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कैलाश सत्यार्थी ने असली नायकों को बनाया है- अनुपम खेर


नोबल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की किताब 'तुम पहले क्यों नहीं आए' का लोकार्पण प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर ने किया.

नोबल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की किताब 'तुम पहले क्यों नहीं आए' का लोकार्पण प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर ने किया.

‘तुम पहले क्यों नहीं आए’ में दर्ज हर कहानी अंधेरों पर रौशनी की, निराशा पर आशा की, अन्याय पर न्याय की, क्रूरता पर करुणा ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

नोबल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की किताब 'तुम पहले क्यों नहीं आए' का लोकार्पण.
'तुम पहले क्यों नहीं आए' में दासता और उत्पीड़न की कैद से प्रताड़ित बच्चों की सच्ची कहानियां.
राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है कैलाश सत्यार्थी की किताब 'तुम पहले क्यों नहीं आए'.

Tum Pahle Kyon Nahi Aaye Book: प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर ने कहा कि फिल्मों के नायक भले ही लार्जर देन लाइफ हो, लेकिन कैलाश सत्यार्थी ने असली नायकों को बनाया है. वे खुद में एक प्रोडक्शन हाउस हैं. उन्होंने कहा कि फिल्मों में जो नायक-नायिका होती हैं वे नकली होते हैं. असली नायक-नायिका तो इस किताब के बच्चे हैं, जिन्हें कैलाश सत्यार्थी ने बनाया है.

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की पुस्तक ‘तुम पहले क्यों नहीं आए’ के लोकार्पण के अवसर पर अनुपम खेर ने कहा कि हमारी नई पीढ़ी को पुस्तकों के असली हीरों से अवगत करना चाहिए. क्योंकि इनसे ही जीवन में प्रेरणा मिलती है.

कैलाश सत्यार्थी ने पुस्तक के बारे में कहा कि अगर पुस्तक की कहानियों को पढ़कर पाठक की आंखों में आसूं आते हैं तो वह आपकी इंसानियत का सबूत हैं. बच्चों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. हमारे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम खुद भी अपने भीतर के बच्चे को पहचानें.

कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि इस किताब को कागज पर लिखने में भले ही उन्हें 12-13 साल लगे हों लेकिन इसमें जो कहानियां दर्ज हैं उन्हें मेरे हृदय पटल पर अंकित होने में 40 वर्षों से भी अधिक समय लगा है. उन्होंने कहा कि वे साहित्यकार तो नहीं हैं पर एक ऐसी कृति बनाने की कोशिश की है जिसमें सत्य के साथ साहित्य का तत्व भी समृद्ध रहे. ये कहानियां जिनकी हैं, वह उनके सहयात्री रहे हैं. इसलिए जिम्मेदारी बढ़ जाती है. स्मरण के आधार पर कहानियां लिखीं, फिर उन पात्रों को सुनाया जिनकी ये कहानियां हैं. इस तरह सत्य घटनाओं का साहित्य की विधा के साथ समन्वय बनाना था.

राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक माहेश्वरी ने कहा कि यह उनके लिए विशेष खुशी का अवसर है. उन्होंने कहा कि ‘तुम पहले क्यों नहीं आये’ के माध्यम से हमें उन बच्चों के बारे में जानने का मौका मिला जो अकल्पनीय, अमानवीय परिस्थितियों से होकर गुजरने के बावजूद अन्य संकटग्रस्त बच्चों की मुक्ति के लिए प्रयत्नशील रहे.

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कैलाश सत्यार्थी और उनके ‘बचपन बचाओ अभियान’ के चलते वे उन अमानवीय हालात से मुक्त होकर आज हमारे बीच हैं, नए जीवन के सपने देख रहे हैं. यह किताब हमें यह भी याद दिलाती है कि अनेक बच्चे आज भी ऐसी ही परिस्थितियों में जीवन बिता रहे होंगे, उनके लिए हमें लगातार काम करते रहना होगा. सिर्फ संगठन के स्तर पर नहीं, निजी तौर पर भी एक जागरूकता पैदा करनी होगी ताकि समाज खुद भी उन बच्चों के प्रति संवेदनशील बने, और ऐसे हालत ही न बनने दे कि भविष्य के ये नागरिक इस तरह नष्ट हों.

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अशोक माहेश्वरी ने कहा कि गुलामी अभिशाप है. हमारे समय में भी गुलामी की मौजूदगी बहुत चिंता की बात है. लेकिन यह एक कठोर सचाई है कि हमारे समय में भी गुलामी शेष है. बच्चों को भी गुलामी से बख़्शा नहीं जाता. पर एक और सचाई है कि हमारे समय में कैलाश सत्यार्थी जैसे लोग हैं जो बच्चों को गुलाम बनाये जाने के खतरों से पूरी दुनिया को अगाह कर रहे हैं.

‘तुम पहले क्यों नहीं आए’ पुस्तक
‘तुम पहले क्यों नहीं आए’ पुस्तक में ऐसी बारह सच्ची कहानियां हैं जिनसे बच्चों की दासता और उत्पीड़न के अलग-अलग प्रकारों और विभिन्न इलाकों तथा काम-धंधों में होने वाले शोषण के तौर-तरीकों को समझा जा सकता है. हमारे समाज के अंधेरे कोनों पर रोशनी डालती ये कहानियां एक तरफ हमें उन खतरों से आगाह करती है जिनसे भारत समेत दुनियाभर में लाखों बच्चे आज भी जूझ रहे हैं. दूसरी तरफ धूल से उठे फूलों की ये कहानियां यह भी बतलाती हैं कि हमारी एक छोटी-सी सकारात्मक पहल भी बच्चों को गुमनामी से बाहर निकालने में कितना महत्त्वपूर्ण हो सकती है. नोबेल पुरस्कार विजेता की कलम से निकली ये कहानियां आपको और अधिक मानवीय बनाती हैं, और ज्यादा जिम्मेदार बनाती हैं.

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कैलाश सत्यार्थी
कैलाश सत्यार्थी का जन्म 11 जनवरी, 1954 को मध्य प्रदेश के विदिशा में हुआ. उन्होंने भोपाल विश्वविद्यालय से बी.ई. और उसके बाद ट्रांसफॉर्मर डिजाइन में मास्टर्स डिप्लोमा किया. किशोरावस्था से ही सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध मुखर रहे. छुआछूत, बाल विवाह आदि के खिलाफ अभियान चलाया. उनकी अगुआई में 1981 से अब तक, सवा लाख से अधिक बच्चे बाल मजदूरी और गुलामी से मुक्त कराए जा चुके हैं. इस क्रम में छापामार कार्रवाइयों के दौरान कई बार जानलेवा हमले भी झेले. 1998 में ‘बालश्रम विरोधी विश्वयात्रा’ का आयोजन किया जो 103 देशों से होकर गुजरी और लगभग छह महीने चली.

इसी का नतीजा था कि खतरनाक किस्म की बाल मजदूरी रोकने के लिए अन्तरराष्ट्रीय कानून बना जिसे सभी राष्ट्र लागू कर चुके हैं. विश्वभर के बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए 1999 में ‘ग्लोबल कैंपेन फॉर एजुकेशन’ की शुरुआत की. शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए 2001 में ‘भारत यात्रा’ की. परिणामस्वरूप देश के संविधान में संशोधन हुआ और शिक्षा का अधिकार कानून बना. भारत में बाल यौन शोषण और ट्रैफिकिंग के खिलाफ 2017 में 11 हजार किलोमीटर की ‘भारत यात्रा’ की जो यौन अपराधों के लिए सख्त कानून के निर्माण में उत्प्रेरक बनी.

मानवता के प्रति उल्लेखनीय योगदानों के लिए उन्हें ‘नोबेल शान्ति पुरस्कार’ (2014), ‘डिफेंडर्स ऑफ डेमोक्रेसी अवॉर्ड’, ‘मेडल ऑफ इटैलियन सीनेट’, ‘रॉबर्ट एफ. कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड’, ‘हार्वर्ड ह्यूमैनिटेरियन अवॉर्ड’ आदि कई पुरस्कार और सम्मान प्रदान किए जा चुके हैं.

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