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बाल साहित्य: अलका सिन्हा की कहानी 'वह बड़ा हो गया था…'

बाल साहित्य: अलका सिन्हा की कहानी 'वह बड़ा हो गया था…'

बाल दिवस के मौके पर अलका सिन्हा की बाल कहानी. (प्रतीकात्मक चित्र- istock)

बाल दिवस के मौके पर अलका सिन्हा की बाल कहानी. (प्रतीकात्मक चित्र- istock)

हिंदी साहित्य की शायद ही कोई विधा हो जिसमें अलका सिन्हा की लेखनी ना चली हो. कहानी हो या कविता, याफिर कोई संस्मरण अलका के शब्द सीधे दिल पर दस्तक देते हैं. देश-विदेशों में हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार में जुटीं वरिष्ठ लेखिका अलका सिन्हा ने बाल मनोविज्ञान को बखूबी समझते हुए कई बाल रचनाएं रची हैं.

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    Bal Diwas 2021: जन्मदिन की गहमा-गहमी के बीच भी वरुण का मन उदास था. हर बार की तरह घर बेहतरीन सजावट जा रही थी. सुबह से ही उसे जन्मदिन की शुभकामनाएं और खूबसूरत तोहफे मिल रहे थे. आज उसे स्कूल ड्रेस पहनने से छूट मिली थी और वह अपनी नई ड्रेस में स्कूल गया था. स्कूल असेंब्ली में प्रिंसीपल मैम ने उसके नाम की स्पेशल प्रेयर की थी. उन्होंने जीसस से कामना की थी कि वरुण अपनी मंजिल को पाए और एक समझदार व्यक्ति बने. वह बड़ा हो रहा है, मदर मेरी उसे अच्छी समझ दें.

    इस प्रेयर के बाद से ही वह किसी सोच में डूबा है. क्या बड़े होने का मतलब यही होता है कि वह मस्ती करना छोड़ दे और लगातार कुछ सोचता रहे? उसके पापा ने उसके जन्मदिन के अवसर पर स्कूल के एक गरीब बच्चे की सालभर की पढ़ाई और उसकी किताबों का खर्च भी डोनेट किया था. सब कुछ तो बढ़िया था. ऊपरी तौर पर तो वह भी ठीक ही दिख रहा था मगर भीतर कहीं कुछ खाली था.

    वह अपने पैरों की ‘किक’ से एक छोटा-सा पत्थर उछालता है. पत्थर लगभग उसकी ऊंचाई तक जाकर गिर जाता है। उसकी निगाह भी उस ऊंचाई को नाप कर नीचे लौट आती है. अपनी ही धुन में खोया वह घर लौट आता है.

    शाम नजदीक आती जा रही है, उसके दोस्त और मम्मी-पापा के मेहमान आते ही होंगे. आज जम कर पार्टी होगी. हर उम्र के लिहाज से कई तरह के गेम होंगे, मैन्यु में कई तरह के व्यंजन और उसके दोस्तों के लिए रिटर्न गिफ्ट भी. हर कोई कहेगा, ‘क्या खूब पार्टी की है वढ़ेरा साहब ने,’ या फिर, ‘पार्टी तो वढ़ेरा साहब की होती है!’

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    शाम रात में बदलने लगी है. थोड़ी ही देर में घर की सजावट जगमगा उठेगी. सामने की लॉन में ठीक बीचोंबीच सजी मेज पर शानदार केक होगा. वह उन पर सजी मोमबत्तियां बुझाएगा और संगीत की धुन पर सभी एक स्वर में बर्थ डे गीत गाएंगे.

    अचानक दादा-दादी को दरवाजे से बाहर निकलते देख उसकी तंद्रा भंग हुई. दोनों मंदिर जाने के लिए तैयार होकर निकल रहे रहे हैं. दादी के हाथ में वह साजी है जिसमें पूजा का सामान रख कर वे मंदिर जाती हैं.

    वरुण जैसे नींद से जागा. इस बार भी वही सब होगा. उसके दादा-दादी ऐन उस वक्त वहां नहीं होंगे जब वह केक काट रहा होगा, जब उसके लिए बर्थ-डे सॉंग गाया जा रहा होगा. उसे एक चुभन महसूस हुई, यही वह फांस थी जो उसे भीतर-ही-भीतर गड़ रही थी. हर रोज वह स्कूल से लौट कर दादा-दादी के साथ कितनी बातें करता है. उसे खाना खिलाते हुए दादी उससे दिन भर की कहानी सुनती है, प्यार से समझाती है कि उसने क्या सही किया और क्या गलत. दादाजी उसके साथ खेलते हैं, उसका होमवर्क कराते हैं. तभी तो उसकी रिपोर्ट इतनी अच्छी रहती है. जिनके साथ उसकी हर दोपहर बीतती है, ऐन उसके जन्मदिन पर वे उसके साथ क्यों नहीं होते? यह उसे अच्छा नहीं लगता. वह समझ गया, यही वह कमी है जो उसे लगातार बेचैन किए हुए है. वह अपनी जिंदगी का यह खास दिन उनकी अनुपस्थिति में नहीं बिताना चाहता है.
    नहीं, इस बार वह ऐसा नहीं होने देगा.

    “दादाजी, इस बार आप कहीं नहीं जाएंगे,” वह दौड़कर दादाजी के पास पहुंच गया.
    उसकी आवाज पर दादाजी ने चौंक कर उसकी ओर देखा.
    “आज मेरा जन्मदिन है और मैं चाहता हूं, आज आप मेरे साथ रहें!”
    “तुम्हारा जन्मदिन है, इसीलिए तो हम मंदिर जा रहे हैं. ईश्वर से तुम्हारी दीर्घ आयु और यश-कीर्ति की प्रार्थना करने के लिए.” दादा जी अपनी छड़ी बढ़ाते हुए चलने लगे.
    “आप ही तो कहते हैं न, भगवान सब जगह होते हैं. तो फिर आज यहीं कर लो न अपनी पूजा.” वरुण लाड़ से दादाजी के सामने आ खड़ा हुआ.

    दादी ने वरुण के सिर पर हाथ फेरते हुए समझाया, “तुम बच्चे हो, अपने दोस्तों के बीच खुशी मनाओ, मस्ती करो…”
    “मैं बच्चा नहीं हूं. समझ रहा हूं कि आप लोग जान-बूझ कर मेरी हर बर्थ-डे पार्टी पर मौजूद नहीं रहते. हर बार कहीं और चले जाते हो…”

    वह दादा-दादी का रास्ता रोक कर खड़ा रहा, “मैं अपना बर्थ-डे आप लोगों के साथ मनाना चाहता हूं!”

    दादाजी ने हार कर हथियार डाल दिए, “बेटे तुम लोगों के जमाने की पार्टी हमें समझ नहीं आती और हम भी तो वहां कितने अजीब लगेंगे…!” दादा जी ने अपने धोती-कुरते की ओर देखते हुए कहा.

    “और मैं भी तो उलटे पल्ले की साड़ी, सिर पर आंचल…” दादी आंचल मुंह में दबाकर हंस पड़ी,“चल, अब जाने दे हमें…!”
    “आप जैसे चाहते हैं, मैं वैसे ही अपना जन्मदिन मनाऊंगा… पर मनाऊंगा आपके साथ ही!” वरुण ने ऐलान कर दिया.
    “मुझे अपने जन्मदिन पर आपसे यही तोहफा चाहिए, वरना मैं अपना जन्मदिन मनाऊंगा ही नहीं!”

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    दादा जी के दिल की धड़कन बढ़ गई थी. वरुण की जिरह-बहस में पार्टी का समय हो चला था. मेहमानों का आना शुरु हो चुका था. वरुण के पापा-मम्मी आगे बढ़कर आगंतुकों का स्वागत कर रहे थे. घर के सामने, लॉन में शामियाना लगा था जिसके अलग-अलग हिस्सों में तरह-तरह के खेलों की सजावट थी. हवा भरे मिकि-माउस पर चढ़ते-उतरते हुए बच्चे बार-बार गिर पड़ते और बच्चों का ठहाका गूंज जाता. सरप्राइज के तौर पर इस बार पापा ने एक मेजीशियन यानी जादूगर को भी बुलाया था जो कभी किसी के बालों से पैसे निकालता तो कभी उसकी जेब का बॉल पेन किसी और की जेब से निकालता. बच्चे हंस-हंस कर दोहरे हो रहे थे. बाईं तरफ बने डांस-फ्लोर पर बड़ों का जमावड़ा था. पाश्चात्य धुनों पर सबके पैर ऐसे थिरक रहे थे मानो पहले से इसकी तैयारी कर रखी हो. हवा के पोर-पोर में खुशियों की किलकारी गूंज रही थीं.

    दादा-दादी के लिए यह सब बिलकुल अनूठा था. उन्होंने अपने गांव के मेलों में जो कुछ देखा था, यह सब उसकी संकल्पना में दूर-दूर तक कहीं नहीं ठहरता था. वे दोनों एक पल को भूल ही गए कि वे इसी दुनिया का हिस्सा हैं. तभी सुनहरी ट्रॉली पर खूबसूरती से सजाया दो मंजिला केक मैदान के बीचोंबीच सरकने लगा. सभी का ध्यान कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण की तरफ खिंचने लगा और सभी अतिथि बीच में सजी मेज की तरफ बढ़ने लगे.

    “वरुण! वरुण!! ” मम्मी-पापा पुकार रहे थे.
    “आप चलेंगे, तभी मैं भी चलूंगा,” उधर वरुण अपनी बात पर कायम था.
    आखिर दादा जी को वरुण की जिद के आगे हार माननी पड़ी. वे उसका हाथ थामे लॉन की तरफ बढ़ने लगे.
    महंगे-महंगे कपड़ों में लिपटे आगंतुकों की उस भीड़ में दादा जी खुद को बहुत असहज अनुभव कर रहे थे. दूसरी ओर माथे पर आंचल रखे, दादी भी संकोच से गड़ी जा रही थी.

    वरुण ने बीचोबीच सजे मंच के पास आकर सभी का अभिवादन किया और मेहमानों से अपने दादा-दादी का परिचय कराया. उसने ऐलान किया कि इस बार का जन्मदिन वह अपने दादा-दादी की पसंद और उनके तरीके से मनाएगा.

    चारों ओर एक स्तब्धता-सी व्याप्त थी. दादा-दादी भी किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े थे. वरुण के मम्मी-पापा और सभी मेहमान हैरानी से देख रहे थे कि आखिर माजरा क्या है. मगर वरुण और उसके दोस्तों की दिलचस्पी बढ़ गई थी. उन्होंने दादाजी को घेर लिया, ‘दादा जी, दादी जी!’ सभी उत्साह से उनकी ओर देख रहे थे.

    दादा जी ने देखा जब वरुण और उसके दोस्त, यानी यह नई पीढ़ी उनके तरीके से जन्मदिन मनाने को उत्सुक है तो वही पीछे क्यों रहें. उन्होंने दादी के हाथ में टंगी मंदिर ले जाने वाली साजी से डिब्बी निकाल कर वरुण के माथे पर चंदन-रोली का तिलक कर दिया.

    ‘शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यम् धनसंपद: शत्रु बुध्दि विनाशाय, दीप जोतिर नमोस्तुते’ वे गदगद कंठ से अपने पौत्र पर शुभकामनाओं की बौछार कर रहे थे, उधर दादी दीपक जला कर वरुण की आरती उतार रही थीं.

    पाश्चात्य धुनें शांत हो गई थीं, उन धुनों पर थिरकते कदम, सम्मोहित-से उनकी तरफ बढ़ते आ रहे थे.। सभी अवाक् देख रहे थे, दादा जी के उल्लसित स्वर में वरुण के स्वस्थ और यशस्वी जीवन की मंगलकामना धरती से आकाश तक गूंज रही थीं.
    वरुण की खुशी का ठिकाना नहीं था. उसे लग रहा था जैसे देवता आकाश से फूल बरसा रहे हैं. वह महसूस कर रहा था कि इस बार वह सचमुच बड़ा हो गया था…

    Hindi Author Alka Sinha

    Tags: Hindi Literature

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