बाल साहित्य: क्षमा शर्मा की कहानी 'बारिश के दिन में तोते'

क्षमा शर्मा कहानियों के माध्यम से बच्चों की परवरिश की शिक्षा और संस्कार भरने का काम करती हैं.

पत्रकार और साहित्यकार क्षमा शर्मा बाल साहित्य की वरिष्ठ लेखिकाओं में से एक हैं. बच्चों के मन को समझकर और उनकी जिज्ञासाओं का निदान करते-करते कहानी गढ़ देना क्षमा शर्मा की सबसे बड़ी विशेषता है.

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    Bal Sahitya: छुट्टी का दिन था. बारिश बहुत तेज हो रही थी. सामने के पेड़ पर पत्तों से धाराएं सी बह रही थीं. पानी के इतने परदे हवा में लहरा रहे थे कि सामने दिखाई देना मुश्किल था. फुहारें रह-रहकर खिड़कियों को छू रही थीं. तेज हवा से घर के अंदर लगे परदे झंडियों की तरह फर-फर कर रहे थे. मां ने बारिश का मौसम देखते हुए गरमागरम आलू के परांठे बना दिए थे. आम के अचार के साथ खाते हुए निमिष और निशा बालकनी में खड़े थे. कभी-कभी खिड़की से हाथ बाहर निकालकर बौछारों का आनंद लेते.

    पापा भी बालकनी में आकर बारिश का आनंद लेने लगे. नीचे सोसाइटी की सड़क पर पानी भर गया था और तेजी से बह रहा था. पापा ने देखा तो अंदर आकर उन्होंने पुराने अखबार निकाले और बच्चों के लिए कागज की नावें बनाने लगे. पापा से लेकर, दोनों बच्चे वहीं बालकनी से अपनी नावें पानी में फेंकने लगे. नावें तेज पानी में बहतीं आगे निकल जातीं, कुछ पानी के बहाव को न सह पाने के कारण उलट जातीं.

    दोनों भाई-बहन यह कह-कहकर कि किसकी नाव आगे जाती है, आपस में प्रतियोगिता करने लगे. वे ताली बजाते. मैं जीता या मेरी नाव आगे निकल गई कहकर एक-दूसरे को चिढ़ाते. जल्दी ही लड़ाई करते हुए, वे एक-दूसरे के बाल खींचने लगे.

    पापा ने देखा तो आकर उन्हें छुड़ाया-'चलो अब अलग-अलग बैठो. जब देखो तब आपस में लड़ते रहते हो.' पापा को नाराज होते देख निमिष अपने कमरे में जाकर होम वर्क करने लगा और निशा फूल-पत्तियां बनाने लगी.

    जब बहुत देर तक दोनों चुप रहे तो मां ने निमिष से कहा-'चलो बहुत हो गया मौन व्रत. अब जल्दी से नहा लो. और निशा तू नहाने के बाद कौन से कपड़े पहनेगी. पिंक फ्रॉक या जींस टी शर्ट.'

    निशा कुछ नहीं बोली, बस मुंह फुलाकर बैठी रही. कि मां ने फिर पुकारा- 'अरे बोलती क्यों नहीं? अपनी मरजी से कपड़े पहना दूंगी तो फिर कहेगी कि ये वाले नहीं वो वाले पहनाओ.' निशा फिर भी कुछ नहीं बोली.

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    अब तक पापा भी आ गए थे- 'लगता है नाराज है हमारी बुलबुल.' तभी वहां से निमिष चीखा- 'हां, बस उसी की नाराजगी दिखती है. उसे ही मनाओ'. पापा ने यह सुना तो वह उसके पास पहुंचे. उसके सिर पर हाथ फेरने लगे- 'नहीं तू नाराज होगा, तो हम तुझे भी मनाएंगे. तू तो शेर है हमारा.' उधर, मम्मी ने निशा को गोद में उठा लिया- 'चलो मैं तुम दोनों के लिए ढेर सारी कागज की नाव बना देती हूं.'

    बारिश बंद हो गई. अब कागज की नाव का क्या करेंगे?-निमिष ने चिढ़ाया. बारिश बंद हो गई थी. हलकी धूप निकल आई थी. एकाएक पापा ने अपने थैले से दो सुंदर पैन निकाले- 'बताओ भई, किस बच्चे को चाहिए ये नए पैन. जो बच्चा नाराज है, उसे पहले दूं या जो बच्चा हंसता हुआ मेरे पास आएगा उसे.' पहले मैं पापा, पहले मैं,-कहते हुए दोनों पापा की तरफ लपके.

    पापा ने हाथ ऊपर कर लिए- पहले वायदा करो कि लड़ोगे नहीं. दोनों ने सिर हिलाए और मुसकराए. पापा ने दोनों को एक-एक स्कैच पैन दे दिया. निमिष तो पैन लेकर कमरे में चला गया. निशा ने कमरे की दीवार को ही अपना ड्राइंग बोर्ड समझ लिया. उसने दीवार पर ढेर सारी आड़ी -तिरछी रेखाएं खींच दीं. मम्मी ने यह देखा तो डांटा-निशा, यह क्या कर रही है, सारी दीवारें खराब कर दीं.

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    पापा टीवी देख रहे थे. मुड़कर देखा और बोले-अरे, दीवारें कहां खराब हुईं? ये तो मेरी बच्ची की चित्रकारी से और चमक उठीं.

    इतने में ही बाहर ढोल बजने की आवाजें आने लगीं. निशा दौड़कर बालकनी में पहुंची. पड़ोस में वर्मा जी के लड़के की शादी थी. उन्हीं के दरवाजे ढोल बज रहा था. कमरे में पापा ने टीवी की आवाज तेज कर दी, मगर ढोल की आवाज कम न हुई.
    तभी निशा ने आवाज लगाई - निमिष, जल्दी आ, देख ..
    निमिष फौरन दौड़ा आया. उन दोनों की लड़ाई कब की खत्म हो चुकी थी.
    निशा ने सामने वाले फ्लैट की ओर इशारा करते हुए कहा-जरा बता तो वो क्या है?
    क्या है? वो तो चिड़िया है.
    कौन सी?
    यह तो मुझे भी नहीं पता.
    पापा जल्दी आकर देखो. दोनों ने पुकारा. उन्हें डर था कि चिड़िया कहीं उड़ न जाएं.
    पापा आए. फिर चश्मा लगाकर देखने लगे-पता नहीं चल रहा. लगते तो तोते हैं.
    तोते? मगर तोते तो हरे होते हैं. - निमिष ने कहा.
    यही तो मैं सोच रहा हूं. अगर ये तोते हैं तो ऐसे तोते तो कभी नहीं देखे. इतने रंग जैसे कि कई-कई इंद्रधनुष इकट्ठे उग आए हों -पापा बोले.
    मुझे चाहिए ऐसा तोता-निशा मचली.

    अब इतनी ऊंची सीढ़ी तो है नहीं हमारे पास, जो वहां तक पहुंचकर उसे उतार लें. सीढ़ी ले भी आएं, तो क्या तोते वहीं बैठ रहेंगे. वे तो पास आने की आहट भर से उड़ जाएंगे -कहकर पापा अंदर चले गए. दोनों बच्चे देर तक उन तोतों को देखते रहे. तोते भी उड़े नहीं. वे दीवारों पर इधर से उधर उड़-उड़कर बैठते रहे. तेज आवाज में अपने बिछड़े हुए साथियों को पुकारते रहे.

    अचानक निशा पापा के पास आई और उसने एक कागज उन्हें दिखाया. उसने जैसे देखे थे, वैसे तोते बन दिए थे. पापा ने तारीफ करते हुए कहा-अरे भई वाह, हमारी बच्ची तो आर्टिस्ट हो गई. अब तो तोतों को पकड़ने की जरूरत भी नहीं रही. तूने तो तोते अपनी ड्राइंग बुक में ही उतार लिए. फिर पापा ने उन्हें टेप के सहारे दीवार पर टांग दिया.

    अगले दिन पापा ने अखबार में पढ़ा-दिल्ली चिड़ियाघर से दो विदेशी नस्ल के तोते उड़ गए. पापा ने निमिष-निशा को बताया और खूब हंसे. दोनों बच्चों को लगा शायद, वे ही तोते थे जो उन्होंने कल देखे थे. फिर वे कभी नहीं दिखे. स्कूल से आते-जाते दोनों बच्चे अकसर इस आशा से उस दीवार की तरफ देखते कि हो सकता है, तोते दोबारा वहां आकर बैठें. वे उन्हें पकड़ न सकें, तो कम से कम उनका फोटो तो खींच सकें.
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    Kshama Sharma

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