बढ़ रही है, इसी तरह समुद्री स्तर के बढ़ने से भूजल दूषित हो रहा है और ज़मीन के नीचे का पानी खारा हो रहा है और पीने लायक नहीं बचा है.

विश्व जल दिवस पर अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन वॉटरएड की जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक,
2050 तक पानी के लिए साल में कम से कम एक महीना संघर्ष करने वालों की संख्या बढ़कर पांच सौ करोड़ तक पहुंच जाएगी. मतलब दुनिया की आबादी का 50 फीसद. वॉटरएड की रिपोर्ट के हिसाब से 2017-2018 में निजी और सार्वजनिक कर्ताओं की ओर से कुल 57900 करोड़ डॉलर जलवायु कोष पर खर्च किये गये. इस कुल राशि का 44 फीसद यानि 25300 करोड़ डॉलर सार्वजनिक कोष जिसमें बहुपक्षीय और द्विपक्षीय स्रोत शामिल है. इस राशि का बहुत कम हिस्सा उन देशों तक पहुंचा जो वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के असर को ज्यादा अनुभव कर रहे हैं.

आखिर क्या है जलवायु कोष

जलवायु कोष एक तरह का निवेश है जो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार उत्सर्जन को कम करने और जलवायु पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए अनुकूलीय कार्यवाही करने के उद्देश्य से किया जाता है. जलवायु कोष विविध चैनल के जरिये आता है लेकिन इसके प्रमुख जरिये हैं.

बहुपक्षीय जलवायु कोष – ये एक तरह की पहल है जिसे विभिन्न देश चलाते हैं. विकसित देशों की सरकार जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संरचना सम्मेलन (UNFCCC) के अधीन अपनी नैतिक बाध्यता को मानते हुए इस कोष में धन जमा करती हैं.

द्विपक्षीय जलवायु कोष – जब एक देश की सरकार दूसरे देश को पैसा देती है, ये पैसा आमतौर पर किसी मौजूदा विकास एजेंसी के जरिये दिया जाता है.

निजी वित्तीय कोष - जलवायु आर्थिक मदद के निजी स्रोत मुख्यतौर पर जलवायु अनुकूलन के बजाए नवीकरणीय ऊर्जा और हरित परिवहन में इस्तेमाल होते है.

जलवायु परिवर्तन और कोष में भारत का स्थिति

जलवायु परिवर्तन के लिहाज से भारत दुनिया का 51वां सबसे संवेदनशीन देश है. यहां आज भी 7 फीसद आबादी को अपने घर के पास बुनियादी पानी की सुविधा मुहैया नहीं है. जहां तक जलवायु कोष से प्राप्त सहायता की बात है तो वो प्रति व्यक्ति, प्रति वर्ष 3.20 डॉलर है. वैसे तो सरकार खुद ही 2024 तक भारत के हर घऱ में जल पहुंचाने का दावा कर रही है लेकिन जहां एक तरफ जलवायु संकट की वजह से इस वादे को पूरा करने में ढेर सारी व्यावहारिक दिक्कते हैं. वहीं इसे अमल में लाने पर भूजल पर भी गहरा असर पड़ेगा जो काफी गहरा होगा. साथ ही मौसम की मार का दंश भी देश झेल ही रहा है

पिछले साल, देश के बड़े हिस्से ने दशक की सबसे बड़े सूखे की मार को झेला, साथ ही करोड़ों लोगों को पानी की कमी से जूझना पड़ा और इस वजह से किसान अपनी ज़मीन छोड़ने को मजबूर हो गये. पूर्वी राज्य उड़ीसा को फानी चक्रवात का सामना करना पड़ा, इस क्षेत्र में 20 साल में आए सबसे भयानक तूफान का इस तरह आना काफी चौंकाने वाला था जिसकी वजह से कई गांव जलमग्न हो गए, हज़ारो लोग बेघर हुए और तमाम तरह की सेवाएं बर्बाद हो गईं.

खास बात ये है कि जमीन में हैंडपंप लगाने से मिट्टी का क्षरण होता है या भूजल में खारापान बढ़ जाता है, इस बात की पुष्टि होने के बाद भी धड़ल्ले से हैंडपंप और बोरवेल लगाए जा रहे हैं. ये जानते हुए कि हैंडपंप या बोरवेल लगाने के दौरान पाइप का गलना स्वाभाविक है जिससे पीने के पानी में लोहा आ जाता है जो भारत ही नहीं दूसरे देशों के गांव में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए मुसीबत का कारण बन रहा है. फिर भी ये काम लगातार किया जा रहा है. और जिस वर्ग का इस ग्लोबल वार्मिंग के लिए ज़िम्मेदार कार्बन उत्सर्जन में सबसे कम योगदान है, सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें ही भुगतना पड़ रहा है औऱ ये बात सिर्फ भारत ही नहीं पूरे विश्व पर लागू होती है.

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया के देशों को क्या मदद मिल रही है?

जलवायु परिवर्तन को लेकर सबसे नाज़ुक स्थिति में जो देश हैं वो दरअसल दुनिया के कुछ सबसे गरीब और अविकसित देशों में से एक हैं. अगर जलवायु परिवर्तन को लेकर तुरंत कोई कार्यवाही नहीं की गई तो एक अनुमान के मुताबिक विकसाशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के लिए जो कीमत चुकानी होगी वो भयावह होगी. कम और मध्यम आय वाले देशों में सुरक्षित जल और स्वच्छ शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने में जो लागत आती है वही करीब 19800 करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष के आसपास है. जलवायु परिवर्तन से इस लागत में इजाफा होगा और साथ में बाढ़ सुरक्षा के लिए अतिरिक्त 10300 करोड़ डॉलर की ज़रूरत पड़ेगी. जलवायु परिवर्तन के दौर में सभी लोगों के लिए सुरक्षित पानी उपलब्ध करवाना एक बहुत बड़ी चुनौती है जिसका सामना विकासशील देश अकेले नहीं कर सकते हैं.

क्या दुनिया प्रगति कर रही है?

2000 और 2017 के बीच में, कम से कम 180 करोड़ लोगों को बुनियादी जलआपूर्ति मिली और सतही स्रोत से पानी पीने को मजूबर लोगों की संख्या 25 करोड़ 60 लाख से गिरकर 14 करोड़ 40 लाख हुआ. हालांकि पानी की बुनियादी उपलब्धता के लिए सतत विकास ध्येय 6 के तहत जो लक्ष्य तय किया गया है, ये गिरावट उससे कम है.

वर्तमान में इस मामले में विकास की जो वैश्विक औसत गति है, उसके मुताबिक अंदाजा यह लगाया
जा रहा है कि अविकसित या विकासशील देशों में सुरक्षित पानी की उपलब्धता 2131 से पहले नहीं हो पाएगी. मतलब हम नियत वक्त से 100 साल पीछे चल रहे हैं. दो देशों के बीच विकास की दर में विषमता देखें तो समझ आता है कि कुछ लोगों को तो शायद इस तारीख के बाद भी सुरक्षित पानी नहीं मिल पाए. अगर हम विकास की गति में नाटकीय बढ़ोतरी भी ले आते हैं तब भी सतत विकास ध्येय 6 के उद्देश्य को हासिल करने में कम से कम एक सदी लग जाएगी और हमारे पास एक दशक से भी कम वक्त बचा है.

विकसित देशों ने कोष बनाकर अपनी इतिश्री कर ली है और कहीं ना कहीं वो इस तरह से पेश आ रहे हैं जैसे पैसे देकर उन्हें ये अधिकार मिल गया है कि वो जितना चाहे प्रकृति को बरबाद कर सकते हैं. उनके लिए लावारिस फिल्म में एक गीत है.
पैसे से क्या-क्या तुम यहां खरीदोगे, दिल खरीदोगे या जां खरीदोगे
इन हवाओं का मोल क्या दोगे, इन घटाओं का मोल क्या दोगे
इन ज़मीनों का मोल हो शायद, आसमानों का मोल क्या दोगे.
पास पैसा है तो है ये दुनिया हंसी, हो ज़रूरत से ज्यादा तो मानों यकीं.
ये दिमागों में पैदा फितूर करे है, यही पैसा तो अपनों से दूर करे है

देख लीजिए कोरोना ने हमें दूरी बनाना सिखा दिया है और प्रकृति हमें बहुत कुछ सिखा रही है. इसलिए जलवायु कोष बनाने से ज्यादा प्रकृति के कोष को बचाने की ज़रूरत है.

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First published: March 22, 2020, 11:32 AM IST
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