Home /News /literature /

बाल साहित्य: डॉक्टर अजय गोयल की कहानी 'नन्हीं उंगलियों का विद्रोह'

बाल साहित्य: डॉक्टर अजय गोयल की कहानी 'नन्हीं उंगलियों का विद्रोह'

हापुड़ में पेशे से चिकित्सक डॉ. अजय गोयल लंबे समय से हिंदी साहित्य में सक्रिय हैं.

हापुड़ में पेशे से चिकित्सक डॉ. अजय गोयल लंबे समय से हिंदी साहित्य में सक्रिय हैं.

डॉ. अजय गोयल नब्ज पकड़कर बच्चों उनकी शारीरिक परेशानियों को दूर करने का काम करते हैं, वहीं उनकी बाल मन पर भी अच्छी पकड़ है. बाल मनोविज्ञान को उनकी कहानी 'नन्हीं उंगलियों का विद्रोह' से अच्छी तरह से समझा जा सकता है.

    Bal Sahitya: माली के कन्धे पर बैठ दिव्य पार्क की मुंडेर पर चढ़ा. मुंडेर पर खड़ा हुआ. वह मुश्किल से दो-चार कदम चल सका. वापस माली के कन्धे पर बैठ नीचे उतर आया.

    दिव्य ने माली से पूछा-  ‘‘क्या आदमी पहले बन्दर था?’’

    सवाल से माली थोड़ा चकराया था. अपने सामान्य ज्ञान को कुरेदते हुए बोला- ‘‘पहले बन्दर ही था आदमी.’’
    उस शाम माली के उत्तर ने दिव्य के मन की उलझन खत्म कर दी. उसको विश्वास हो गया कि डैडी ने उसे बन्दरों से छीना है.

    गुस्से में डैडी अक्सर कहते- ‘‘दिव्य, तुझे मैं बन्दरों को लौटा दूंगा. मैंने तेरी पूंछ काट और बालों को साफ़़ कर तुझे आदमी बना दिया. मेरा कहना नहीं मानेगा तो मैं तुझे मुंडेर पर बैठा दूंगा. बन्दर वापस ले जाएंगे तुम्हे.’’

    इतना सुन दिव्य सहम जाता. गर्दन झुका लेता. उसके फूल से चेहरे पर सलवटों के पड़ाव उभर आते.
    मुंडेर पर खड़ा होने पर दिव्य को डर लगा. घबराकर तुरन्त नीचे उतर आया था. जबकि बन्दरों को दिव्य कालोनी में सड़क किनारे लगे अशोक और गुलमोहर के पेड़ों की हर डाल व शाख से बातें करते देखता, अपने कमरे की खिड़की से पार्क की दीवार पर दौड़ते या कलाबाज़ियां खाते बन्दरों को देख वह स्तब्ध रह जाता.

    सुबह-शाम बन्दरों की टोली कॉलोनी का चक्कर लगाती. पेड़ों पर गेंद की तरह उछलती और कूदती. टी.वी. एंटिना को छेड़ती. हर घर के लॉन को थोड़ी देर के लिए क्रीड़ा-स्थल बना लेती. इस खिलवाड़ के बीच उन सबका नाश्ते से लेकर भोजन तक हो जाता. साथ में वस्तुओं की उठाईगीरी भी सम्पन्न होती रहती.

    काबुलीवाला के देश की सैर कराती राकेश तिवारी की पुस्तक ‘अफगानिस्तान से खत-ओ-किताबत’

    दिव्य के घर की छत पर बन्दर धमाल करते. बची रोटियां या फलों को खिड़की से छत पर दिव्य फेंकता, उस वक़्त उसके सामने दंगे जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता. छत रंगमंच बन जाती. बन्दर चीखने लगते. दांत दिखा-दिखाकर खों-खों की आवाज़ कर एक-दूसरे से हट जाने को कहते. झपटने और छीनने के क्रम में बच्चे और अशक्त बन्दर मैदान छोड़ देते. इसके बाद शक्ति सम्पन्नों के बीच फैसला होता.

    स्कूल से लौटकर दिव्य कमरे की खिड़की खोलता, एक मोटे और ताकतवर बन्दर को अपनी छत की मुंडेर पर बैठा पाता. शायद अन्य बन्दरों ने हार मान ली थी. धीरे-धीरे खिड़की खुलने पर वह बन्दर मुंडेर से उतर, खिड़की की सीखचों को पकड़ खड़ा होने लगा. अब दिव्य उसे अपने हाथों से खिलाता.

    दिव्य को सहज ढंग से सूझा कि जैसे उसके डैडी और मम्मी मानव हैं, तब वैसे ही उसके बन्दर डैडी और मम्मी भी होंगे.

    उसे मोटा बन्दर पसन्द आया था. किसी दिन खिड़की खोलने पर बन्दर दिखाई नहीं देने पर दिव्य पापू-पापू की आवाज़ लगाता, कुछ देर में दिव्य का पापू जंगले पर हाजिर हो जाता.

    ‘नए घर में अम्मा’ के बहाने हिंदी साहित्य में विधवा स्त्रियों के जीवन पर चर्चा

    खिलाने-पिलाने के साथ दिव्य पापू को मिकी माउस और डोनाल्ड डक के कारनामे सुनाता. नीली, हरी रोशनियों के साथ चलते रोबोट को दिखाता. अपने स्कूल की बातें बताता. दिव्य ने बताया था कि स्कूल में चौबीस खरगोश हैं, जिन्हें वह अपने दोस्त जय के साथ रोज़ाना घास खिलाता है. वहां एक छोटा-सा तालाब है, जिसमें दस बत्तखें रहती हैं. जब वे ज़मीन पर आती हैं, वह और जय उनके पीछे भागते हैं. बड़ा मज़ा आता है.

    पापू के सामने दिव्य अपने मासूम रहस्य उगलता रहता. इसी क्रम में उसने बताया कि जय कहता है— ‘‘वह एक बड़ी-सी बत्तख से शादी करेगा. उसकी पीठ पर बैठ आकाश में उड़ जाएगा.’’

    कभी-कभी दिव्य बन्दर बन जाने की कल्पना करता. पापू को उसने बताया कि दोबारा बन्दर बन जाने के बाद वह उसके पेट से चिपक कर घूमेगा. दीवारों को फांदेगा. पेड़ों पर चढ़ेगा. उछल-कूद करेगा. बीच-बीच में वह पापू से पूछता रहता कि- ‘‘उसकी बन्दर मम्मी कहां हैं? बन्दर भाई-बहन क्यों नहीं आते?’’

    रोटी या केलों के लालच में जंगले से चिपका पापू अपनी खों-खों की आवाज़ के साथ दिव्य के सारे प्रश्नों को नाप देता.

    दिव्य परेशान था. वह समझ नहीं पाता था कि पापू क्यों नहीं बोलता? घर में दिव्य और बन्दर की दोस्ती की चर्चा थी. एक दिन दादाजी ने पूछ लिया- ‘‘दिव्य, तुम्हारे बन्दर दोस्त के क्या हाल-चाल हैं? क्या-क्या बातें करते हो उससे?’’
    ‘‘वो बोलता ही नहीं?’’
    ‘‘सिखाया तुमने क्या?’’ -दादीजी ने हंसते हुए पूछा.

    अगले दिन से बातों का दौर ख़त्म हो गया. दिव्य ने पापू को बोलना सिखाने के लिए कमर कस ली थी. परन्तु लगातार अथक प्रयास के बाद दिव्य पापू को बोलना तो दूर, हंसना तक नहीं सिखा पाया.

    साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2020: हिंदी में अंकित और मैथिली में सोनू कुमार झा सम्मानित

    ‘‘तुम मेरा नाम भी नहीं ले सकते पापू, यदि डैडी ने मुझे मुंडेर पर छोड़ दिया तो…? मैं न मुंडेर पर रह सकता हूं। न पेड़ पर सो सकता हूं. तुम मेरा ध्यान कैसे रखोगे? इसीलिए कहता हूं, तुम जल्दी-जल्दी सीख जाओ, जैसे मैं सीख जाता हूं. सब कुछ जल्दी-जल्दी याद कर लेता हूं.’’ -पापू से निराश होकर दिव्य ने कहा था.

    दिव्य की स्मृति सबको आश्चर्य में डाल देती. सबसे पहले इसका अनुभव टी.वी. पर आने वाले विज्ञापनों के कारण हुआ. टूथ ब्रश से लेकर साबुन तक या टू व्हीलर से लेकर कार तक की विज्ञापन पंक्तियां उसे स्मरण थीं. हर सुबह दिव्य विज्ञापन पंक्तियां मम्मी को सुनाकर बताता कि आज उसे कौन-सा टूट पेस्ट या साबुन इस्तेमाल करना है. उसकी स्मृति का प्रदर्शन स्कूल के वार्षिक उत्सव में हुआ. तुलसीदास का बाना पहन, मंच पर बैठ, मानस के बालकाण्ड की पन्द्रह-बीस चौपाइयां दिव्य ने लय में गा दी थीं. जन-समूह भाव-विभोर हो गया. इसके बाद स्कूल में दिव्य पहचाना जाने लगा.

    सबको उलझन होती जब दिव्य मम्मी की क्रीम अपने चेहरे पर लीप लेता. होंठों पर लिपस्टिक लगाकर कहता— ‘‘मुझे राजकुमारी बना दो न.’’ या पामेरियन कुत्ते जैकी को अपना सबसे अच्छा दोस्त कहता. सर से पांव तक लम्बे मुलायम बालों से ढंके जैकी के साथ खाने की जिद करता.

    डैडी झुंझला जाते. कहते- ‘‘तुम क्या हो दिव्य? तुम्हें पता नहीं है.’’ परन्तु वे शान्त जल्दी हो जाते. दिव्य को गोद में उठाए अक्सर लॉन में घूमते. उस समय उनका चेहरा संतोष से दिपदिपाता होता. दिव्य की अद्भुत क्षमता को अपने साथियों के बीच प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने उसका जन्म-दिन चुना था.

    दिव्य ने पापू को बताया कि इस साल केवल पांच मेहमानों को डैडी ने बर्थ डे पार्टी में बुलाया है. इसके साथ उसने पूछा कि पापू, तुम अपना बर्थडे कैसे मनाते हो? कौन से मन्दिर जाते हो? कितना बड़ा केक काटते हो? दावत मुंडेर पर देते हो या पेड़ पर?

    योजना बनाई गई कि दिव्य मेहमानों को चन्दन लगाकर स्वागत करेगा. स्वागत में श्लोक बोलेगा. इसके बाद आगन्तुकों का सेलुलर फोन नम्बर बताएगा.

    पार्टी में दो दिन शेष थे. वह श्लोक याद कर चुका था. पहले दिन वह स्कूल चला गया. वापस आकर पापू से उसने बातें कीं. शाम को उसकी नज़र चौंक में हवा की सीढ़ियों पर आहिस्ता-आहिस्ता उतरती बुढ़िया के बालों पर पड़ी. बालों का गोल-गोल सफेद कोट पहने, हवा में इधर-उधर दौड़ते-तैरते बीजों को देखकर बच्चे तालियां पीटते. लगता जैसे परियों के देश से उड़ आए हैं गोल-गोल बाल. उनको देख दिव्य की मम्मी भी अपने बचपन की पिछली गलियों में चली जातीं.

    दिव्य चिल्लाया- ‘‘देखो मम्मी बुढ़िया के बाल. सुन्दर-सुन्दर कित्ते अच्छे.’’ इसके बाद दोनों अपनी-अपनी फूंकों से देर तक उसे चौक में थकाते रहे थे. रात में डैडी के वापस आने से पहले दिव्य सो गया. इस तरह एक दिन बीत गया.

    दूसरा दिन अवकाश का था. सुबह डैडी ने दिव्य से कहा- ‘‘हैलो फ्रेंड, कल तुम्हारा बर्थडे है, याद कर लेना, ओ.के.’’ यह कह वे चले गए. वह मम्मी के साथ बैठा था कि उसकी नजर बरामदे में रखे चूहेदान पर पड़ी. उसमें फंसा चूहा कुतर-कुतरकर टुकड़ा खा रहा था. बस, फिर क्या था? वह उछलकर खड़ा हो गया. चूहेदान उठाकर मेज पर रख दिया. उसने मम्मी के बुलाने को अनसुना कर दियाॉ. भागकर अपने कमरे से मिकी माउस खिलौना उठा लाया. खिलौने और चूहेदान में बन्द चूहे को कुछ देर देखता रहा, इसके बाद मम्मी के पास जाकर बोला- ‘‘मम्मी, क्या डैडी ने मिकी माउस को भी माउस से आदमी बनाया है, क्योंकि मिकी तो आदमी जैसा लगता है.’’

    मम्मी के पास हंसने के अलावा कोई रास्ता नहीं था, परन्तु दिव्य के मन में कुछ सूझ गया. खिड़की के पास पहुंच उसने पापू-पापू की आवाज़ लगाई. पापू नहीं आया. शाम तक दिव्य बेचैन रहा.

    शाम को दिव्य ने पापू का हाथ पकड़ झूमते हुए कहा- ‘‘जानते हो, मैंने क्या सोचा है? पापू, मैं डैडी से बर्थडे गिफ़्ट में क्या मांगूंगा? मैं कहूंगा, डैडी आपने मुझे आदमी बनाया, मिकी को भी आदमी बनाया. अब पापू को आदमी बना दो न.’’

    उस दिन डैडी कुछ जल्दी आ गए. दिव्य जैकी को उसकी दोनों पिछली टांगें पकड़े लॉन में घसीट रहा था. धूल में सने और जैकी के साथ खेलते दिव्य को देख डैडी एकदम तमतमा गए. उससे बिना बोले घर में चले गए. कुछ देर बाद सहमा-सहमा दिव्य अन्दर पहुंचा.

    पढ़ें अलका सिन्हा की कहानी ‘जन्मदिन मुबारक’

    ‘‘चलो, आज दिव्य को मुंडेर पर छोड़ आते हैं. यह आदमी रहने लायक नहीं है. यह बन्दर है, बन्दर.’’ -दिव्य को देख डैडी बोले.

    दिव्य श्लोक याद कर चुका था. मम्मी रसोई में चाय बनाने गई थी. दिव्य ने आग्रह किया- ‘‘मम्मी मुझे सेलुलर नंबर याद करा दो ना, डैडी गुस्से में हैं.’’

    डैडी की चाय ख़त्म होने तक दिव्य पांचों फोन नम्बर अपनी स्मृति में उतार चुका था. उसने डैडी को सुना भी दिए. अब उनके पास गुस्सा करने का कोई जायज कारण नहीं रह गया था.

    पार्टी के लिए दिव्य धोती-कुर्ते में था. दादाजी की गोद में चढ़ वह मेहमान को हाथ जोड़कर प्रणाम करता. श्लोक उच्चारण के साथ उसके माथे पर चन्दन का टीका लगाता. साथ में सेलुलर नम्बर बता देता.

    पार्टी में दिव्य छाया रहा. उसकी योग्यता और क्षमता के सीमेंट से सपनों के ऊंचे-ऊंचे पुल पार्टी में खड़े कर दिए गए. दिव्य को अगला बिल गेट्स मान लिया गया.

    एम.डी. साहब की कल्पना ने आकाश छू लिया. उनके अनुसार, दिव्य के क्लोन बनने चाहिए. क्लोनिंग से दस या पन्द्रह दिव्य एक साथ तैयार किए जा सकते हैं. एक-सी क्षमता. एक-सी योग्यता एक साथ. सब क्लोन अलग-अलग क्षेत्रों में काम करें, तब…? कहां से कहां पहुंच सकते हैं हम. फिर किस रहस्य का सीना हमारे सामने बचा रहेगा.

    क्लोनिंग से, ऊंची उड़ान शायद सम्भव नहीं थी. मम्मी-डैडी क्लोनिंग की पीठ पर चढ़ बड़े से बड़ा सपना देखना चाहते थे. लेकिन एक छोटे से धक्के ने उनके सपनों को हिला दिया.
    डिप्टी साहब की चिन्ता थी कि यदि दिव्य का कोई क्लोन हिटलर जैसा बन गया, तब…! इस चिन्ता से पार्टी की यात्रा जैसे किसी ब्लैकहोल के भंवर में फंस गई.

    एम.डी. साहब ने रास्ता दिखाया. उन्होंने कहा कि हमें अपने कम्प्यूटरमैन में गांधी को ज़िन्दा करना पड़ेगा. गांधी के नाम ने पार्टी को भंवर से निकाल दिया था. एम.डी. साहब चाहते थे कि दिव्य पन्द्रह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए आयोजित ‘गांधी क्विज’ में भाग ले. क्योंकि स्वतंत्राता की वर्षगांठ पर होने वाली क्विज में जीतने पर राज्य स्तर की पहचान निश्चित थी.

    क्लोनिंग का सपना और क्विज की व्यवस्था दोनों ही दादाजी को अच्छे नहीं लगे. पार्टी विसर्जित होने पर उन्होंने कहा- ‘‘क्लोनिंग राक्षसी प्रवृत्ति है. रक्तबीजी राक्षस होते थे. रावण के दस सिर थे. …गांधी हमारे लिए अब क्विज भर का सामान रह गया है क्या?’’

    पार्टी सफल थी. मम्मी-डैडी ने दादाजी को अनसुना किया. दोनों के कदम जमीन पर नहीं टिक रहे थे. डैडी के सामने उलझन थी कि क्विज के लिए दिव्य को कैसे तैयार किया जाए.

    यह समस्या भी सुलझ गई. अभी दिव्य का ‘बर्थ डे ग़िफ्ट’ शेष था. पास-पास बैठे मम्मी-डैडी के बीच दिव्य घुस गया. बोला- ‘‘डैडी, ग़िफ्ट के बदले पापू को आदमी बना दो न? जैसे मुझे बनाया है.’’

    डैडी को समझने में कुछ क्षण लगे. अवसर स्वयं चलकर आया था. दिव्य को चूमते हुए बोले- ‘‘ठीक है, आपको एक काम करना है. बस एक क्विज जीतना है. इसके लिए एक किताब याद करनी होगी. तब मैं पापू को भी आदमी बना दूंगा.’’

    उस रात दिव्य अपने डैडी से चिपका मीठी नींद सोया. डैडी क्लोनिंग और क्विज जैसे पालनों में झूलते रहे. दूसरे दिन दिव्य ने पापू का स्वागत चन्दन का टीका लगाकर और श्लोक गाकर किया. उसे पूरी और गुलाब जामुन खिलाए. पापू का मुंह पोंछते हुए वह बोला- ‘‘डैडी ने बात मान ली है. आदमी बन जाने के बाद तुम स्कूल जाया करोगे, क्योंकि तुम्हें बोलना भी नहीं आता न. वहां पर सीख जाओगे. है न पापू!’’

    अगले दिन स्कूल में बत्तखों के पीछे भागते हुए दिव्य ने जय को बताया कि थोड़े दिनों बाद पापू भी स्कूल आया करेगा. तब तीनों खरगोश और हिरन को घास खिलाया करेंगे. उस समय भागता हुआ जय रुक गया था. अपनी हांफती सांसों को थामते हुए दिव्य से बोला- ‘‘तेरे डैडी बहकाते हैं. बन्दर को कोई आदमी नहीं बना सकता. मैंने अपने डैडी से पूछा था.’’

    इसके बाद दिव्य न बत्तखों के पीछे दौड़ा, न झूला झूला. क्लास में जाकर चुपचाप बैठ गया. उसके मन में जम नहीं पा रहा था कि डैडी उसे बहका सकते हैं. उसने यह भी सोचा कि क्यों उसका पापू रोज़ाना उससे मिलने आता है. स्कूल से घर लौटा दिव्य. डैडी उसका इंतजार कर रहे थे. उसकी उलझी मनःस्थिति की उन्होंने उपेक्षा कर दी और गांधी को रटाना शुरू कर दिया.

    दिव्य के लिए स्वतंत्राता का अर्थ पापू से बातें और जैकी के साथ खेलना भर था, फिर भी स्वतंत्राता के महानायक गांधी के पदचिह्नों को उसने स्मरण करना शुरू कर दिया. वह बता सकता था कि ‘सविनय अवज्ञा’ दार्शनिक हेनरी थोरो के प्रभाव से गांधी जी के जीवन में उतर सकी थी. या लगभग दो सौ मील दांडी यात्रा उन्होंने चौबीस दिन में तय कर पूरे देश में आत्मबल भर दिया था. ‘करो या मरो’ जैसे बुलन्दी गांधी ने ‘अगस्त क्रान्ति’ में दी थी.

    डैडी क्विज के लिए दिव्य के साथ जी-जान से जुटे थे, परन्तु सबसे ज्यादा परेशान दादाजी थे. उन्होंने महसूस किया कि गानों और कविताओं की फूल-पत्तियां उड़ाते रहने वाला दिव्य अब शान्त-सा रहता है. जैकी की टांगें पकड़कर भी नहीं घसीटता और न घर बसाने के लिए भटकती बुढ़िया के बालों के गोलों में फूंक मारने के लिए उठता है. बस चुपचाप बैठा बुदबुदाता रहता है.

    दादाजी सोचते कि यह कैसी दौड़ है, जिसके कारण बचपन के हाथों में लाठी आ जाए. लेकिन अपनी उलझन का उन्हें समाधान नहीं मिलता. बस, उन्होंने अपना सारा ध्यान दिव्य पर केन्द्रित कर दिया था. गोद में बैठाकर उसे खाना खिलाते. रात में अपने पास बुलाते. शाम होने पर पार्क में घुमाने ले जाते.

    एक दिन पार्क में दिव्य ने पूछा- ‘‘दादाजी क्या जय की बत्तख से शादी हो सकती है? क्या बत्तख पर बैठकर वह उड़ सकता है? जय बता रहा था कि उसके डैडी कहते हैं कि मेरे डैडी मुझे बहकाते हैं. न मुझे डैडी ने बन्दरों से छीना है, न बन्दर से आदमी बनाया है. डैडी ऐसा कर भी नहीं सकते.’’

    अगले कुछ क्षण दादाजी के लिए कठिन थे. दिव्य टकटकी लगाए था. उन्होंने मजबूत निर्णय लिया और बोले- ‘‘जय के डैडी ठीक कहते हैं.’’

    अगले दिन दिव्य कुछ याद नहीं कर पा रहा था. न गोलमेज सम्मेलनों की तारीखें और न पूना या गांधी-इरविन समझौतों के निर्णय.

    डैडी कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि दिव्य को यह एकाएक क्या हो गया. गुमसुम बैठा वह उन्हें एकटक देख रहा था. झुंझलाकर डैडी ने उसे झिड़क दिया. आहत दिव्य के पास रोने के सिवा कोई रास्ता नहीं था.

    दिव्य के रोने से दादाजी का सब्र का बांध टूट गया. अपने घुमड़ते गुस्से में वह बोले- ‘‘आखि़र कितनी पहेलियां ठूंस सकते हो तुम इसके नन्हें दिमाग में? दिव्य क्या कोई कॉमेडिटी है, जिसको बाजार में हिट करने के लिए तुले हो.’’

    दादाजी व डैडी के बीच तीखा विवाद हुआ. दोनों दिव्य की उपस्थिति तक भूल गए थे. डैडी के लिए दादाजी का विरोध आश्चर्य में डालने वाला था. डैडी ने साफ़-साफ़ कहा- ‘‘आपने सोचा नहीं, यदि क्विज जीत गया, तब क्या होगा? एम.डी. ने कहा है कि क्विज जीतने पर दिव्य को अपवाद मानते हुए, उसकी जिम्मेदारी कम्पनी ले लेगी. वह बाहर पढ़ने जाएगा. इसलिए दिव्य को क्विज जीतनी है और वह जीतकर रहेगा.’’ इन शब्दों के साथ डैडी की मुट्ठियां भिंच गईं.

    शाम तक दिव्य को तेज़ बुखार चढ़ आया. उसे देखकर लगता, वह कहीं उलझ गया है या दलदल में फंस गया है. बुखार में मम्मी व दादाजी से बार-बार पूछता- ‘‘डैडी मुझे बहकाते क्यों है?’’ डैडी के आने पर उसका गुस्सा चेहरे पर उतर आता. उनके सामने वह आंखें बन्द कर लेता या फिर छत की तरफ देखता रहता.

    दूसरे दिन दादाजी जय को बुला लाए. जय को देखकर दिव्य हंसा भी और बहुत देर तक उससे बातें करता रहा. दिव्य ने जय को बताया कि खुद उसने पापू से आदमी बनने के लिए मना कर दिया. क्या करेगा कोई आदमी बन कर? किताबें याद करता रहेगा. मोटा बस्ता लेकर स्कूल जाएगा.

    बाद में दोनों ने कैरम की कई बाज़ियां खेलीं. हर बाज़ी में दिव्य जीतता रहा. वह हैरान था, क्योंकि उसे मालूम था कि जय कैरम बहुत अच्छा खेलता है. वह बड़ी क्लास के लड़कों को कैरम में हरा देता है, इसलिए जाते वक़्त दिव्य ने जय से पूछ लिया- ‘‘तुम मुझसे कैसे हारते गए? तुम तो बहुत अच्छा खेलते हो.’’

    जय का सीधा जवाब था- ‘‘उसे हारते रहने के लिए दादाजी ने कहा था. बीमार हो न तुम.’’

    जय के उत्तर से दिव्य चकित रह गया. शाम होते-होते दिव्य का बुखार उतर गया. उसके चेहरे पर चमक लौट आई.
    उस समय दिव्य दादाजी के साथ लॉन में बैठा था, जब चुपके से उनके पास पापू आ बैठा. बरामदे में बंधे जैकी ने भौंककर उसके आने की सूचना दी. दादाजी ने मुंह पर अंगुली रख जैकी को चुप करा दिया. दिव्य ने पापू को केला खिलाया. वे पहली बार खुले में मिले थे. पिछले दिनों में दिव्य उससे मिल नहीं पाया था.

    ‘‘पापू, तुम जानते हो, मैंने क्या सोचा है? मैंने सोचा है कि क्विज हार जाऊं. हार जाने पर न तो मुझे बाहर जाना पड़ेगा और न तुम्हारा साथ छूटेगा.’’ -दिव्य ने अपनी हंसी में तैरते हुए कहा.

    उस शाम दिव्य की हंसी की गंगा दादाजी का तमाम बोझ बहाती उनके मन की गहराई में उतर गई.

    Dr ajay goyal

    Tags: Hindi Literature

    विज्ञापन

    राशिभविष्य

    मेष

    वृषभ

    मिथुन

    कर्क

    सिंह

    कन्या

    तुला

    वृश्चिक

    धनु

    मकर

    कुंभ

    मीन

    प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
    और भी पढ़ें
    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज

    अधिक पढ़ें

    अगली ख़बर