कुछ अलग हटकर करने का नाम था 'ज़ोहरा सहगल', पढ़ें आत्‍मकथा अंश

ज़ोहरा सहगल ने इस आत्मकथा में अपनी जिंदगी के अहम पहलुओं को साझा किया है.
ज़ोहरा सहगल ने इस आत्मकथा में अपनी जिंदगी के अहम पहलुओं को साझा किया है.

ज़ोहरा सहगल (Zohra Sehgal) की आत्मकथा (Autobiography) मंच और फिल्मी पर्दे पर उनकी लगभग सौ साल लम्बी मौजूदगी का एहसास कराती है. इसमें उन्‍होंने पृथ्वी थिएटर (Prithvi Theatre) और पृथ्वीराज कपूर (Prithvi Raj Kapoor) से जुड़े अपने लम्बे और गहरे अनुभव को साझा किया है.

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  • Last Updated: September 29, 2020, 2:59 PM IST
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ज़ोहरा सहगल (Zohra Sehgal) की यह आत्मकथा (Autobiography) मंच और फिल्मी पर्दे पर उनकी लगभग सौ साल लम्बी मौजूदगी का एक बड़ा फलक पेश करती है. भारत और इंग्लैंड दोनों जगह समान रूप से सक्रिय रहीं ज़ोहरा सहगल इसमें अपने बचपन से लेकर अब तक की जिन्दगी का दिलचस्प ख़ाका खींचती हैं. 1930 में ज़ोहरा आपा ड्रेस्डेन, जर्मनी में मैरी विगमैन के डांस-स्कूल में आधुनिक नृत्य का प्रशिक्षण लेने के लिए गईं. नवाबों की पारिवारिक पृष्ठभूमि से आईं एक भारतीय युवती के लिए यह फैसला अस्वाभाविक था, लेकिन कुछ अलग हटकर करने का नाम ज़ोहरा सहगल है. 1933 में आप वापस आईं और 1935 में उदय शंकर की अल्मोड़ा स्थित प्रसिद्ध नाट्य दल से जुड़ीं. कामेश्वर सहगल (Kameshwar Sehgal) भी इसी कम्पनी में थे जिनसे 1942 में उनकी शादी हुई.

इस दौर के अपने सफ़र के बाद ज़ोहरा सहगल इस आत्मकथा में पृथ्वी थिएटर (Prithvi Theatre) और पृथ्वीराज कपूर (Prithvi Raj Kapoor) से जुड़े अपने लम्बे और गहरे अनुभव के दिनों का लेखा-जोखा देती हैं. पृथ्वी थिएटर में अपने चौदह साल उन्होंने भारतीय रंगमंच के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय के बीचो-बीच बिताए. इंग्लैंड में बीबीसी टेलीविजन, ब्रिटिश ड्रामा लीग और फिल्मों के साथ अभिनेत्री के रूप में उनका जुड़ाव, 'मुल्ला नसरुद्दीन' जैसे भारतीय धारावाहिकों में काम करने के अनुभव, इस आत्मकथा को एक खास दिलचस्पी से पढ़े जाने की दावत देते हैं.

(क़रीब से : आत्मकथा अंश)



ज़ोहरा सहगल के नाम पृथ्वीराज कपूर के पत्र
1 मई, 1960
कूका जिमखाना
सेंट सिरिल रोड, बांद्रा अज़ीजी ज़ोहरा जी,

गो मैं रहा रहीनेकरम हाय रोज़गार, लेकिन तेरे ख़याल से गाफ़िल नहीं रहा शायर ने तो सितम लिखा था. मैंने बदलकर करम कर दिया है. मैंने सितम को माना नहीं इसलिए मुझ पर जो भी हुआ है वो करम रहा है क़ुदरत का. आज भी जो हो रहा है वो भी करम है उसका, सो शिकवा नहीं शुक्र की जगह है, बहादुर ख़ान मोरे शुक्र शुक्र...आपके प्यार-भरे ख़त मिले-सब मिले सब साथियों को पढ़कर सुनाए गए और साथ ही आपके सबक़, एक्सरसाइज़िज़ और तनकीदी मज़ामीन भी. खुशी होती है कि आप इतनी मुस्तैदी और गर्मजोशी, शौक़ और लगन से काम कर रही हैं. नेरुला साहब जैसे लोग जब तब उखड़ी हुई और बेरब्त बातें किया ही करेंगे पर मुझे पूरी उम्मीद है कि आप उन ऐसों से बेनियाज़ रहकर अपनी धुन में काम किए ही जाएंगी...Play your part with all your heart about the results bother not. हां, न जाने क्यों ये सूचना अभी कुछ दिन और आपको नहीं देना चाहता था कि theatre बन्द हो रहा है. हमेशा के लिए तो ज़ात खुदा की ही रहती है. जनाबे हश्श ने भी लिखा है. दुनिया फानी है. हर शय यहां की आनी जानी है, लेकिन जाहेरा नज़र आते हुए भी ये ख़याल न था कि इतनी जल्दी theatre बन्द कर देना होगा.

मुझे अपनी ढिठाई पर नाज़ था पर अब वो ढिठाई भी ढीठ हो गई. श्रीरामपुर का दौरा इसीलिए तय किया था कि आवाज़ को देखू कहां तक खींच पा सकता हूं...6 अप्रैल को यहां से निकले, उससे पहले 3 अप्रैल को मुग़ले-आज़म की डबिंग की. कोई 4 घंटे भर वहां भी तो बड़ी बकट आवाज़ इस्तेमाल करता हूं, गले ने साथ दिया और वो काम ख़ातिरख्वा हो गया. 7 को श्रीरामपुर पहुंचे. ये अहमदनगर से कोई 40 मील पर है और उधर साईंबाबा की शिरडी से 20 मील. पहले दिन 'किसान' खेला, आवाज़ ने आखिर तक साथ दिया, दूसरे दिन मौन साधे पड़ा रहा दिन भर. रात को 'आहुति' खेला, आवाज़ ने साथ दिया, शो भी खूब जमा. तीसरे दिन 'पैसा' था. आख़िरी ऐक्ट तक आवाज़ साथ रही और आख़िरी ऐक्ट में तो ये जान पड़ता था कि थैली में हो जैसे जिधर चाहे घुमा आऊं.

बस तीन ही दिन के लिए वहां तय हुआ था. ख़याल था दो दिन का वक़्फा डालकर फिर अहमदनगर या कहीं और गांव वगैरह में खेलेंगे. उन्होंने चौथा खेल भी मांग लिया 'पठान' और वो ही Proverbial last straw साबित हुआ. गले के सब कंगूरे ढह गए. आख़िरी ऐक्ट में तमाम पंजर बोल रहा था-यूं लगता था पसलियां फेफड़ों में धंस जाएंगी. आवाज़ जो निकल रही थी काम के लिए निहायत मौजू थी जैसे किसी पहाड़ी दर्रे में से शां-शां करती हुई तेज़ हवा चल रही हो. देखने वालों ने तारीफ़ की, लेकिन साथियों का बुरा हाल था-सबके चेहरों पर पीलाहट पुत गई थी इस ख़ौफ़ से कि मैं कहीं वहीं Collapse न कर जाऊं. योग का एक बड़ा प्यारा ख़त आया था. मिले तो कह दीजिएगा मैं बिल्कुल ठीक हूं-दो-एक रोज़ में उसे लिखूंगा.
30-10-1961
कूका जिमखाना
सेंट सिरिल रोड, बांद्रा अज़ीज़ी ज़ोहरा जी,

रात के दो बज चुके हैं. अब यह ख़त लिखने बैठा हूं. बैठा हूं का मतलब है औंधे मुंह लेटा हूं. क्या ग़ज़ब है, आज-आज करते-करते कई आजें कल होके रह गईं मगर आज इस आज को कल न होने दूंगा. ये आज जब कल हो जाती है तो परेशान कर देती है. वो मेरा ही एक ऊंट-पटांग सा शेर है:
वो परेशान है आज कि जिसने आज को बेच दिया कल के हाथ. माफ़ी कि मैंने कितनी आज जाया कर दी. हां, ख़ुशी है तो इस बात की कि ये आज आज ही रहेगी, कल न होने पाएगी.

उधर देखिए पवन का ख़त पढ़ा, पहले पवन को लिख लूं, वो ख़त हो गया और चला भी गया और आज उसका जवाब भी मिल गया मगर आपका ख़त बस अभी लिखता हूं के घपले में रह गया. क्षमा की याचना करता हूं आशा है क्षमाकर दिया जाऊंगा. खुशी हुई कि आप इतने सुकून और इत्मीनान से तक़रीर करने लगी हैं. वो switch लगाने की बात है, अन्दर बिजलियां भरी पड़ी हैं. पहले ही कुछ क़दम भारी पड़ते हैं फिर तो इनसान दौड़ने लगता है. वो शेर यूं है:
ख्रिशते अव्वल यूं नहद मेमारकज, तासुरईया मीरावद दीवारकज. आपका गला अच्छा हो गया, ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है. मैं अगर कहूं एहतियात तो आप नहीं करेंगी. अच्छा तो दुआ करता हूं कि आप अच्छी रहें हर तरह हर रूप में और ये दवा भी लिखे देता हूं...

शलजम (शलगम) अद्द सेर भर पानी में उबाल लीजिए. आधा सेर रह जाए तो उतार लीजिए और किसी थरमस में भर लीजिए नमक डालकर. रात को सोते वक़्त दो प्याले पी लिये, जो बाक़ी बचा सुबह उठ के पी लिया गर्म-गर्म. गला Sputnik बन जाएगा. मेरी आवाज़ उसी ने लौटाई. अब तो मैं गा-गाकर लोगों को बोर कर रहा हूं, आपको भी करूंगा. 18 या 19 को दिल्ली आ रहा हूं. आते ही मिलूंगा. 15 को जबलपुर जा रहा हूं. वहां एक घूमने वाली स्टेज का उद्घाटन हो रहा है. मुझे मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया है. बाक़ी मिलने पर.

आपा बी को फ़िल्म मिल गई होगी. मैंने राजू के ऑफ़िस से distributor को चिट्ठी लिखवा दी थी. आपाजी और जैन साहब को आदाब. नईमा और हुमा और आमिर को प्यार. किरण की नाक पकड़कर प्यार कहिएगा और पवन के ख़त में लिख दीजिएगा उसका 29.9.61 का ख़त मुझे मिल गया है और मैं अनक़रीब उसे लिखूंगा. बड़ा प्यारा ख़त लिखा है, खुदा उसे उम्रदराज़ दे.
दुआएं पृथ्वी

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9-12-64 कुमकुम मसानी रोड
मातुंगा, बॉम्बे, इंडिया प्यारे-प्यारे अच्छे-अच्छे जोहरा जी,

माफ़ी के ख़त के जवाब में देर हो गई. आपका प्यार भरा ख़त 2 और 3 की रात को ही आ मिला. खूब है कि आपको ये तारीख़ अभी तक याद है और इतने हंगामों में रहते हुए और इतना काम करते हुए भी आप इसे नहीं भुलातीं. ये साधारण बात नहीं है. ईश्वर आपकी झोली खुशियों से भर-भर दे. यही दुआ है, यही आशीर्वाद. अब के थिएटर के झोंपड़े और पृथ्वी की झोंपड़ी में सब लोग इकट्ठे हुए 3 नवम्बर को. जानकी कुटीर जुहू में है. इन्दु कुमुद इत्यादि बहुत से साथी थे. आपका ज़िक्र जोरों पर रहा और बहुत याद किया पवन और किरण को भी. आशा है आपका dance show बहुत अच्छा गया होगा और कोई वजह नहीं कि अच्छा न जाए. आप हमेशा ही इन पर काम करती हैं, उधर उज़रा भी जोरों पर Play reading और मरसीया इत्यादि के शो देती रहती हैं और कभी-कभी 'गद्दार', 'कलाकार', 'किसान' इत्यादि में से भी excerpts कहा करती हैं, इन्दु और कुमुद सचिन शंकर के नृत्यनाट्य 'शिवाजी' में काफ़ी काम कर रही है. इन्दु जीजा बाई 'शिवाजी की माता' का रोल कर रही है. उसमें काफ़ी अच्छा रहा है इनका शो और खूब मक़बूल हुआ है. इन्दु मराठी ड्रामों में भी काम करती है. शौकत कैफ़ी IPTA के खेलों में काफ़ी हिस्सा लेती हैं. पुष्पा का लड़का हुआ, ईश्वर की कृपा से जच्चा-बच्चा दोनों अच्छे हैं.

सुरेश फ़िल्मों में dance direction करता है और काफ़ी मक़बूल है. रवीन्द्र के यहां उससे मुलाक़ात होती रहती है. आपका ज़िक्रेझेर होता है हमेशा ही. हां, माताजी आजकल मग़रीबी अफरीका में हैं अपने छोटे बेटे प्रभी के पास. उन्होंने आपका पता मांगा था मैंने पुराना पता भेजा था ज़रूर उन्होंने लिखा होगा आपको आपको टेलीविज़न पर अकसर देखा है वहां उन्होंने. आज मैंने आपका नया पता भी उनको लिख भेजा है-पुराने पते पर मैंने भी ख़त लिखा था आपको-उम्मीद है redirect होकर मिला होगा. अब रही अपने थिएटर की बात तो जिन्दा है. जब तक उधर आप, इधर रावलपिंडी में उज़रा और ये सब लड़के-लड़कियां इतना काम कर रहे हैं. हां, पृथ्वी फ़िल्मों में उलझ गया है-कभी जवानी में इतनी फ़िल्मों में एक साथ काम न किया था जो अब कर रहा हूंकोई 12 फ़िल्में एक साथ शुरू हो गई हैं फिर भी जिस दिन फारिग़ होता हूं, तो झोंपड़े में पहुंच जाता हूं. विष्णु जी और फ़ज़ल जी आ जाते हैं सितार और तबला और फिर अकेले में उस सामान के आसपास घूमता रहता हूं और आप सबको अपने पास पाता हूं...रौनकें हो जाती हैं. जनाब मोमिन ने क्या खूब कहा है:
'तुम मेरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता.'

एक और फ़िल्म Sign की है अभी-अभी 'शंकर ख़ान'. कुछ scene london में होंगे, ये भी कहते हैं. देखें ये बात बन गई तो क्या बात है. हमख़ुरमां हमसवाब. आपके दर्शन होंगे बच्चों से मिल लूंगा. किरण और पवन को मेरा बहुत बहुत प्यार.
प्यार भरी दुआओं के साथ
पृथ्वी
1976-1996
पिछले दशक

जब मैं जून 1975 में लन्दन लौटी तो मैंने बुढ़ापे में मिलने वाले भत्ते के लिए अर्जी दे दी. एक बुजुर्ग नागरिक के तौर पर नौकरी की चिन्ता किए बगैर मेरे पास अपनी मर्जी के काम करने के लिए ढेर सारा समय था, लेकिन मेरी उम्र के इस नए दौर की एक अजीब बात यह थी कि हालांकि मैं कोई रोज़ाना की नौकरी नहीं कर रही थी, उसके बावजूद मुझे अपने लिए तय किए कामों को करने के लिए भी समय कम पड़ता था. नहाने, व्यायाम करने, खाना बनाने, सफ़ाई और कपड़े धोने में दिन का एक बड़ा हिस्सा ख़त्म हो जाता था और उसी के बीच में मैं पढ़ने, लिखने, नाटक देखने, मिलने-जुलने, मनोरंजन, टी.वी. देखने और शब्द-पहेलियां हल करने का समय निकालती थी. लोगों को आश्चर्य होता था जब मैं कहती थी,"नहीं, मैं कभी भी बोर या अकेली महसूस नहीं करती. करने के लिए इतना काम होता है." मुझे लगता है कि उम्र बढ़ने के साथ रोज़मर्रा के काम पूरा करने में कुछ ज़्यादा समय लगता है.

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बहरहाल मुझे अपने रोज़ाना के समय में थोड़ी तब्दीली करनी पड़ी जब मुझे बीबीसी की सीरीज़ 'पड़ोसी' में काम करने का मौका मिला. यह सीरीज़ बीबीसी टेलीविज़न के फरदर एजुकेशन डिपार्टमेंट ने शुरू की थी. 1965 के बाद से एशियाई दर्शकों और श्रोताओं के लिए बीबीसी पर बहुत से टी.वी. और रेडियो कार्यक्रम प्रसारित किए जाते थे. अब, पहली बार पड़ोसी की कहानी के ज़रिए ब्रिटेन में रह रहे एशियाई परिवार के तजुर्बे के एक अलग पहलू को दिखाया जा रहा था. इससे एक और बात सामने उभरकर आई कि वहां रह रहे एशियाई समुदाय के बीच लिखने और अदाकारी में हुनरमन्द लोगों की भरमार है जिन्हें इस सीरीज़ के ज़रिए सामने लाया जा रहा था. पड़ोसी एक पाकिस्तानी मुसलमान परिवार और उनके पड़ोस में रह रहे एक भारतीय सिख परिवार की कहानी थी. मैंने श्रीमती चौधरी नाम का किरदार किया था जो एक सामाजिक कार्यकर्ता, अध्यापिका, बातूनी और मुंहफट औरत है, जिसकी डायरी हफ्ते भर में हुई घटनाओं का ब्योरा देती है. मैं हर एपिसोड की कहानी का आगाज़ और आख़िर पेश करती थी. लगभग 12 मर्द और औरत कलाकार इस सीरीज़ के साथ लगातार जुड़े थे और हम सबने एकसाथ काम करते हुए खूब मस्ती की. पड़ोसी के एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर टोनी मैथ्य और प्रोड्यूसर रॉबर्ट क्लैंप थे. पीटर ली-राइट दूसरे डायरेक्टर थे, हालांकि इस सीरीज़ का विचार इसके मुख्य डायरेक्टर पॉल क्रिवैकजेक का था. वह एक दोस्त होने के साथ सीखने का ज़रिया भी थे.

हमने इसके लिए रिहर्सल और रिकॉर्डिंग जनवरी 1977 में शुरू की और एक बार में दो एपिसोड करते हुए 12 मई को काम ख़त्म किया. यह सीरीज़ टेलीविज़न पर अक्टूबर 1977 से दिखाई जानी शुरू हुई और 1978 में इसे दोबारा दिखाया गया. इसकी शुरुआत से ही पूरे लन्दन में और इसके सारे एयरपोर्ट जैसे हिथ्रो, कराची और दिल्ली में लोग मुझे पहचानने लगे थे. शायद, कोई अदाकारा ही मेरी उस ख़ुशी को समझ सकती है जब बच्चे भाग कर मेरे पास आते थे, यह पक्का करने कि मैं ही 'श्रीमती चौधरी' हूं. मेरे बेटे को बहुत शर्मिंदगी होती थी जब हम किसी बड़ी भीड़ के बीच होते थे, जैसे साउथहाल के किसी सिनेमा में जहां यह सीरीज़ देखनेवाले कुछ लोग मेरे पैर छू लेते थे, लेकिन मेरी तो ज़िन्दगी में हमेशा बस एक ही तमन्ना रही थी कि लोग मुझे देखें, सुनें, इसलिए मैंने इस दौर का भरपूर मज़ा लिया.

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पड़ोसी सीरीज़ ख़त्म करने के बाद मैं पवन को अक्टूबर, 1977 में अपने साथ भारत ले गई. मैंने पड़ोसी के लिए क़रार करते वक़्त पवन से इसके लिए वादा किया था. 1963 के बाद से वह केवल एक बार ही भारत गया था. वह अपनी पैदाइश की जगह और नैनीताल में अपने पुराने स्कूल शेरवुड को देखना चाहता था. हम दिल्ली में जंगपुरा एक्सटेंशन में किरण के टेरैस वाले फ़्लैट में उसके साथ रहे और वहां से अलीगढ़, आगरा और बनारस घूमने गए. मुझे पाकिस्तान जाने के लिए फिर वीज़ा मिल गया था, लेकिन पवन को यह नहीं मिल सका. इसलिए मैं हवाई सफ़र से पाकिस्तान गई और कराची, लाहौर और सियालकोट में मैंने अब्बा और अपने भाई-बहनों के साथ बहुत मज़ेदार समय बिताया.

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पवन को 1979 तक बैंक ऑफ़ बड़ौदा की शानदार नौकरी मिल चुकी थी. किरण नौजवान भारतीय डांसरों के बीच अपनी मज़बूत जगह बनाने में कामयाब रही थी, वह पहले ही कई सारे डांस फेस्टिवल्स में भारत की नुमाइन्दगी कर चुकी थी. इसके अलावा उसने जाने-माने गुरु माया धर राउत से ओडिसी सीखना भी शुरू कर दिया था. अब्बाजान की सौवीं सालगिरह 11 मार्च, 1979 को मनाई गई और इस मौके के लिए मैं सुजाता और किरण को साथ लेकर कराची गई. अब्बा के सातों बच्चे अपने बच्चों और पोते-पोतियों के साथ इस मौके पर मौजूद थे जो भारत, पाकिस्तान, इंग्लैंड और मध्य-पूर्व के देशों से वहां पहुंचे थे. यह एक ऐतिहासिक और ख़ास मौक़ा था. बात यह थी कि क़रीब 60 साल पहले अम्मी की मौत के बाद कभी ऐसा मौक़ा ही नहीं बन पाया था कि हम सब भाई-बहन एक साथ एक जगह पर जमा हो सके हों. यह दूसरा ऐसा मौक़ा था कि हम सब साथ थे. अब्बा को कई सारे तोहफ़े मिले जिनमें से सबसे खूबसूरत था किरण का एक डांस जो उसने अपने प्यारे नाना के लिए ख़ासतौर पर पेश किया. पाकिस्तान में रह रहे मेरे रिश्तेदार, जिन्होंने किरण को नाचते हुए पहले कभी नहीं देखा था, उसे देखते ही रह गए. मेरी एक बहन ने कहा, "बी आपा, यह तो आपसे भी आगे निकल गई. उम्मीद है आप मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगी." "बुरा?" मेरी आंखें ख़ुशी से भर आईं.

किताब का नाम – करीब से
लेखक – जोहरा सहगल
विधा – आत्मकथा
प्रकाशन – राजकमल प्रकाशन
ऑनलाइन लिंक - https://bit.ly/3jeORsr
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