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प्रिजर्वेटिव्स से लैस रैपर फलों को खराब होने से बचाएगा, शेल्फ लाइफ बढ़ाने में भी है यूजफुल: रिसर्च

ये रैपिंग पेपर नॉन टॉक्सिक और रीयूजेबल है. (प्रतीकात्मक फोटो- Shutterstock)

ये रैपिंग पेपर नॉन टॉक्सिक और रीयूजेबल है. (प्रतीकात्मक फोटो- Shutterstock)

Wrapper equipped with Preservatives : कम्पोजिट पेपर विकसित करने वाले रिसर्चर्स का कहना है कि फलों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए रैपर के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है.

  • News18Hindi
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    Wrapper Equipped With Preservatives : इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST), मोहाली के रिसर्चर्स ने कार्बन (Graphene Oxide) से बना एक मिश्रित (कम्पोजिट) पेपर विकसित किया है. फलों को खराब होने से बचाने के लिए इस पेपर को प्रिजर्वेटिव्स (परिरक्षकों) से लैस किया गया है. दैनिक जागरण में छपी रिपोर्ट के अनुसार, कम्पोजिट पेपर विकसित करने वाले रिसर्चर्स का कहना है कि फलों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए रैपर के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है.

    फलों को प्रिजर्व्ड करने की मौजूदा डिपिंग तकनीक में प्रिजर्वेटिव (Preservative), फल द्वारा सोख लिये जाते हैं, जिससे फलों के विषाक्त (Toxic) होने का खतरा रहता है. इसके विपरीत नया विकसित किया गया रैपर सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही प्रिजर्वेटिव रिलीज करता है. इस रैपर की एक खासियत यह भी है कि इसका दोबारा उपयोग किया जा सकता है, जो फलों के प्रिजर्वेशन के लिए वर्तमान में प्रचलित तकनीक के साथ संभव नहीं है.

    इस तरह किया विकसित
    इस गैर-विषैले (Non-Toxic) और पुन: प्रयोग योग्य (Reusable) रैपिंग पेपर को विकसित करने के लिए रिसर्च करने वालों ने कार्बन मैट्रिक्स को प्रिजर्वेटिव के साथ इनक्यूबेट (अंडों को गर्माहट देने जैसा) किया है. कमरे के तापमान में 24 घंटे की हीटिंग के बाद प्राप्त उत्पाद से एडिशनल प्रिजर्वेटिव्स को हटाने के लिए उसे कई बार धोया गया, और अंत में, इस कार्बन-परिरक्षक कम्पोजिट (Carbon-Preservative Composite) को कागज में ढाला गया है.

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    किसानों और फूड इंडस्ट्री को होगा फायदा
    इस पेपर को विकसित करने वाले रिसर्चर्स का कहना है कि यह नया प्रोडक्ट फलों की शेल्फ लाइफ बढ़ाकर किसानों और फूड इंडस्ट्री को फायदा पहुंचा सकता है. उनका कहना है कि नए रैपर के इस्तेमाल से फिनोल (Phenol) सामग्री में सुधार देखा गया है. फिनोल, कोल टार से प्राप्त होने वाला हल्का अम्लीय विषाक्त सफेद क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ है, जिसका उपयोग रासायन निर्माण (Chemical Formulation) और घुलित रूप में (कार्बोलिक नाम के तहत) एक कीटाणुनाशक के रूप में होता है.

    यह था प्रयास
    भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से सम्बद्ध स्वायत्त संस्थान इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी (आईएनएसटी) के शोधकर्ताओं ने डॉ. पी.एस. विजयकुमार के नेतृत्व में यह स्टडी की  गई है. रिसर्च करने वालों की कोशिश एक ऐसा विकल्प तलाश करने की थी, जो वेस्ट से विकसित हो सके, और जिससे फलों में प्रिजर्वेटिव्स के सोखने की समस्या न हो.

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    इस ग्राफीन फ्रूट रैपर के उत्पादन के लिए केवल बायोमास के ताप से उत्पादित कार्बन की आवश्यकता होती है. डॉ विजयकुमार ने कहा है कि “वेस्ट से प्राप्त कार्बन सामग्री को भारी मात्रा में कार्बनिक अणुओं को धारण करने के लिए जाना जाता है, और इस तरह परिरक्षक (Preservative) भारित कार्बन तैयार किया गया है, और फलों के संरक्षण के लिए उसे कागज में ढाला गया है. कार्बनिक अणुओं को धारण करने के लिए कार्बन की क्षमता बढ़ाने से हमें इस उत्पाद को विकसित करने में मदद मिली है.”

    वर्तमान विकल्पों से हो सकती है समस्याएं
    फल जल्दी खराब हो जाते हैं; इसलिए उत्पादित होने वाले लगभग 50 प्रतिशत फल बर्बाद हो जाते हैं, जिससे भारी नुकसान होता है. पारंपरिक रूप से; फलों का संरक्षण राल, मोम, या खाद्य पॉलिमर के साथ परिरक्षकों (Preservatives) की कोटिंग पर निर्भर करता है, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. शोधकर्ताओं का दावा है कि फलों के लिए इस रैपर का उपयोग करने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि ग्राहकों को बेहतर गुणवत्ता के फल मिल सकें.

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